रीतिकाल का नामकरण: एक विश्लेषण
हिन्दी साहित्य के उत्तर मध्यकाल (संवत् 1700-1900) के नामकरण को लेकर विद्वानों में जो मतभेद रहे हैं, उन्हें इस प्रकार समझा जा सकता है:
- अलंकृत काल (मिश्रबन्धु): मिश्रबन्धुओं ने इस काल की भाषा में अलंकारों की प्रधानता को देखते हुए यह नाम दिया। लेकिन आलोचकों का मानना है कि यह केवल बाहरी सजावट पर जोर देता है, कविता के आंतरिक प्रवाह पर नहीं।
- शृंगार काल (पं. विश्वनाथ प्रसाद मिश्र): इस काल की कविताओं में नायक-नायिका भेद और शृंगार रस की प्रमुखता थी। परंतु, जैसा कि आपने उल्लेख किया, इस काल में वीर रस (भूषण) और भक्ति/नीति की भी महत्वपूर्ण रचनाएँ हुईं, इसलिए इसे केवल ‘शृंगार काल’ कहना इसकी व्यापकता को सीमित करना होगा।
- कला काल (डॉ. रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’): यह नाम काव्य के शिल्प पक्ष (कला) को तो उभारता है, लेकिन भाव पक्ष (Hridaya Paksha) की उपेक्षा कर देता है।
‘रीतिकाल’ ही सबसे उपयुक्त क्यों?
आचार्य शुक्ल ने ‘रीति’ शब्द का प्रयोग एक विशिष्ट ‘काव्य पद्धति’ या ‘शैली’ के अर्थ में किया है। इस काल के कवियों की मुख्य प्रवृत्ति (Tendency) निम्नलिखित थी:
- लक्षण ग्रंथों की रचना: संस्कृत के आचार्यत्व की परंपरा का अनुसरण करते हुए रस, अलंकार, छंद और नायिका-भेद के लक्षण लिखना।
- रीतिबद्ध परंपरा: अधिकांश कवियों ने एक निश्चित परिपाटी (Format) पर चलकर काव्य सृजन किया।
निष्कर्ष: चूंकि इस काल के कवियों का मुख्य उद्देश्य कलात्मक प्रदर्शन और शास्त्रीय पद्धति (रीति) का निर्वाह करना था, इसलिए ‘रीतिकाल’ नाम ही सबसे अधिक वैज्ञानिक, व्यापक और सर्वमान्य सिद्ध हुआ है। यह नाम इस युग की प्रधान साहित्यिक प्रवृत्ति को पूरी तरह आत्मसात करता है।
