कवि बिहारी: संक्षिप्त परिचय एवं काव्य विशेषताएँ
1. जीवन परिचय
- जन्म: संवत् 1652 (लगभग), ग्वालियर के ‘बसुवा गोविन्दपुर’ गाँव में।
- बचपन: बुन्देलखण्ड में बीता।
- युवावस्था: मथुरा (ससुराल) में व्यतीत हुई।
- आश्रयदाता: जयपुर के महाराजा जयसिंह।
- मृत्यु: संवत् 1720 के आस-पास।
2. रीतिसिद्ध कवि के रूप में पहचान
- बिहारी रीतिकाल के सर्वाधिक प्रसिद्ध और एकमात्र ‘रीतिसिद्ध’ कवि माने जाते हैं।
- रीतिसिद्ध का अर्थ: इन्होंने अन्य कवियों की तरह कोई ‘लक्षण ग्रन्थ’ (सिद्धांतों की पुस्तक) नहीं लिखा, लेकिन इनके काव्य में रीति (काव्य शास्त्र के नियम) स्वतः सिद्ध होकर आई है।
- आचार्य विश्वनाथप्रसाद मिश्र के अनुसार: “बिहारी ने आचार्य कर्म से दूर रहकर जो सतसई रची, उसमें रीतियाँ स्वतः सिद्ध होती चली गई हैं।”
3. प्रमुख रचना: बिहारी सतसई
- यह बिहारी की एकमात्र और कालजयी कृति है।
- इस ग्रन्थ के बारे में ‘गागर में सागर भरना’ की उक्ति प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ है कम शब्दों में बहुत गहरी बात कहना।
4. प्रमुख काव्य विशेषताएँ
- राजभक्ति एवं नीति: महाराजा जयसिंह को कर्तव्य बोध कराने के लिए उन्होंने प्रसिद्ध दोहा लिखा:“नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास इहिं काल। अली कली ही सो बँध्यो, आगे कौन हवाल।।”
- स्वाभिमान: मुगलों की ओर से हिंदू राजाओं के विरुद्ध लड़ने पर उन्होंने जयसिंह को सचेत किया (बाज और पक्षी के उदाहरण द्वारा)।
- शृंगार रस: बिहारी मुख्य रूप से शृंगार के कवि हैं। उनके काव्य में विभाव, अनुभाव और संचारी भावों का सुंदर मेल मिलता है।
- चेष्टाओं का वर्णन: “बतरस लालच लाल की, मुरली धरी लुकाइ…”
- प्रकृति चित्रण: “सघन कुंज, छाया सुखद, सीतल मन्द समीर…”
- नीति और लोक-ज्ञान: मानवीय स्वभाव और विनम्रता पर उनके दोहे सटीक हैं।
- विनम्रता का महत्त्व: “जेतो नीचौ ह्वै चलै, तेतौ ऊँचौ होइ।”
- अलंकार योजना: बिहारी के काव्य में अलंकारों का अद्भुत प्रयोग मिलता है। विशेषकर असंगति और विरोधाभास अलंकार उनकी पहचान हैं।
- उदाहरण (असंगति): “दृग उरझत, टूटत कुटुम…” (उलझती आँखें हैं पर टूटता परिवार है)।
निष्कर्ष
बिहारी ने अपनी सूक्ष्म निरीक्षण प्रतिभा और भाषाई कौशल से दोहे जैसे छोटे छंद में भी भावों का संसार रच दिया। उनकी ‘सतसई’ आज भी हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जाती है।
