फ़िराक गोरखपुरी : रुबाइयाँ / गज़ल कक्षा 12 हिंदी काव्य खंड

फ़िराक गोरखपुरी : रुबाइयाँ / गज़ल कक्षा 12 हिंदी काव्य खंड

फ़िराक गोरखपुरी

फ़िराक गोरखपुरी उर्दू-फ़ारसी के जाने-माने शायर थे। इनका जन्म 28 अगस्त, सन 1896 को गोरखपुर में हुआ था। इनका मूल नाम रघुपति सहाय ‘फ़िराक’ था।

इन्हें ‘गुले-नग्मा’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार, ज्ञानपीठ पुरस्कार और सोवियत लैंड नेहरू अवार्ड मिला। सन 1938 में इनका देहावसान हो गया। रचनाएँ-गोरखपुरी जी ने शायरी के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित किए।

महत्वपूर्ण कृतियाँ

गुले-नग्मा, बज्में जिंदगी, रंगे-शायरी, उर्दू गजलगोई। काव्यगत विशेषताएँ-उर्दू शायरी साहित्य का बड़ा हिस्सा रुमानियत, रहस्य और शास्त्रीयता से बँधा रहा है जिसमें लोकजीवन और प्रकृति के पक्ष बहुत कम उभरकर सामने आए हैं। नजीर अकबराबादी, इल्ताफ हुसैन हाली जैसे कुछ शायरों ने इस परंपरा को तोड़ा है, फिराक गोरखपुरी भी उनमें से एक हैं।

भाषा-शैली

उर्दू शायरी अपने लाक्षणिक प्रयोगों और चुस्त मुहावरेदारी के लिए प्रसिद्ध है। शेर लिखे नहीं, कहे जाते हैं। यह एक तरह का संवाद होता है। मीर, गालिब की तरह फिराक ने भी इस शैली को साधकर आम-आदमी या साधारण-जन से अपनी बात कही है।

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फ़िराक गोरखपुरी : रुबाइयाँ / गज़ल

(क) रुबाइयाँ

प्रतिपादय-फ़िराक की रुबाइयाँ उनकी रचना ‘गुले-नग्मा’ से उद्धृत हैं। रुबाई उर्दू और फ़ारसी का एक छंद या लेखन शैली है। इसकी पहली, दूसरी और चौथी पंक्ति में तुक मिलाया जाता है और तीसरी पंक्ति स्वतंत्र होती है। इन रुबाइयों में हिंदी का एक घरेलू रूप दिखता है। इन्हें पढ़ने से सूरदास के वात्सल्य वर्णन की याद आती है। सार-इस रचना में कवि ने वात्सल्य वर्णन किया है। माँ अपने बच्चे को आँगन में खड़ी होकर अपने हाथों में प्यार से झुला रही है। वह उसे बार-बार हवा में उछाल देती है जिसके कारण बच्चा खिलखिलाकर हँस उठता है। वह उसे साफ़ पानी से नहलाती है तथा उसके उलझे हुए बालों में कंघी करती है।

बच्चा भी उसे प्यार से देखता है जब वह उसे कपड़े पहनाती है। दीवाली के अवसर पर शाम होते ही पुते व सजे हुए घर सुंदर लगते हैं। चीनी-मिट्टी के खिलौने बच्चों को खुश कर देते हैं। वह बच्चों के छोटे घर में दीपक जलाती है जिससे बच्चों के सुंदर चेहरों पर दमक आ जाती है। आसमान में चाँद देखकर बच्चा उसे लेने की जिद पकड़ लेता है। माँ उसे दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाती है और उसे कहती है कि दर्पण में चाँद उतर आया है। रक्षाबंधन एक मीठा बंधन है। रक्षाबंधन के कच्चे धागों पर बिजली के लच्छे हैं। सावन में रक्षाबंधन आता है। सावन का जो संबंध झीनी घटा से है, घटा का जो संबंध बिजली से है वहीं संबंध भाई का बहन से है।

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फ़िराक गोरखपुरी : रुबाइयाँ / गज़ल

(ख) गजल

प्रतिपादय-रुबाइयों की तरह फ़िराक की गजलों में भी हिंदी समाज और उर्दू शायरी की परंपरा भरपूर है। इस गजल में दर्द और पीड़ा के साथ-साथ शायर की ठसक भी अंतर्निहित है।

सार-इस गजल के माध्यम से शायर कहता है कि लोगों ने हमेशा उस पर कटाक्ष किए हैं और साथ ही उसकी किस्मत ने भी कभी उसका साथ नहीं दिया। गम उसके साथ हमेशा रहा। उसे लगता है जैसे रात का सन्नाटा उसे बुला रहा है। शायर कहता है कि इश्क वही कर सकता है जो अपना सब कुछ खो देता है। जब शराबी शराब पिलाते हैं तो उसे अपनी प्रेमिका की याद आ जाती है। अंतिम शेर में वह यह स्वीकार करता है कि उसकी गजलों पर मीर की गजलों का प्रभाव है।

(क) रुबाइयाँ

1.

आंगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी
हाथों पे झुलाती हैं उसे गोद-भरी

रह-रह के हवा में जो लोका देती है
गूँज उठती हैं खिलखिलाते बच्चे की हँसी।

शब्दार्थ-चाँद का टुकड़ा-बहुत प्यारा। गोद-भरी-गोद में भरकर, आँचल में लेकर। लोका देती हैं-उछाल देती है।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘रुबाइयाँ’ से उद्धृत है। इसके रचयिता उर्दू-फ़ारसी के प्रमुख शायर फिराक गोरखपुरी हैं। इस रुबाई में कवि ने माँ के स्नेह का वर्णन किया है।
व्याख्या-शायर कहता है कि एक माँ चाँद के टुकड़े अर्थात अपने बेटे को अपने घर के आँगन में लिए खड़ी है। वहीं अपने चाँद के टुकड़े को अपने हाथों पर झुलाने लगती है। बीच-बीच में वह उसे हवा में उछाल भी देती है। इस प्रक्रिया से बच्चा प्रसन्न हो उठता है तथा बच्चे की खिलखिलाहट-भरी हँसी गूँजने लगती है।

विशेष

  1. माँ द्वारा बच्चे को झुलाना, बच्चे का हँसना आदि स्वाभाविक क्रियाएँ हैं। स्वभावोक्ति अलंकार है।
  2. वात्सल्य रस है।
  3. दृश्य बिंब है-
    ‘आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी’, ‘गोद-भरी’, ‘हाथों पे झुलाती’, ‘हवा में जो लोका देती है’।
  4. अंतिम पंक्ति में श्रव्य बिंब है।
  5. ‘चाँद के टुकड़े’ मुहावरे का सुंदर प्रयोग है।
  6. ‘रह-रह’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  7. ‘लोका देना’ देशज भाषा का प्रयोग है।
  8. उर्दू-हिंदी मिश्रित शब्दावली है।

प्रश्न

(क) कवि ने ‘चाँद का टुकड़ा’ किसे कहा है और क्यों?
(ख) माँ के लिए कविता में किस शब्द का प्रयोग हुआ है और क्यों?
(ग) बच्चे की हसी का कारण क्या है? उसके गूंजने से क्या तात्पर्य है?
(घ) काव्यांश के भाव को अपने शब्दों में चित्रित कीजिए।

उत्तर –

(क) कवि ने चाँद का टुकड़ा माँ की गोद में खेल रहे बच्चे को कहा है क्योंकि वह चाँद के समान ही सुंदर है।
(ख) माँ के लिए  कविता में ‘गोद-भरी’ शब्द का प्रयोग है क्योंकि माँ की गोद में बच्चा होने के कारण उसकी गोद भरी हुई है।
(ग) बच्चे की हँसी का कारण है-माँ द्वारा बच्चे को हवा में लोका दिया जाना या उसे खुश करने के लिए हवा में उछालना। उसके गूंजने का तात्पर्य है-इससे बच्चा खुश होकर हँसता है और उसकी हँसी गूंजने लगती है।
(घ) काव्यांश का भाव यह है कि माँ अपने चाँद जैसी सुंदर संतान को गोद में लिए खड़ी है। वह उसे अपने हाथों पर झुलाती हुई हवा में उछाल देती है। इससे बच्चा खिलखिलाकर हँसने लगता है।

2.

नहला के छलके-छलके निर्मल जल से
उलझे हुए गेसुओं में कंघी

किस प्यार से देखता हैं बच्चा मुँह को
करके जब घुटनियों में ले के हैं पिन्हाती कपड़े।

शब्दार्थ-छलके-हिलते-डुलते। निमल-स्वच्छ, साफ़। गेसुओं-बालों। घुटनियों-घुटनों। पिन्हाती-पहनाती।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘रुबाइयाँ’ से उद्धृत है। इसके रचयिता उर्दू-फ़ारसी के प्रमुख शायर फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें, माँ द्वारा बच्चे के नहाने की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है।
व्याख्या-शायर कहता है कि माँ अपने बच्चे को स्वच्छ जल से नहलाती है। उसके उलझे हुए बालों से पानी छलक रहा है। माँ क्यों केवल की कत है जब वाहउसे अप्ने पुटों में लेक कहे पिहनात हैत बच्था अयंता ने सेम के मुवक निहारता रहता है।

विशेष

  1. माँ के स्नेह का स्वाभाविक वर्णन है। अत: स्वभावोक्ति अलंकार है।
  2. वात्सल्य रस की सहज अभिव्यक्ति है।
  3. ‘छलके-छलके’ में पुनरुक्ति प्रकाश एवं ‘कंघी करके’ में अनुप्रास अलंकार है।
  4. ‘जब घुटनियों में ले के है पिन्हाती कपड़े’ में लोकभाषा का प्रयोग है।
  5. उर्दू-हिंदी भाषा का मिश्रित रूप है।
  6. दृश्य बिंब है।
  7. रुबाई छंद है।

प्रश्न

(क) माँ बच्चे को किस प्रकार नहलाती हैं?
(ख) माँ बच्चे की कंघी कैसे करती हैं?
(ग) बच्चा कब अपनी माँ को प्यार से देखता हैं?
(घ) बच्चा अपनी माँ को किस प्रकार देखता है?

उत्तर –

(क) माँ बच्चे को स्वच्छ जल से नहलाती है। पानी के छलकने से बच्चा प्रसन्न होता है।
(ख) माँ बच्चे के उलझे हुए बालों में कंघी करती है।
(ग) जब माँ बच्चे को अपने घुटनों में लेकर कपड़े पहनाती है तब वह अपनी माँ को देखता है।
(घ) बच्चा अपनी माँ को बहुत ही प्यार से देखता है।

3.

दीवाली की शाम घर पुते और सजे
चीनी के खिलौने जगमगाते लावे

वो रूपवती मुखड़े पैं इक नम दमक
बच्चे के घरौंदे में जलाती हैं दिए।

शब्दार्थ-शाम-संध्या। युते-साफ़-सुथरे, रैंगे। लावे-लाए। रूपवती-सुंदरी। मुखड़े-मुख। हुक-एक। दमक-चमक। घरोंदे-मिट्टी के घर। दिए-दीपक।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘रुबाइयाँ’ से उद्धृत है। इसके रचयिता उर्दू-फ़ारसी के प्रमुख शायर फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें दीवाली के त्योहार का वर्णन किया गया है।
व्याख्या-शायर कहता है कि आज दीवाली की शाम है। इस अवसर पर घर रंग-रोगन से पुता हुआ तथा सजा हुआ है। घरों में मिठाई के नाम पर चीनी के बने हुए खिलौने आते हैं। रोशनी भी की जाती है। माँ के सुंदर मुँह पर हलकी चमक-सी आ जाती है। वह बच्चे के छोटे-से घर में दिया जलाती है।

विशेष-

  1. आम व्यक्ति के घर में दीवाली के अवसर पर हुई रौनक का स्वाभाविक चित्रण है।
  2. माँ की ममता का सुंदर चित्रण है।
  3. दृश्य बिंब है-
    ‘रंग-रोगन से पुते और सजे घर’, ‘चीनी के खिलौने जगमगाते’, ‘रूपवती मुखड़े पै इक नर्मदमक’, ‘घरौदे में जलाती है दिए’।
  4. ‘रूपवती मुखड़ा’ व ‘नर्म दमक’ विलक्षण प्रयोग है।
  5. रुबाई छंद तथा भाषा का मिश्रित रूप है।

प्रश्न

(क) दीवाली पर लोग क्या करते हैं?
(ख) इस अवसर पर माँ बच्चे के लिए क्या लाती है?
(ग) माँ के चेहरे पर कैसा भाव आता हैं?
(ঘ) স্নাবিজ্ঞা লঙ্কল্লা সালানী ঐ লেখা লাজী?

उत्तर –

(क) दीवाली के अवसर पर लोग घरों में रंग-रोगन करते हैं तथा उसे सजाते हैं।
(ख) इस अवसर पर माँ बच्चे के लिए चीनी के बने खिलौने लाती है।
(ग) जब माँ बच्चे के घर में दिया जलाती है तो उसके सुंदर मुख पर दमक होती है।
(घ) माँ बच्चे के छोटे से घर में दिया जलाती है क्योंकि इस कार्य से बच्चा बहुत प्रसन्न होता है।

4.

आँगन में ठुनक रहा हैं जिदयाय है
बालक तो हई चाँद में ललचाया है

दर्पण उसे दे के कह रही हैं माँ
देख आईने में चाँद उतर आया है

शब्दार्थ-दुनक-मचलना, बनावटी रोना। जिदयाया-जिद के कारण मचला हुआ। हड़-है ही। दयण-शीशा। आड़ना-दर्पण।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘रुबाइयाँ’ से उद्धृत है। इसके रचयिता उर्दू-फ़ारसी के प्रमुख शायर फिराक गोरखपुरी हैं। इस रुबाई में बाल-हठ का वर्णन किया गया है।
व्याख्या-शायर कहता है कि छोटा बच्चा आँगन में मचल रहा है। वह जिद लगाए हुए है कि उसे आकाश का चाँद चाहिए। उसका मन उस चाँद पर ललचा गया है। माँ उसे दर्पण में चाँद दिखाते हुए कहती है कि देख बेटा, दर्पण में चाँद उतर आया है। इस तरह वह बच्चे की जिद पूरी करती है।

विशेष-

  1. बच्चे की जिद तथा माँ द्वारा उसके समाधान का स्वाभाविक वर्णन हुआ है। अत: स्वभावोक्ति अलंकार है।
  2. ‘जिदयाया’ और ‘हई’ शब्द का प्रयोग विशेष है। इससे कोमलता में वृद्धि हुई है।
  3. वात्सल्य रस घनीभूत है।
  4. चित्रात्मक शैली है।
  5. उर्दू-हिंदी मिश्रित भाषा है।
  6. ‘आईने में चाँद उतर आया’-सुंदर कल्पना है।
  7. ‘ठुनक’ शब्द में बच्चे के बाल-मनोविज्ञान का सहज वर्णन है।

प्रश्न

(क) कौन दुनक रहा है और जिदयाया है?
(ग) बाल – मनोविज्ञान के किस पक्ष का वर्णन हुआ है?
(ख) बच्चा किसको देखकर ललचाया है?
(घ) माँ अपने बेटे को किस तरह मनाती हैं?

उत्तर –

(क) बच्चा दुनक रहा है और जिदयाया हुआ है।
(ख) बच्चा चाँद को देखकर ललचाया है।
(ग) इसमें शायर ने बाल-मनोविज्ञान का सहज चित्रण किया है। बच्चे किसी भी बात या वस्तु पर जिद कर बैठते हैं तथा मचलने लगते हैं।
(घ) माँ बच्चे को दर्पण में चाँद का प्रतिबिंब दिखाकर उसे बहलाती है।

5.

रक्षाबंदन की सुबह रस की पुतली
छायी है घटा गगन की हलकी-हलकी

बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे
भाई के है बाँधती चमकती राखी

शब्दार्थ-रस की पुतली-आनंद की सौगात, मीठा बंधन। घटा-बादल। गगन-आकाश। लच्छा-राखी के चमकदार लच्छा।
प्रसंग-प्रस्तुत काव्यांश हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘रुबाइयाँ’ से उद्धृत है। इसके रचयिता उर्दू-फ़ारसी के प्रमुख शायर फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें रक्षाबंधन पर्व का वर्णन प्रकृति के माध्यम से किया गया है।
व्याख्या-कवि कहता है कि रक्षाबंधन की सुबह आनंद व मिठास की सौगात है। यह दिन मीठे बंधन का दिन है। सावन का महीना है। आकाश में काले-काले बादलों की हल्की घटाएँ छाई हुई हैं। इन बादलों में बिजली चमक रही है। इसी तरह राखी के लच्छे भी बिजली की तरह चमकते हैं। बहिन अपने भाई की कलाई पर चमकीली राखी बाँधती है।

विशेष

  1. रक्षाबंधन के त्योहार का प्रभावी चित्रण है।
  2. उर्दू-हिंदी मिश्रित भाषा है।
  3. ‘हलकी-हलकी’ में पुनरुक्ति प्रकाश तथा ‘बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे’ में उपमा अलंकार है।
  4. प्रसन्न बालिका को ‘रस की पुतली’ की संज्ञा दी गई है।
  5. रुबाई छंद का प्रयोग है।

प्रश्न

(क) ‘रस की पुतली ‘ कौन है? उसे यह संज्ञा क्यों दी गई हैं?
(ख) राखी के दिन कैसा मौसम है? बताइए।
(ग) ‘बिजली की तरह चमक रहे हैं लच्छे।-पक्ति का आशय बताइए।
(घ) बहन किसके हाथों में कैसी राखी बाँधती है?

उत्तर –

(क) ‘रस की पुतली’ राखी बाँधने वाली बहन है। उसे यह संज्ञा इसलिए दी गई है क्योंकि उसके मन मैं अपने भाई के प्रति अत्यधिक स्नेह है।
(ख) राखी के दिन आकाश में हलके-हलके काले बादल छाए हैं तथा बिजली भी चमक रही है।
(ग) इसका अर्थ यह है कि राखी में जो चमकदार लच्छे हैं, वे बिजली की तरह चमकते हैं।
(घ) बहन अपने भाई के हाथों में चमकती राखी बाँधती है।

(ख) गजल

1.

नौरस गुंचे पंखडियों की नाजुक गिरहैं खोले हैं
या उड़ जाने को रंगो-बू गुलशन में पर तोले हैं।

शब्दार्थ-नौरस-नया रस। गुच-कली। नाजुक-कोमल। गिरहें-बंधन, गुत्थियाँ। बू-खुशबू। गुलशन-बाग-बगीचा। पर तोलना-पंख फैलाकर उड़ना।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में बसंत ऋतु का वर्णन किया गया है।
व्याख्या-कवि कहता है कि बसंत ऋतु में नए रस से भरी कलियों की कोमल पंखुड़ियों की गाँठे खुल रही हैं। वे धीरे-धीरे फूल बनने की ओर अग्रसर हैं। ऐसा लगता है मानो रंग और सुगंध-दोनों आकाश में उड़ जाने के लिए पंख फड़फड़ा रहे हों। दूसरे शब्दों में, बाग में कलियाँ खिलते ही सुगंध फैल जाती है।

विशेष

  1. प्रकृति के सौंदर्य का सुंदर वर्णन है।
  2. उर्दू-फारसी भाषा का प्रयोग है।
  3. प्रसाद गुण है।
  4. बिंब योजना है।
  5. संदेह अलंकार है।
  6. रंग व खुशबू पर मानवीय क्रियाओं के आरोपण से मानवीकरण अलंकार है।

प्रश्न

(क) कवि ने किस ऋतु का वर्णन किया हैं?
(ख) पहली पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘नीरस ‘विशेषण से क्या अभिप्राय हैं?
(घ) कलियाँ किस तैयारी में हैं?

उत्तर –

(क) कवि ने बसंत ऋतु का वर्णन किया है।
(ख) इसका अर्थ यह है कि बसंत ऋतु में कलियों में नया रस भरा होता है और वे अपनी पंखुड़ियों से कोमल बंधनों को खोल रही हैं।
(ग) इसका अर्थ है-नया रस। बसंत के मौसम में कलियों में नया रस भर जाता है।
(घ) कलियाँ फूल बनने की तैयारी में हैं। उनके खिलने से खुशबू चारों तरफ फैल जाएगी।

2.

तारे आँखें झपकावें हैं जर्रा – जर्रा सोये हैं
तुम भी सुनो हो यारो। शब में सन्नाटे कुछ बोले हैं।

शब्दार्थ-बंद करते और खोलते। जरा-ज़रा-कण-कण। शब-रात। सन्नाटा-मौन, चुप्पी।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में उद्धृत ‘गज़ल’ से संकलित है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने रात के तारों का सौंदर्य वर्णन किया है।
व्याख्या-शायर कहता है कि रात ढल रही है। अब तारे भी आँखें झपका रहे हैं। इस समय सृष्टि का कण-कण सो रहा है, शांत है। वह कहता है कि हे मित्रो! रात में पसरा यह सन्नाटा भी कुछ कह रहा है। यह भी अपनी वेदना व्यक्त कर रहा है।

विशेष

  1. प्रकृति के उद्दीपन रूप का चित्रण है।
  2. ‘जर्रा-जर्रा’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  3. ‘सन्नाटे का बोलना’ में मानवीकरण तथा विरोधाभास अलंकार है।
  4. तारों का मानवीकरण किया गया है।
  5. उर्दू शब्दावली है।

प्रश्न

(क) रात के समय कैसा दूश्य हैं?
(ख) ज़र्रा-ज़र्रा हैं में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है
(ग) शब में कौन बोलता हैं तथा कैसे?
(घ) कवि किसे संबोधित कर रहा है तथा क्यों?

उत्तर –

(क) रात के समय वातावरण शांत है। आकाश में तारे आँखें झपकाते हुए लगते हैं।
(ख) इसका अर्थ है-रात के समय सारी सृष्टि शांत हो जाती है। हर जगह सन्नाटा छा जाता है।
(ग) रात में सन्नाटा बोलता है। इस समय चुप्पी की आवाज सुनाई देती है।
(घ) कवि दोस्तों को संबोधित करता है और बताता है कि रात को खामोशी भी बोलती हुई लगती है।

3.

हम हों या किस्मत हो हमारी दीनों को इक ही काम मिला
किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो ले हैं।

शब्दार्थ-किस्मत-भाग्य। द्वक-एक। लेवे हैं-लेती है।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से लिया गया है। इसके रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने मनुष्य के दोषारोपण करने की प्रवृत्ति के विषय में बताया है।
व्याख्या-शायर कहता है कि संसार में मेरी किस्मत और मैं खुद दोनों ही एक जैसे हैं। हम दोनों एक ही काम करते हैं। अभाव के लिए मैं अपनी किस्मत को दोषी मानता हूँ तथा इसलिए किस्मत पर रोता हूँ। किस्मत मेरी दशा को देखकर रोती है। वह शायद मेरी हीन कर्मनिष्ठा को देखकर झल्लाती है।

विशेष

  1. निराशा व अकर्मण्यता पर व्यंग्य है।
  2. उर्दू-फारसी शब्दों का प्रयोग है।
  3. ‘किस्मत’ को मानवीय क्रियाएँ करते हुए दिखाया गया है। अत: मानवीकरण अलंकार है।
  4. गजल छंद है।
  5. ‘हम’ कहना उर्दू की पहचान है।

प्रश्न

(क) कवि किस-किसको समान बताता है?
(ख) ‘किस्मत हमको रो ले है।’ -अर्थ स्पष्ट करें।
(ग) कवि तथा किस्मत क्या कार्य करते हैं?
(घ) कवि ने मानव स्वभाव के बारे में किस सत्य का उल्लेख किया हैं?

उत्तर –

(क) कवि ने स्वयं तथा भाग्य को एक समान बताया है।
(ख) इसका अर्थ यह है कि कवि की बदहाली को देखकर किस्मत उसकी अकर्मण्यता पर झल्लाती है।
(ग) कवि अपनी दयनीय दशा के लिए भाग्य को दोषी ठहराता है तथा किस्मत उसकी अकर्मण्यता को देखकर झल्लाती है। दोनों एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते हैं।
(घ) कवि ने अपने माध्यम से मानव स्वभाव के बारे में उस सत्य का उल्लेख किया है कि किसी भी प्रकार की अभावग्रस्तता होने पर वह किस्मत को ही दोषी ठहराता है।

4.

जो मुझको बदनाम करे हैं काश वे इतना सोच सकें
मेरा परदा खोले हैं या अपना परदा खोले हैं।

शब्दार्थ-काटा-ऐसा हो सकता तो । यरदा-रहस्य।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से लिया गया है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने निंदकों पर प्रहार किया है।
व्याख्या-शायर कहता है कि संसार में कुछ लोग उसे बदनाम करना चाहते हैं। ऐसे निंदकों के लिए कवि कामना करता है कि वे केवल यह बात समझ सकें कि वे मेरी जो बुराइयाँ संसार के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं, उससे खुद उनकी कमियाँ उजागर हो रही हैं। वे मेरा परदा खोलने की बजाय अपना परदा खोल रहे हैं।

विशेष

  1. शायर ने दूसरों को बदनाम करने वालों पर व्यंग्य किया है।
  2. उर्दू भाषा का प्रयोग है।
  3. गजल छंद है।
  4. भाषा में प्रवाह है।

प्रश्न

(क) निदा करने वाले दूसरों की निदा के साथ-साथ अपनी निदा स्वय कर जाते हैं, कैसे?
(ख) निदक किन्हें कहते हैं? वे किसे बदनाम करना चाहते हैं?
(ग) कवि कुछ लोगों को सचेत क्यों करना चाहता है?
(घ) ‘मेरा परदा खोले हैं-आशय स्पष्ट करें।

उत्तर –

(क) निंदक किसी की बुराइयाँ जब दूसरों के सामने प्रस्तुत करते हैं तो उससे उनकी अपनी कमियाँ स्वयं प्रकट हो जाती हैं। इस प्रकार वे अपनी निंदा स्वयं कर जाते हैं।
(ख) निंदक वे लोग होते हैं जो अकारण दूसरों की कमियों को बिना सोचे-समझे दूसरों के समक्ष प्रस्तुत कर देते हैं। ऐसे लोग कवि को बदनाम करना चाहते हैं।
(ग) कवि कुछ लोगों को इसलिए सचेत करना चाहता है क्योंकि जो लोग कवि को बदनाम करना चाहते हैं, उन्हें इतना समझना चाहिए कि इस कार्य से वे अपने रहस्य भी दूसरों को बता रहे हैं।
(घ) इसका अर्थ यह है कि कवि के विरोधी उसकी कमियों को समाज के सामने प्रस्तुत करते हैं ताकि उसकी बदनामी हो जाए।

5.

ये कीमत भी अदा करे हैं हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास
तेरा सौदा करने वाले दीवाना भी हो ली हैं।

शब्दार्थ-कामत-मूल्य। अदा-चुकाना। बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास-विवेक के साथ। दीवाना-प्रेमी। सौदा करने वाले-चाहने वाले, प्रेम करने वाले।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें कवि ने प्रेम की कीमत अदा करने के बारे में बताया है।
व्याख्या-कवि कहता है कि हम पूरे विवेक के साथ तुम्हारे प्रेम के लिए पूरी कीमत अदा कर रहे हैं। हम तुम्हारे प्रेम का सौदा करने वाले हैं, इसके लिए हम दीवाना बनने को भी तैयार हैं। कवि कहता है कि जो प्रेमी है, वह समाज की नजरों में पागल होता है।

विशेष

  1. कवि ने प्रेम के संपूर्ण समर्पण का वर्णन किया है।
  2. उर्दू शब्दावली का प्रभावी प्रयोग है।
  3. ‘कीमत अदा करना’ मुहावरे का प्रयोग है।
  4. गजल छंद है।

प्रश्न

(क) ‘हम बदुरुस्ती-ए-होशो-हवास’ का अर्थ बताइए।
(ख) कवि किसे संबोधित करता है?
(ग) ‘सौदा करने’ से क्या अभिप्राय है?
(घ) कवि किसकी कीमत अदा करने की बात कहता है?

उत्तर –

(क) इसका अर्थ है-हम पूरे होशोहवास से। दूसरे शब्दों में ‘हम पूरे विवेक से’।
(ख) कवि प्रियतमा को संबोधित करता है।
(ग) इसका अर्थ है—किसी चीज को खरीदना। यहाँ यह प्रेम की कीमत अदा करने से संबंधित है।
(घ) कवि प्रेम की कीमत अदा करने की बात कहता है।

6.

तेरे गम का पासे-अदब हैं कुछ दुनिया का खयाल भी हैं
सबसे छिपा के दर्द के मारे चुपके-चुपके रो ले हैं।

शब्दार्थ-गम-दुख, पीड़ा। पासे-अदब-लिहाज, सम्मान का भाव। दुनिया-संसार। खयाल-ध्यान।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गज़ल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें शायर ने प्रेम की पीड़ा को व्यक्त किया है।
व्याख्या-कवि अपनी प्रेमिका से कहता है कि मुझे तुम्हारे गम का पूरा ख्याल है। मैं तुम्हारी पीड़ा का सम्मान करता हूँ, परंतु मुझे संसार का भी ध्यान है। यदि मैं हर जगह तुम्हारे दिए दुख को सबके सामने गाता फिरूं तो दुनिया हमारे प्रेम को बदनाम करेगी। इसलिए मैं इस पीड़ा को अपने हृदय में छिपा लेता हूँ और चुपचाप अकेले में रो लेता हूँ। आशय यह है कि प्रेमी अपने दुख को संसार के सामने प्रकट नहीं करते।

विशेष

  1. कवि ने विरह-भावना का प्रभावी चित्रण किया है।
  2. उर्दू मिश्रित हिंदी भाषा है।
  3. ‘चुपके-चुपके’ में पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार है।
  4. गजल छंद है।
  5. वियोग श्रृंगार रस है।

प्रश्न

(क) ‘तेरे गम का पास-अदब हैं – भाव स्पष्ट कीजिए।
(ख) कवि को किसका ख्याल हैं, क्यों?
(ग) कवि चुपके-चुपके क्यों रोता है?
(घ) कवि की मनोदशा कैसी है?

उत्तर –

(क) इसका अर्थ यह है कि कवि के मन में अपने प्रिय की विरह-वेदना के प्रति पूर्ण सम्मान है।
(ख) कवि को सांसारिकता का ख्याल है क्योंकि वह सामाजिक प्राणी है और अपने प्रेम को बदनाम नहीं होने देना चाहता।
(ग) कवि अपने प्रेम को दुनिया के लिए मजाक या उपहास का विषय नहीं बनाना चाहता। इसी कारण वह चुपके-चुपके रो लेता है।
(घ) कवि प्रेम के विरह से पीड़ित है। उसे संसार की प्रवृत्ति से भी भय है। वह अपने वियोग को चुपचाप सहन करता है ताकि बदनाम न हो।

7.

फितरत का कायम हैं तवाजुन आलमे हुस्नो-इश्क में भी
उसको उतना ही पाते हैं खुद को जितना खो ले हैं।

शब्दार्थ-फितरत-स्वभाव। कायम-स्थापित करना। तवाजुन-संतुलन। आलमे-हुस्न-द्वश्क-प्रेम और सौंदर्य का संसार। खुद-स्वय।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रेम की प्राप्ति का उपाय बताया है।
व्याख्या-कवि कहता है कि प्रेम और सौंदर्य के संसार में संतुलन कायम है। इसमें हम उतना ही प्रेम पा सकते हैं जितना हम स्वयं को खोते हैं। दूसरे शब्दों में, प्रेम में पहले स्वयं को मिटाना पड़ता है। जो व्यक्ति जितना अधिक समर्पण करता है, वह उतना ही प्रेम पाता है।

विशेष

  1. कवि ने प्रेम के स्वभाव को स्पष्ट किया गया है।
  2. कबीर के साथ भाव-साम्य है जिन खोजा तिन पाइयाँ गहरे पानी पैठि। मैं बपुरा खोजन चला, रहा किनारे बैठि।
  3. ‘खोकर पाने में’ विरोधाभास अलंकार है।
  4. उर्दू-मिश्रित हिंदी भाषा का प्रयोग है।
  5. गजल छंद है।

प्रश्न

(क) कवि किस संतुलन की बात करता है?
(ख) ‘आलमे-हुस्नो-इश्क’ का अर्थ बताइए।
(ग) प्रिय को कैसे पाया जा सकता है?
(घ) ‘खुद को खोने’ का भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर –

(क) कवि प्रेम और सौंदर्य के लिए खोने और पाने में संतुलन की बात करता है।
(ख) इसका अर्थ है-प्रेम और सौंदर्य की दुनिया।
(ग) प्रिय को पाने का एकमात्र उपाय है-खुद को प्रेमी के प्रति समर्पित कर देना।
(घ) इसका अर्थ है-अहं भाव को छोड़कर प्रेमी के प्रति समर्पित होना।

8.

आबो-ताब अश्आर न पूछो तुम भी आँखें रक्खो हो
ये जगमग बैतों की दमक है या हम मोती रोले हैं।

शब्दार्थ-आबो-ताब अश्आर-चमक-दमक के साथ। आँखें रक्खो हो-देखने में समर्थ हो । बैत-शेर । दमक-चमक । मोती रोले—आँसू छलकाना।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इसमें कवि ने अपने काव्य-सृजन का आधार अपनी व्यथा बताया है।
व्याख्या-कवि कहता है कि तुम्हें मेरी शायरी में जो चमक-दमक दिखाई देती है, उस पर फ़िदा मत होओ। तुम्हें अपनी आँखें खुली रखनी चाहिए अर्थात ध्यान से देखना चाहिए। मेरे शेरों में जो चमक है, वह मेरे आँसुओं की देन है। दूसरे शब्दों में, कवि की पीड़ा से उसके काव्य में दर्द उभरकर आया है।

विशेष

  1. कवि ने विरह को काव्य के सृजन का आधार बताया है।
  2. बच्चन ने भी कहा है-
    मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
    मैं फूट पड़ा, तुम कहते छंद बनाना।
  3. ‘मोती रोले’विरह को व्यक्त करता है।
  4. ‘आँखें रखना’ मुहावरे का सुंदर प्रयोग है।
  5. उर्दू की कठिन शब्दावली का प्रयोग किया गया है।
  6. ‘आबो-ताब’ में अनुप्रास अलंकार है।
  7. वियोग श्रृंगार रस है।

प्रश्न

(क) कवि किसकी चमक की बात कर रहा हैं?
(ख) ‘आँखें’ रक्खो हो’ का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ग) ‘जगमग बैंतों की चमक’ का आशय बताइए।
(घ) ‘या हम सोती रोले हैं’ का अर्थ बताइए।

उत्तर –

(क) कवि अपनी शायरी की चमक की बात कर रहा है।
(ख) इसका अर्थ है-विवेक से हर बात को समझना, मर्म को जानना।
(ग) इसका अर्थ है-शेरो-शायरी का आलंकारिक सौंदर्य।
(घ) कवि कहता है कि मेरी कविता में विरह की वेदना व्यक्त हुई है।

9.

ऐसे में तू याद आए है अंजुमने-मय में रिंदों को
रात गए गर्दूं पै फ़रिश्ते बाबे-गुनह जग खोले हँ।

शब्दार्थ-अंजुमने-मय-शराब की महफ़िल। रिदों को-शराबियों को। गदू-आकाश। फरिश्ता-देवदूत। बाबे-गुनह-पाप का अध्याय । ज7-ससार ।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल” से उद्धृत है। इसके रचयिता फिराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में कवि ने प्रियजन की यादों का बखान किया है।
व्याख्या-कवि कहता है कि हे प्रिय! तुम वियोग के समय में इस तरीके से याद आते हो जैसे शराब की महफ़िल में शराबियों को शराब की याद आती है तथा जैसे आधी रात के समय देवदूत आकाश में संसार के पापों का अध्याय खोलते हैं।

विशेष

  1. विरहावस्था का सुंदर चित्रण है।
  2. ‘अंजुमने-मय, रिंदों, गर्दू, फरिश्ते, बाबे-गुनह’ आदि फ़ारसी शब्दों का सुंदर प्रयोग है।
  3. गजल छंद है।
  4. माधुर्य गुण है।
  5. वियोग श्रृंगार रस है।

प्रश्न

(क) प्रथम पंक्ति का भाव स्पष्ट कीजिए।
(ख) ‘तू ‘ कौन हैं? उसके बारे में कवि क्या कहता हैं?
(ग) रात में फ़रिश्ते क्या करते हैं?
(घ) ‘अंजुमने-मय में रिंदों को ‘ से कवि क्या बताता हैं?

उत्तर –

(क) प्रथम पंक्ति का भाव यह है कि शायर अपनी प्रिया, प्रेमिका को बहुत ही सिद्दत से याद करता है। यह याद ठीक वैसी है जैसे शराबखाने में शराबी को शराब याद आती है।
(ख) ‘तू कवि की प्रेमिका है। वह उसे विरह के समय याद आती है।
(ग) रात के समय देवदूत आकाश में सारे संसार के पापों का अध्याय खोलते हैं।
(घ) इसमें कवि शराबखाने में शराबियों की दशा का वर्णन करता है। यहाँ उसे शराब की बहुत याद आती है।

10.

सदके फिराक एजाज-सुखन के कैसे उड़ा ली ये आवाज
इन गजलों के परदों में तो ‘मीर’ की गजलें बोले हैं।

शब्दार्थ-सदके-कुर्बान। एजाज-सुखन-बेहतरीन काव्य। परदा-चरण।
प्रसंग-प्रस्तुत शेर हमारी पाठ्यपुस्तक ‘आरोह, भाग-2’ में संकलित ‘गजल’ से उद्धृत है। इसके रचयिता फ़िराक गोरखपुरी हैं। इस शेर में शायर अपनी शायरी पर ही मुग्ध है।
व्याख्या-फिराक कहते हैं कि उसकी गजलों पर लोग मुग्ध होकर कहते हैं कि फिराक, तुमने इतनी अच्छी शायरी कहाँ से सीख ली? इन गजलों के शब्दों से हमें ‘मीर’ कवि की गजलों की-सी समानता दिखाई पड़ती है। भाव यह है कि कवि की शायरी प्रसिद्ध कवि ‘मीर’ के समान उत्कृष्ट है।

विशेष

  1. कवि अपनी प्रशंसा स्वयं करता है।
  2. उर्दू शब्दावली की बहुलता है।
  3. गजल छंद है।
  4. ‘उड़ा लेना’ मुहावरे का अर्थ है-चुराना।
  5. गेयता है।

प्रश्न

(क) फिराक किस पर कुबनि हैं?
(ख) फिराक की शायरी किससे प्रभावित है।
(ग) कवि के प्रशंसकों ने क्या प्रतिक्रिया जताई।
(घ) ‘मीर की गजलें बोले हैं’ का भाव समझाइए

उत्तर –

(क) फिराक अपनी शायरी पर कुर्बान हैं।
(ख) फिराक की शायरी प्रसिद्ध शायर मीर से प्रभावित है।
(ग) कवि के प्रशंसकों ने कहा कि उसने कविता की यह सुंदरता कहाँ से उड़ा ली।
(घ) ‘मीर की गजलें बोले हैं’ का भाव यह है कि कवि फिराक गोरखपुरी की गजलों और सुप्रसिद्ध शायर ‘मीर’ की गजलों में पर्याप्त समानता है।

पाठ्यपुस्तक से हल प्रश्न

पाठ के साथ

प्रश्न 1:
शायर राखी के लच्छे को बिजली की चमक की तरह कहकर क्या भाव व्यंजित करना चाहता हैं?
उत्तर –
रक्षाबंधन एक मीठा और पवित्र बंधन है। रक्षाबंधन के कच्चे धागों पर बिजली के लच्छे हैं। वास्तव में सावन का संबंध घटा से होता है। घटा का जो संबंध बिजली से है वही संबंध भाई का बहन से है। शायर यही भाव व्यंजित करना चाहता है कि यह बंधन पवित्र और बिजली की तरह चमकता रहे।

प्रश्न 2:
खुद का परदा खोलने से क्या आशय है?
उत्तर –
‘खुद का परदा’ खोलने का आशय है-अपनी कमियों या दोषों को स्वयं ही प्रकट करना। यदि कोई व्यक्ति दूसरे की निंदा करता है तो वह अपनी स्वयं की ही कमजोरी व्यक्त कर रहा होता है। कवि की बुराई करने वाला अपनी बुराइयों से भी परदा उठाता है।

प्रश्न 3:
किस्मत हमको रो लेवे है हम किस्मत को रो लेवे हैं-इस पंक्ति में शायर की किस्मत के साथ तना-तनी का रिश्ता अभिव्यक्त हुआ है। चर्चा र्काजिए।
उत्तर –
ऊपर की पंक्ति को देखकर (पढ़कर) कहा जा सकता है कि शायर कभी भाग्यवादी नहीं रहा। वास्तव में किस्मत ने उसका कभी साथ नहीं दिया। वह इसलिए किस्मत पर भरोसा नहीं करता। जब कभी भाग्य की बात चलती है तो वह उसके नाम पर केवल रो लेता है।

टिप्पणी करें
प्रश्न

(क) गोदी के चाँद और गगन के चाँद का रिश्ता।
(ख) सावन की घटाएँ रक्षाबंधन का पर्व।

उत्तर –

(क) ‘गोदी के चाँद’ का अर्थ है-नन्हा कोमल बच्चा जो अपनी माँ की गोद में रहता है। वह अपनी माँ को खुशियाँ प्रदान करता है। उसका अप्रतिम सौंदर्य माँ को अभिभूत करता है। इसी तरह आकाश में चाँद होता है जो अपनी चाँदनी से संसार को उजाला देता है। वह बच्चों की तरह खुशी का प्रसार करता है। इसके अतिरिक्त, गगन का चाँद गोदी के चाँद को अच्छा लगता है।
(ख) सावन की घटा व रक्षाबंधन के त्योहार में अटूट संबंध है। राखी का त्योहार सावन के महीने में आता है। इस मौसम में घटाएँ आसमान में छाई रहती हैं। इसी तरह भाई-बहन के मन में प्यार की घटाएँ होती हैं।

कविता के आस-पास

प्रश्न 1:
इन रुबाइयों से हिंदी, उर्दू और लोकभाषा के मिले-जुले प्रयोगों को छाँटिए।
उत्तर –आँगन में लिए चाँद के टुकड़े को खड़ी।

  • रह-रह के हवा में जो लोका देती है।
  • उलझे हुए गेसुओं में कंघी करके
  • दीवार की शाम घर पुते और सजे
  • बालक तो हुई चाँद पें ललचाया है।
  • आँगन में ठनक रहा है ज़िदयाया है।
  • देख आईने में चाँद उतर आया है।

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