रीतिमुक्त धारा के सिरमौर: घनानंद (1689-1739 ई.)
1. जीवन परिचय
- जन्म: संवत् 1746 (लगभग 1689 ई.), बुलंदशहर, उत्तर प्रदेश।
- जाति: कायस्थ।
- पद: दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के ‘मीर मुंशी’ (प्रधान सचिव)।
- प्रेम और वैराग्य: घनानंद सुजान नामक नर्तकी से प्रेम करते थे। दरबार से निष्कासन के बाद सुजान द्वारा साथ न जाने पर उन्हें वैराग्य हो गया और वे वृन्दावन जाकर निम्बार्क सम्प्रदाय में दीक्षित हो गए।
- मृत्यु: संवत् 1796 (1739 ई.) में नादिरशाह के आक्रमण के दौरान सैनिकों द्वारा मारे गए।
2. ऐतिहासिक प्रसंग: निष्कासन और बलिदान
- दरबारी षड्यंत्र: ईर्ष्यालु सामंतों के कहने पर जब सुजान को दरबार में बुलाया गया, तब घनानंद ने सुजान की ओर मुँह और बादशाह की ओर पीठ करके गाया। गायन श्रेष्ठ था, पर ‘बेअदबी’ के कारण उन्हें देश निकाला मिला।
- ‘जर’ बनाम ‘रज’: नादिरशाह के सैनिकों ने जब उनसे ‘जर-जर’ (धन) माँगा, तो उन्होंने ‘रज-रज’ (धूल) कहकर वृन्दावन की मिट्टी उन पर फेंक दी। क्रोधित सैनिकों ने उनके हाथ काट दिए।
- अंतिम संदेश: मरते समय उन्होंने अपने रक्त से सुजान के नाम संदेश लिखा:“अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान, चाहत चलन ये सँदेशो लै सुजान को।”
3. काव्यगत विशेषताएँ
- प्रेम की पीर: घनानंद वियोग शृंगार के अद्वितीय कवि हैं। उनका प्रेम अंतर्मुखी और पवित्र है।
- अनुभूति की प्रधानता: उनकी कविता ‘इन्द्रियानुभूति’ (शारीरिक) नहीं, बल्कि ‘हृदयानुभूति’ (भावनात्मक) है।
- सांकेतिकता और रहस्यवाद: उनके काव्य में कहीं-कहीं रहस्यात्मकता मिलती है। उनके लिए ‘सुजान’ केवल एक स्त्री नहीं, बल्कि ‘सु+ज्ञान’ (परमात्मा) का प्रतीक बन गई।
- प्रेम का मार्ग: उन्होंने प्रेम को अत्यंत सरल और निश्छल माना है:“अति सूधो सनेह को मारग है, जहँ नैकु सयानप बाँक नहीं।”
4. प्रमुख कृतियाँ
घनानंद ने ब्रजभाषा में कई महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की:
- सुजानसागर
- विरह लीला
- कोकसार
- रसकेलिबल्ली
- इश्कलता
- ब्रजविलास
- कृपाकंद
- गोकुलगीता
5. विद्वानों के मत
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल: “प्रेम मार्ग का ऐसा प्रवीण और धीर पथिक तथा जवाँदानी का ऐसा दावा करने वाला ब्रजभाषा का दूसरा कवि नहीं हुआ।”
निष्कर्ष
घनानंद का काव्य लौकिक प्रेम से शुरू होकर अलौकिक भक्ति (ईश्वर) तक पहुँचता है। उनकी कविता में भावों का ऐसा तीव्र प्रवाह है जो पाठक के हृदय को सीधे स्पर्श करता है।
