वंशानुक्रम का अर्थ,प्रभाव और महत्व

वंशानुक्रम का अर्थ, वंशानुक्रम की परिभाषा और वंशानुक्रम का प्रभाव :-

किसी भी शिशु का विकास उसकी माँ के गर्भधारण की अवस्था से ही प्रारंभ हो जाता है, शिशु का ऐसा विकास जो उसके माता-पिता से संबंधित होता वंशानुक्रम कहलाता है।

वंशानुक्रम का अर्थ :-

वंशानुक्रम के नाम से ही आप उसके अर्थ का अंदाजा लगा सकते हैं वंशानुक्रम सीधे तौर पर वंश से संबंधित है अर्थात इसमें वंशानुक्रम में शिशु के विकास में माता पिता की भूमिका तो होती ही है साथ ही साथ शिशु के माता-पिता के माता-पिता की भी भूमिका होती है। इसीलिए इसका नाम वंशानुक्रम है, और मनुष्य के विकास में इसका प्रभाव पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता रहता है।

सरल शब्दों में वंशानुक्रम का अर्थ :-

वंशानुक्रम का साधारण अर्थ में जैसे के तैसे से या समान के समान से मतलब जैसे माता-पिता होते हैं, उनकी सन्तान भी वैसी ही होती है।

वंशानुक्रम के अर्थ में भी कह सकते हैं कि जैसे जीव होते हैं, वे अपने ही जैसे जीवों को जन्म देते हैं। बालक के शारीरिक रूप-गुण अपने माता – पिता के अनुरूप होते हैं, ये वंशानुक्रम का ही एक उदाहरण है।

मनोवैज्ञानिकों का यह भी कहना है कि संतान अपने माता-पिता से शारीरिक गुणों के साथ-साथ मानसिक गुण भी प्राप्त करता है, लेकिन ऐसा जरूरी नहीं है, मतलब उदाहरण के तौर पे ऐसा जरूरी नही है कि मंद-बुद्धि माता-पिता की संतानें भी मंद-बुद्धि हों।

संतान शारीरिक एवं मानसिक गुण अपने माता-पिता अलावा उनके पूर्वजों से भी प्राप्त करता है। इस प्रक्रिया को आनुवंशिकता भी कहते हैं।

अगर बिल्कुल सरल शब्दों में कहें तो वंशानुक्रम का अर्थ सीधे तौर पर शिशु के जन्म और माता-पिता से संबंधित है।

वंशानुक्रम की परिभाषा :-

अलग-अलग मनोवैज्ञानिकों ने विभिन्न प्रकार से वंशानुक्रम की परिभाषाएँ दी हैं उनमें कुछ यहाँ दी गईं हैं :–

जे. ए. थाम्पसन के अनुसार वंशानुक्रम की परिभाषा

“वंशानुक्रम, क्रमबद्ध पीढ़ियों के बीच उत्पत्ति सम्बन्धी, सम्बन्ध के लिये सुविधाजनक शब्द है।”

वुडवर्थ के अनुसार वंशानुक्रम की परिभाषा :-

“वंशानुक्रम में वे सभी बातें आ जाती हैं जो जीवन का आरम्भ करते समय व्यक्ति में उपस्थित थीं। ये जन्म के समय नहीं बल्कि गर्भाधान के समय जन्म से लगभग नौ माह पूर्व ही व्यक्ति में आने लगती हैं।”

एच. ए. पेटरसन के अनुसार वंशानुक्रम को इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है

“व्यक्ति अपने माता पिता के माध्यम से पूर्वजों के जो कुछ गुण प्राप्त करता है, वही वंशानुक्रम कहलाता है।”

जेम्स ड्रेवर के अनुसार वंशानुक्रम की परिभाषा

“माता – पिता की शारीरिक एवं मानसिक विशेषताओं का सन्तानों में संक्रमित होना ही वंशानुक्रम है।”

बी. एन. झा के अनुसार वंशानुक्रम की परिभाषा :-

“वंशानुक्रम, व्यक्ति की जन्मजात विशेषताओं का पूर्ण योग है”

पी. जिस्बर्ट के शब्दों में वंशानुक्रम की परिभाषा :-

“प्रकृति में प्रत्येक पीढ़ी का कार्य माता-पिता द्वारा सन्तानों में कुछ जैवकीय या मनोवैज्ञानिक विशेषताओं का हस्तान्तरण करना है। इस प्रकार हस्तांतरित विशेषताओं की मिली-जुली गठरी को वंशानुक्रम के नाम से पुकारा जाता है।”

एन एनास्टमी के अनुसार वंशानुक्रम की परिभाषा

“वंशानुक्रम के तत्त्व जन्म के बहुत बाद तक व्यक्ति के विकास को प्रभावित कर सकते हैं, और वास्तव में यह प्रभाव जीवनपर्यन्त चलता है।”

रूथ बेंडिक्ट के शब्दों में वंशानुक्रम की परिभाषा :-

“वंशानुक्रम माता-पिता से सन्तान को प्राप्त होने वाले गुणों का नाम है।”

डगलस व हॉलैण्ड के अनुसार वंशानुक्रम की परिभाषा :-

“माता-पिता या अन्य पूर्वज या प्रजाति से प्राप्त समस्त शारीरिक रचनाएँ, विशेषताएँ, क्रियाएँ अथवा क्षमताएँ व्यक्ति के वंशानुक्रम में सम्मिलित रहती हैं।”

इन दी गयीं परिभाषाओं से स्पष्ट है कि संतान को अपने माता-पिता से प्राप्त गुण के साथ-साथ उनके (माता-पिता) माध्यम से पूर्वजों के गुणों की प्राप्ति भी वंशानुक्रम के अन्तर्गत आती है।

वातावरण का अर्थ

वातावरण पर्यावरण से भिन्न नही है। वातावरण पर्यावरण का ही पर्याय है। अर्थात हमारे आसपास का माहौल ही वातावरण है। आइये इसे और आसान भाषा मे समझा जाये।

वातावरण का अर्थ स्पष्ट रूप में

ऐसा आवरण जो हमे चारों ओर से घेरे हुए वही वातावरण है। इसको और समझने के लिए विभिन्न मनोवैज्ञानिक के अनुसार इसकी परिभाषा जान लेते हैं।

विभिन्न शिक्षाशास्त्रियों के अनुसार “वातावरण की परिभाषा”

रॉस के अनुसार वातावरण की परिभाषा

“वातावरण वह बाहरी शक्ति है जो हमे प्रभावित करती है।”

वुडवर्थ के शब्दों में वातावरण

“वातावरण में वे सभी बाह्य तत्व आ जाते हैं जिन्होंने व्यक्ति को जीवन आरम्भ करने के समय से प्रभावित किया है।”

पी जिसबर्ट के अनुसार वातावरण की परिभाषा

“वातावरण उन सबको कहते हैं जो किसी वस्तु को चारों ओर से घेरे रहती है और उस पर प्रत्यक्ष प्रभाव डालती है।”

बालक के विकास में वंशानुक्रम का प्रभाव :-

यहाँ हम आपको बालक के जीवन में वंशानुक्रम के प्रभावों में से कुछ प्रमुख प्रभावों के बारे में बताएँगे जो कि निम्नलिखित हैं–

  1. वंशानुक्रम का मूल शक्तियों पर प्रभाव
  2. वंशानुक्रम का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव
  3. वंशानुक्रम का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव
  4. वंशानुक्रम का व्यावसायिक योग्यता पर प्रभाव
  5. वंशानुक्रम का सामाजिक स्थिति पर प्रभाव
  6. वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव
  7. वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव
  8. वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव

वातावरण का प्रभाव :-

मनोवैज्ञानिकों द्वारा किये गए अध्ययन के आधार पर यह साबित होता है, कि बालक के व्यक्तित्व पर भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण का महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यहाँ वातावरण का व्यक्ति के जीवन में पड़ने वाले प्रमुख प्रभावों को बताया गया है, जो कि निम्नलिखित हैं–

  1. वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव
  2. वातावरण का मानसिक विकास पर प्रभाव
  3. वातावरण का बुद्धि पर प्रभाव
  4. वातावरण का व्यक्तित्व पर प्रभाव
  5. वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव
  6. वातावरण का अनाथ बच्चों पर प्रभाव
  7. वातावरण का जुड़वाँ बच्चों पर प्रभाव
  8. वातावरण का बालक पर बहुमुखी प्रभाव

1. वंशानुक्रम का मूल शक्तियों पर प्रभाव :-

थॉर्नडाइक ने बालक के जीवन और विकास में बालक की मूल शक्तियों में वंशानुक्रम के प्रभाव को वरीयता दी है। थॉर्नडाइक का मानना है कि बालक की मूल शक्तियों का मुख्य कारण उसका वंशानुक्रम है।

2. वंशानुक्रम का शारीरिक लक्षणों पर प्रभाव :-

वंशानुक्रम का प्रभाव मानव के शारिरिक लक्षणों में भी पड़ता है। कार्ल पीयरसन वंशानुक्रम के शारिरिक लक्षणों के प्रभावों के संबंध में अपना मत दिया है कि यदि ” माता-पिता की लम्बाई का असर उनकी संतानों में भी पड़ता है, जो कि एक प्रकार का शारिरिक लक्षण है।

3. वंशानुक्रम का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव :-

वंशानुक्रम का प्रजातियों की श्रेष्ठता में गहरा प्रभाव पड़ता है, इसके संबंध में क्लिनबर्ग ने अपने विचार देते हुए कहा है कि “बुद्धि की श्रेष्ठता का कारण प्रजाति है। यही कारण है कि अमरीका की श्वेत प्रजाति, नीग्रो प्रजाति से श्रेष्ठ है।” हैनलकक हांलाकि क्लिनबर्ग के इस विचार में बहुत से मनोवैज्ञानिकों में मतभेद भी रहा है।

4. वंशानुक्रम का व्यावसायिक योग्यता पर प्रभाव :-

कैटल ने व्यावसायिक योग्यता का मुख्य कारण वंशानुक्रम को ही मानते हैं। कैटल ने व्यावसायिक में वंशानुक्रम का प्रभाव का पता करने के लिए अमेरिका के 885 वैज्ञानिकों के परिवारों का की योग्यता का अध्ययन किया और बताया कि कुल 885 वैज्ञानिक परिवारों में से व्यवसायी वर्ग से संबंध रखने वाले परिवारों की संख्या कुल संख्या का 2/5 थी, इसी प्रकार उत्पादक वर्ग के 1/2 और कृषि वर्ग के केवल 1/4 परिवार थे।

5. वंशानुक्रम का सामाजिक स्थिति पर प्रभाव :-

विनशिप ने वंशानुक्रम का सामाजिक स्थिति पर प्रभाव के संबंध में अपने विचार देते हुए कहा है, कि गुणवान और प्रतिष्ठित माता-पिता की सन्तान भी अपने जीवनकाल में प्रतिष्ठा प्राप्त करती है।

विनशिप ने वंशानुक्रम के सामाजिक स्थिति पर प्रभाव में अपना मत देने से पहले उन्होंने एडवर्ड और उनकी पत्नी एलिजाबेथ के परिवार का अध्ययन किया जो कि (एडवर्ड और एलिजाबेथ) एक प्रतिष्ठित परिवार से संबंध रखते थे। जिनके वंशजों ने प्रतिष्ठित पदों पर कार्य किया और उनके वंशजों में से एक अमेरिका का उपराष्ट्रपति भी बना।

6. वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव :-

डगडेल का वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव पर मानना है कि चरित्रहीन माता-पिता की सन्तान चरित्रहीन होती है। और इसी प्रकार अच्छे चरित्र वाले माता पिता की संतानें भी अच्छी चरित्र वाली होती हैं।

डगडेल ने वंशानुक्रम का चरित्र पर प्रभाव पर अपना विचार सन 1877 ई. में ज्यूकस के वंशजों का अध्ययन करके दिया था।

7. वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव :-

गाल्टन का वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव के बारे में सीधा मत है, कि व्यक्ति की महानता का कारण उसका वंशानुक्रम है।

व्यक्ति का कद, वर्ण, स्वास्थ्य, बुद्धि, मानसिक शक्ति आदि उसके वंशानुक्रम पर आधारित होते हैं। वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव में गॉल्टन कहते हैं कि–

महान न्यायाधीशों, राजनीतिज्ञों, सैनिक पदाधिकारियों, साहित्यकारों, वैज्ञानिकों और खिलाड़ियों के जीवन चरित्रों का अध्ययन करने से ज्ञात होता है, कि इनके परिवारों में इन्हीं क्षेत्रों में महान कार्य करने वाले अन्य व्यक्ति भी हुए हैं।

– गाल्टन
(वंशानुक्रम का महानता पर प्रभाव)

8. वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव :-

गोडार्ड ने वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव पर कहा है, कि मन्द बुद्धि माता-पिता की सन्तान मन्द बुद्धि और तेज बुद्धि के माता-पिता की सन्तान तीव्र बुद्धि वाली होती है।

वंशानुक्रम के वृद्धि पर प्रभाव पर कोलेसनिक ने कहा है कि–

जिस सीमा तक व्यक्ति की शारीरिक रचना को उसके पित्रैक निश्चित करते हैं, उस सीमा तक उसके मस्तिष्क एवं स्नायु संस्थान की रचना, उसके अन्य लक्षण, उसकी खेल-कूद सम्बन्धी कुशलता और उसकी गणित सम्बन्धी योग्यता ये सभी बातें उसके वंशानुक्रम पर निर्भर होती हैं, पर वे बातें उसके वातावरण पर कहीं अधिक निर्भर होती है।

– कोलेसनिक
(वंशानुक्रम का वृद्धि पर प्रभाव)

उपरोक्त कथनों से स्पष्ट रूप से पता चलता है कि व्यक्ति के शारीरिक तथा मानसिक विकास पर वंशानुक्रम का प्रभाव पड़ता है।


बालक पर वातावरण का प्रभाव :-

मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्ति के विकास और जीवन पर पड़ने वाले वातावरण के प्रभाव के अनेकों अध्ययन करके साबित किया है, कि व्यक्ति के जीवन में वातावरण का प्रभाव बहुत अहम भूमिका निभाता है।

1. वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव :-

वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव के संबंध में फ्रेन्ज बोन्स का मत है कि–

विभिन्न प्रजातियों के शारीरिक अन्तर का कारण वंशानुक्रम न होकर वातावरण है।

– फ्रेन्ज बोन्स

फ्रेन्ज बोन्स ने अपने वातावरण का शारीरिक अन्तर पर प्रभाव पर दिए गए विचार को साबित करने के लिए अनेक उदाहरण दिए हैं कैसे कि फ्रेन्ज बोन्स ने कहा कि जो जापानी और यहूदी लोग अमेरिका में अनेक पीढ़ियों से निवास कर रहे हैं, उनकी लम्बाई अमेरिका के भौगोलिक वातावरण के कारण बढ़ गयी।

2. वातावरण का मानसिक विकास पर प्रभाव :-

वातावरण का मानसिक विकास पर पड़ने वाले प्रभाव के लिए गोर्डन का मानना है कि व्यक्ति को अपने चारों ओर उचित सामाजिक और सांस्कृतिक वातावरण न मिलने पर मानसिक उसकी विकास की गति धीमी हो जाती है।

गोर्डन ने अपने मत को लेकर नदियों के किनारे रहने वाले बच्चों का उदाहरण दिया और अध्ययन करके सिद्ध किया की इन बच्चों का वातावरण अच्छा न होने के कारण इनके विकास की गति पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा था।

3. वातावरण का बुद्धि पर प्रभाव :-

वातावरण का बुद्धि पर प्रभाव पर केंडोल ने अध्ययन करके बताया कि –

बुद्धि के विकास पर वातावरण का प्रभाव, बुद्धि के विकास पर पड़ने वाले वंशानुक्रम के प्रभाव की अपेक्षा अधिक होता है।

– केंडोल

केंडोल ने बुद्धि पर वातावरण के प्रभाव के बारे में जानने के लिए फ्रांस के 552 विद्वानों का अध्ययन करके पता लगाया कि उनमें से अधिकांश धनी वर्ग से सम्बन्धित थे। जिससे उनको शिक्षा ग्रहण करने की उपयुक्त सुविधाएँ उपलब्ध हुईं।

स्टीफैंस ने केंडोल का समर्थन किया और कहा की–

यदि बच्चों को अच्छे वातावरण में पाला जाये, तो उनकी बुद्धि-लब्धि में वृद्धि होती है।

– स्टीफैंस

4. वातावरण का व्यक्तित्व पर प्रभाव :-

वातावरण का व्यक्तित्व पर प्रभाव के सम्बंध में कूले 71 साहित्यकारों का अध्ययन करके पता लगाया कि उनमें से दो साहित्यकार निर्धन परिवारों के थे, किन्तु उत्तम वातावरण मिलने के कारण वे दोनों भी महान साहित्यकार बन सके।

उत्तम वातावरण में पलने पर बच्चों का व्यक्तित्व का विकास बहमुखी होता है। यदि निर्धन माता-पिता के बालक को अच्छे वातावरण में पाला जाये, तो वह भी अच्छे व्यक्तित्व का निर्माण कर सकता है।

5. वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव :-

वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव के संबंध में क्लार्क ने अपना मत देते हुये कहा है कि–

कुछ प्रजातियों की बौद्धिक श्रेष्ठता का कारण वंशानुक्रम न होकर वातावरण है।

– क्लार्क

क्लार्क ने वातावरण का प्रजाति की श्रेष्ठता पर प्रभाव में अपने विचार अमरीका के कुछ गोरे और नीग्रो लोगों की बुद्धि परीक्षा लेकर सिद्ध किया क्लार्क का कहना है कि, नीग्रो प्रजाति की बुद्धि का स्तर इसलिए निम्न है, क्योंकि उनको अमेरिका की श्वेत प्रजाति के समान शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक वातावरण उपलब्ध नहीं होता है।

6. वातावरण का अनाथ बच्चों पर प्रभाव :-

समाज कल्याण केन्द्रों में अनाथ और बेसहारा बच्चे आते है। वे साधारणतः निम्न परिवारों से संबंध रखते हैं, लेकिन समाज कल्याण केन्द्रों में उनका अच्छा पालन-पोषण होता है, और उनको एक बेहतर वातावरण भी मिलता है, जिससे उनको अच्छा व्यक्तित्व प्राप्त होता है।

इस प्रकार के वातावरण में पाले जाने वाले बच्चे समग्र रूप में अपने माता-पिता से अच्छे ही सिद्ध होते हैं।

– वुडवर्थ

7. वातावरण का जुड़वाँ बच्चों पर प्रभाव :-

जुड़वाँ बच्चों के शारीरिक लक्षणों, मानसिक शक्तियों, व्यवहार और शैक्षिक योग्यताओं में, अत्यधिक समानता होती है। लेकिन यदि दोनों बच्चों को अलग-अलग वातावरण में रखा जाए तो उनमें पर्याप्त अन्तर होता है।

न्यूमैन, फ्रीमैन और होलजिंगर ने 20 जोड़े जुड़वाँ बच्चों में प्रत्येक जोड़े के एक बच्चे को गाँव के फार्म पर और दूसरे को नगर में रखा। बड़े होने पर दोनों बच्चों में पर्याप्त अन्तर पाया गया।

पर्यावरण का बुद्धि पर साधारण और उपलब्धि पर अधिक व विशेष प्रभाव पड़ता है।

– स्टीफेन्स

8. वातावरण का बालक पर बहुमुखी प्रभाव :-

वातावरण, मनुष्य के शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, संवेगात्मक सहित सभी गुणों पर गहरा प्रभाव डालता है। इसकी पुष्टि एवेरॉन के जंगली बालक के उदाहरण से की–

एक बच्चे को जन्म के बाद ही भेड़िया उठा ले गया था और उसका पालन-पोषण जंगली पशुओं के बीच में हुआ था। कुछ शिकारियों ने उसे सन 1799 ई. में पकड़ लिया। उस समय उसकी आयु 11 या 12 वर्ष की थी। वह बच्चा पशुओं के समान हाथों-पैरों से चलता था। वह कच्चा मांस खाता था। उसमें मनुष्य के समान बोलने और विचार करने की शक्ति नहीं थी। उसको मनुष्य के समान सभ्य और शिक्षित बनाने के सब प्रयास विफल हुए।

वातावरण के मानव जीवन में पड़ने वाले प्रभावों के विषय में हुए स्टीफेन्स ने लिखा है–

बच्चा जितने अधिक समय उत्तम वातावरण में रहता है, उसका व्यक्तित्व उतना ही उत्तम होगा। हालांकि मनुष्य के व्यक्तित्व और वृद्धि में कुछ प्रभाव आनुवंशिकता भी होता है।

– स्टीफेन्स

वंशानुक्रम व वातावरण का महत्व

वंशानुक्रम और वातावरण के क्षेत्र में हुए विभिन्न प्रकार के अध्ययनों से आधुनिक शिक्षा की प्रणाली में शिक्षकों और बालकों को बहुत मदद मिली है।

वंशानुक्रम और वातावरण के सिद्धांतों का उपयोग करके हम बच्चों के समग्र विकास में नए आयामों को जगह मिली है।

वंशानुक्रम का महत्त्व :-

वंशानुक्रम का आज की शिक्षा प्रणाली और बच्चों के जीवन में पड़ने वाले असर और महत्व को हम निम्लिखित बिंदुओं की सहायता से समझ सकते हैं।

◆ वंशानुक्रम के असर से सभी बच्चों की शारिरिक संरचना में विविधता होती है, जिसके माध्यम से एक शिक्षक बच्चों की शारिरिक संरचना के आधार पर उसके विकास में ध्यान दे सकता है।

◆ बालकों और बालिकाओं में लिंगीय भेद का कारण भी वंशानुक्रम ही है, जिससे किसी खास विषय में बालक एवं बालिकाओं की रुचि और समझने की योग्यताओं में अंतर हो सकता है, जिसके ज्ञान के आधार पर शिक्षक उनकी और बेहतर ढंग से मदद कर सकता है।

◆ वंशानुक्रम के कारण बच्चों की जन्मजात क्षमताओं में अन्तर पाया जाता है, जिसके आधार पर उनके समग्र विकास के लिए आवश्यक सहायता की जा सकती है।

◆ वंशानुक्रम के फलस्वरूप बच्चों में अनेक प्रकार की विभिन्नताएँ पाई जाती हैं, शिक्षक बच्चों की इन विभिन्नताओं के आधार पर शिक्षा की आयोजना तैयार कर सकता है।

◆ वंशानुक्रम के नियम से हम यह जानते हैं, कि यदि किसी बच्चे के माता-पिता कम बुद्धि के हों तो यह जरूरी नहीं कि उनके बच्चे भी मंदबुद्धि के ही होंगे।

और इसका उल्टा भी सही है कि योग्य माता-पिता की संतानें अयोग्य भी हो सकती हैं। इन चींजों की जानकारी होना शिक्षकों और समाज के लिए जरूरी है, जिससे वह सभी बच्चों के साथ उचित व्यवहार कर सकें।

◆ बालकों को वंशानुक्रम से प्राप्त अच्छी और बुरी प्रवृत्तियों का अध्ययन करके उनकी बुरी प्रवित्तियों को खत्म करने के प्रयास किये जा सकते हैं।

वंशानुक्रम का महत्व पर वुडवर्थ का कथन

वुडवर्थ ने देहात और शहर के बच्चों के मानसिक स्तर मे भिन्नता का कारण वंशानुक्रम को माना है, वुडवर्थ ने वंशानुक्रम के महत्व को बताते हुए कहा है कि–

“देहाती बालकों की अपेक्षा शहरी बालकों के मानसिक स्तर की श्रेष्ठता, आंशिक रूप से वंशानुक्रम के कारण होती है। शिक्षक इस ज्ञान से अवगत होकर अपने शिक्षण को उनके मानसिक स्तरों के अनुसार बना सकता है ”
– वुडवर्थ

वातावरण का महत्त्व :-

◆ वातावरण हमारे जीवन में बहुत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। वातावरण से ही एक बालक के विकास की दिशा तय होती है। वातावरण का बच्चों की भावनाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ता है। अनुकूल वातावरण में ही जीवन का विकास होता है, और व्यक्ति आगे बढ़ता है।

◆ वातावरण का व्यक्ति के बर्ताव, चरित्र, देशप्रेमी आदि पर गहरा असर पड़ता है। व्यक्ति के व्यक्तित्व और उसके जीवन में वातावरण के महत्व को बताने के लिए विभिन्न विद्वानों ने अपने मत दिए हैं, जिनमें से कुछ हम आपको यहाँ बात रहें हैं।

सोरेन्सन का वातावरण के महत्व के बारे में मत

“शिक्षा का ज्ञान उत्तम वातावरण बालकों की बुद्धि और ज्ञान की वृद्धि में प्रशंसनीय योगदान देता है। इस बात की जानकारी रखने वाला शिक्षक अपने छात्रों के लिए उत्तम से उत्तम शैक्षिक वातावरण प्रदान करने की चेष्ठा कर सकता है ”
– सोरेन्सन

रूथ बैंडिक्ट का वातावरण के महत्व के बारे में मत

रूथ बैंडिक्ट ने वातावरण का जीवन में पड़ने वाले महत्व के बारे में कहना है कि –

“ व्यक्ति जन्म से ही एक निश्चित सांस्कृतिक वातावरण में रहता है और उसके आदर्शों के अनुरूप ही आचरण करता है। इस तथ्य को जानने वाला शिक्षक, बालक को अपना सांस्कृतिक विकास करने में योगदान दे सकता है ”
– रूथ बैंडिक्ट

शिक्षकों के लिए वातावरण का महत्व

◆ वातावरण के महत्त्व को समझने वाला शिक्षक, विद्यालय में बच्चों के लिए ऐसा वातावरण बना सकता है, जिससे बच्चों में विचारों अभिव्यक्ति, शिष्ट सामाजिक व्यवहार, कर्तव्यों और अधिकारों का ज्ञान इत्यादि गुणों का विकास हो सके।

◆ प्रत्येक समाज का अपना एक विशिष्ट वातावरण होता है। इसको समझने वाला शिक्षक विद्यालय में लघु समाज का वातावरण बनाकर विद्यार्थियों को अपने विस्तृत समाज के वातावरण से अनुकूलन करने की शिक्षा दे सकता है।

ऊपर दिए गए सन्दर्भों से यह पता चलता है कि वंशानुक्रम और वातावरण हमारे जीवन में कितना महत्व रखते हैं। शिक्षक को वंशानुक्रम और वातावरण दोनों के महत्व का ज्ञान होने से शिक्षक अपने छात्रों का वांछित और सन्तुलित विकास कर सकता है। सारेन्सन इसके सन्दर्भ में अपने विचारों को रखते हुए कहा है कि–

शिक्षक के लिए मानव-विकास पर वंशानुक्रम और वातावरण के सापेक्षिक प्रभाव और पारस्परिक सम्बन्ध का ज्ञान विशेष महत्त्व रखता है।
– सारेन्सन

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