भारतीय काव्यशास्त्र महत्त्वपूर्ण तथ्य


भारतीय काव्यशास्त्र: प्रमुख सिद्धांत, आचार्य और तथ्य

यह संकलन भारतीय काव्यशास्त्र के महत्वपूर्ण आचार्यों, उनके मतों, और स्थापित सिद्धांतों पर आधारित है।

1. काव्य-लक्षण एवं परिभाषा

  • वास्तविक काव्यलक्षण का प्रारंभ: आचार्य भामह से होता है, जिन्होंने “शब्दार्थोसहितौ काव्यम्” (शब्द और अर्थ के सहभाव) को काव्य की संज्ञा दी।
  • दण्डी का काव्यलक्षण: “शरीरं तावदिष्टार्थ व्यवच्छिन्ना पदावली” (इष्ट अर्थ से युक्त पदावली ही काव्य का शरीर है)।
  • विश्वनाथ का काव्यलक्षण:वाक्यं रसात्मकं काव्यम्” (रसात्मक वाक्य ही काव्य है)।
  • दोषपूर्ण परिभाषा:शब्दार्थो सहित काव्यम्” परिभाषा में अतिव्याप्ति दोष है।

2. काव्य हेतु (काव्य निर्माण के कारण)

आचार्यकाव्य हेतुओं की संख्या एवं नाम
रुद्रट, कुंतक, मम्मट3: शक्ति (प्रतिभा), व्युत्पत्ति (निर्मल शास्त्र ज्ञान), अभ्यास (अमंद अभियोग)। (मम्मट की पंक्ति: हेतुर्न तु हेतव:)।
दण्डी3: नैसर्गिकी प्रतिभा, निर्मल शास्त्र ज्ञान, अमंद अभियोग (अभ्यास)।
वामन3: लोक, विद्या, प्रकीर्ण।
हेमचंद्रप्रतिभा को काव्य का एकमात्र हेतु माना।
भामहमुख्य रूप से प्रतिभा को काव्य हेतु माना।
  • प्रतिभा के भेद:
    • रुद्रट: सहजा और उत्पाद्या
    • राजशेखर: कारयित्री (कवि में) और भावयित्री (सहृदय में)।
  • प्रतिभावादी आचार्य: पंडितराज जगन्नाथ को प्रतिभावादी कहा जाता है।

3. रस सिद्धांत

रस सिद्धांत का प्रथम ग्रंथ और व्याख्याता भरत मुनि व उनका नाट्यशास्त्र है।

तथ्य एवं आचार्यविवरण
भरत मुनि के भावस्थायी भाव (8), सात्विक भाव (8), संचारी भाव (33)। कुल भाव 49
रस की संख्याभरत ने 8 मानी है। भोज ने 12 (प्रेयस, शांत, उदात्त, उध्दात सहित)।
स्थायी भावकरुण का शोक, शांत का निर्वेद (रुद्रट ने सम्यक ज्ञान)।
रसराजश्रृंगार रस को (कार्य-व्यापार की व्यापकता के कारण)। इसे मूल रस भामह ने माना।
भक्ति रसइसे रस रूप में प्रतिष्ठित करने वाले मधुसूदन सरस्वती और रूप गोस्वामी हैं।
रस और गुणवामन ने रीति को काव्य की आत्मा मानकर, रस को गुण के अंतर्गत (कांति गुण में) स्थान दिया।
रस और ध्वनिरस को ध्वनि के साथ युक्त करने का श्रेय आनंद वर्धन को है।
रस का प्राणक्षेमेंद्र ने औचित्य को रस का प्राण माना।
रस की आत्माआचार्य शुक्ल ने रस को काव्य की आत्मा माना।
रससूत्र के व्याख्याताभट्टलोल्लट (उत्पत्तिवाद/मीमांसा), शंकुक (अनुमितिवाद/अनुमान), भट्टनायक (भुक्तिवाद/सांख्य), अभिनवगुप्त (अभिव्यक्तिवाद/शैव)।
भट्टनायक का मतरस सूत्र की व्याख्या के संदर्भ में काव्य में तीन शक्तियों (अभिधा, भावकत्व, भोजकत्व) की कल्पना की।
साधारणीकरणडॉ. नगेंद्र के अनुसार कवि की अनुभूति या कवि भावना का साधारणीकरण होता है।
रस का मूलभोज ने अहंकार को रस का मूल माना।
भावकभारतीय काव्यशास्त्र में सहृदय या आलोचक से अभिप्राय है।

4. ध्वनि एवं वक्रोक्ति सिद्धांत

सिद्धांतआचार्यप्रमुख तथ्य
ध्वनिआनन्दवर्धन (नवीं शती का मध्य)प्रादुर्भाव: व्याकरण के स्पोट सिद्धांत से। काव्य भेद (3): ध्वनि, गुणिभूत व्यंग्य, चित्र। ध्वनि के प्रकार (3): वस्तु ध्वनि, अलंकार ध्वनि, रसध्वनि।
ध्वनि के भेदआनन्दवर्धन: 3 प्रकार। अभिनवगुप्त: 35 भेद। मम्मट: 51 शुद्ध भेद।
वक्रोक्तिआचार्य कुंतकउपलब्धि: कलावाद की प्रतिष्ठा। भेद: 6 भेद और 41 उपभेद माने हैं।
विरोधी आचार्यवक्रोक्ति संप्रदाय के विरोधी आचार्य विश्वनाथ हैं।
  • वैयाकरणों द्वारा वाक् (वाणी) के प्रकार: 4 – परा, पश्यंती, मध्यमा, वैखरी।

5. अलंकार, रीति और औचित्य सिद्धांत

सिद्धांतआचार्य/तथ्यप्रमुख विवरण
अलंकारभामह (प्रतिष्ठापक)शोभाकारक धर्म: दण्डी ने अलंकारों को काव्य का शोभाकारक धर्म माना। भरत ने 4 अलंकार (उपमा, रूपक, दीपक, यमक) का उल्लेख किया।
दोषवामन (सर्वप्रथम परिभाषा)काव्य दोषों का सर्वप्रथम निरूपण भरत कृत नाट्य शास्त्र में मिलता है। दण्डी ने 10, वामन ने 20, विश्वनाथ ने 70 दोषों का वर्णन किया।
रीतिवामनउपलब्धि: शैली तत्वों को महत्व देना। गुण और रीति का संबंध: अभेदगुणों की संख्या: दण्डी ने 10, वामन ने 20, मम्मट/भामह ने 3 (माधुर्य, ओज, प्रसाद)।
वृत्ति (काव्य)नाट्यशास्त्र (सर्वप्रथम वर्णन)3 काव्य वृत्तियाँ: परुषा, कोमला, उपनागरी।
औचित्यक्षेमेंद्र (औचित्य विचार चर्चा)भेद: 27 प्रधान भेद। रस का प्राण: क्षेमेंद्र ने औचित्य को रस का प्राण माना।

6. काव्य के भेद

भेद का आधारभेद (संख्या)नाम
व्यंग्यार्थ की प्रधानता3उत्तम (ध्वनि), मध्यम (गुणीभूत व्यंग्य), अधम (चित्रकाव्य)।
काव्य रूप (इंद्रियगम्यता)2दृश्य काव्य (रूपक/10 भेद) और श्रव्य काव्य
श्रव्य काव्य3गद्य, पद्य, चंपू (गद्य-पद्यमय काव्य)।
बंध2प्रबंध (पूर्वापर संबंध सापेक्ष) और मुक्तक (पूर्वापर संबंध निरपेक्ष)।
पंडितराज जगन्नाथ4उत्तमोत्तम, उत्तम, मध्यम, अधम।

7. अन्य महत्वपूर्ण आचार्य और ग्रंथ

भामह ‘अभाववादी’ कहलाते हैं क्योंकि उन्होंने काव्य में ध्वनि की सत्ता स्वीकार नहीं की है।

ध्वन्यालोकलोचन: अभिनवगुप्त (ध्वन्यालोक की टीका)।

हृदयदर्पण: भट्टनायक

भावप्रकाश: शारदातनय

अलंकार रत्नाकर: शोभाकर मित्र

हिंदी वक्रोक्ति जीवित की भूमिका: डॉ. नगेंद्र

रस कलश: अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’

नवरस: बाबू गुलामराय

काव्यकल्पद्रुम: सेठ कन्हैयालाल पौद्दार (रसमंजरी और अलंकार मंजरी के रूप में प्रकाशित)।

वाच्यता असह का अन्य नाम: रस ध्वनि

तात्पर्य: अभिधा, लक्षणा, व्यंजना की तरह चौथे प्रकार की नई शब्द-शक्ति।

लक्षणा के भेद: मम्मट ने 12, विश्वनाथ ने 80 भेदों का उल्लेख किया। रूढ़ि लक्षणा को अभिधा पुच्छभूता कहते हैं।

 

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