इतिहास दर्शन एवं साहित्य का इतिहास दर्शन
1. इतिहास और साहित्य का संबंध
साहित्य के इतिहास में हम प्राकृतिक घटनाओं अथवा सामान्य मानवीय क्रियाकलापों के स्थान पर साहित्यिक रचनाओं का अध्ययन ऐतिहासिक दृष्टि से करते हैं। इसमें यह देखा जाता है कि किसी विशेष कालखंड में कौन-सी साहित्यिक प्रवृत्तियाँ विकसित हुईं, उनके पीछे कौन-सी परिस्थितियाँ थीं और उनका साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा।
2. इतिहास का अर्थ एवं स्वरूप
(क) इतिहास का अर्थ
इतिहास का शाब्दिक अर्थ है—
“ऐसा ही था” या “ऐसा ही हुआ”।
अर्थात इतिहास के अंतर्गत केवल वही घटनाएँ आती हैं जो वास्तविक, यथार्थ और प्रमाणित हों।
(ख) इतिहास का स्वरूप
- इतिहास का संबंध केवल प्रसिद्ध या महान घटनाओं से नहीं होता, बल्कि उन घटनाओं से भी होता है जो प्रसिद्ध न होते हुए भी वास्तव में घटित हुई हों।
- इतिहास से कवि, साहित्यकार, उपदेशक, शोधकर्ता आदि विभिन्न वर्गों के लोग प्रेरणा ग्रहण करते रहे हैं।
- आधुनिक युग में इतिहास को कला की अपेक्षा विज्ञान के अधिक निकट माना जाता है, क्योंकि इसमें तर्क, प्रमाण और विश्लेषण का विशेष महत्त्व है।
3. इतिहास दर्शन की रूपरेखा
इतिहास दर्शन के अंतर्गत इतिहास के उद्देश्य, प्रक्रिया और उसकी व्याख्या के सिद्धांतों का अध्ययन किया जाता है। इसे मुख्यतः दो दृष्टिकोणों में बाँटा जा सकता है—
- भारतीय दृष्टिकोण
- पाश्चात्य दृष्टिकोण
4. इतिहास दर्शन : भारतीय दृष्टिकोण
- इतिहास के प्रति भारतीय दृष्टिकोण आदर्शवादी एवं आध्यात्मिक रहा है।
- प्राचीन युग में भारतीय इतिहासकारों की रचनाएँ चारित्रिक मूल्यों, नैतिक उपदेशों और आध्यात्मिक तत्वों से युक्त थीं, जिससे इतिहास पौराणिक रूप में परिणत हो गया।
- परवर्ती काल में इतिहास लेखन शुद्ध इतिहास की अपेक्षा काव्यात्मक इतिहास अथवा ऐतिहासिक काव्य के रूप में विकसित हुआ।
- भारतीय इतिहासकारों ने अपनी संस्कृति एवं जीवन-मूल्यों के अनुरूप इतिहास में भी समन्वयात्मक दृष्टिकोण अपनाया।
- इतिहास लेखन में सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् के समन्वय का प्रयास किया गया।
5. इतिहास दर्शन : पाश्चात्य दृष्टिकोण
इतिहास के प्रथम व्यवस्थित व्याख्याता यूनानी विद्वान हीरोदोत्स माने जाते हैं। उन्होंने इतिहास के चार प्रमुख लक्षण निर्धारित किए—
- इतिहास एक वैज्ञानिक विद्या है, अतः इसकी पद्धति आलोचनात्मक होती है।
- यह मानव जाति से संबंधित होने के कारण एक मानवीय विद्या है।
- इतिहास एक तर्कसंगत विद्या है, जिसमें तथ्य एवं निष्कर्ष प्रमाणों पर आधारित होते हैं।
- यह अतीत के आलोक में भविष्य पर प्रकाश डालता है, इसलिए यह शिक्षाप्रद विद्या है।
हीगल का इतिहास दर्शन
- दार्शनिक हीगल के अनुसार, विश्व इतिहास की प्रक्रिया का मूल लक्ष्य मानव चेतना का विकास है।
- यह विकास द्वंद्वात्मक पद्धति पर आधारित होता है।
- इस पद्धति में वाद, प्रतिवाद और संवाद के माध्यम से इतिहास आगे बढ़ता है।
- इतिहास की व्याख्या भी इसी द्वंद्वात्मक प्रक्रिया के आधार पर की जानी चाहिए।
विकासवादी दृष्टिकोण
- आधुनिक पाश्चात्य इतिहास दर्शन में विकासवादी दृष्टिकोण को सर्वाधिक विकसित और प्रभावशाली माना जाता है।
- 19वीं शताब्दी में डार्विन ने विकासवादी सिद्धांत की स्थापना की।
- इसके अनुसार इतिहास केवल घटनाओं का संकलन नहीं है, बल्कि विकास-क्रम का विवेचन है।
6. साहित्य का इतिहास दर्शन
साहित्य के इतिहास में हम प्राकृतिक घटनाओं या सामान्य मानवीय क्रियाकलापों के स्थान पर साहित्यिक रचनाओं का ऐतिहासिक अध्ययन करते हैं।
दूसरे शब्दों में, साहित्यिक रचनाओं के इतिहास को समझने के लिए—
- उनके रचयिता,
- उनकी सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियाँ,
- तथा साहित्यिक परंपराएँ
का अध्ययन आवश्यक होता है।
7. साहित्य के विकास के अध्ययन के प्रमुख तत्व
किसी भी साहित्य की विकास प्रक्रिया को समझने के लिए निम्नलिखित पाँच तत्वों पर विचार किया जाता है—
- सृजन शक्ति
- साहित्यकार की प्रतिभा, कल्पनाशीलता और व्यक्तित्व।
- परंपरा
- साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परंपराओं की निरंतरता।
- वातावरण
- सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ।
- द्वंद्व
- परंपरा और नवीनता, विचार और विरोध के बीच संघर्ष।
- संतुलन
- सृजन और परंपरा, आदर्श और यथार्थ के बीच सामंजस्य।
निष्कर्ष: इतिहास दर्शन और साहित्य का इतिहास दर्शन, दोनों मिलकर साहित्य के विकास को वैज्ञानिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक दृष्टि से समझने में सहायक होते हैं।




