1960 के बाद हिंदी नाटक का विकास: एक विश्लेषण
1960 के बाद हिंदी नाटक ने साहित्यिक दृष्टिकोण से गहरे बदलाव देखे। यह एक ऐसी अवधि थी जब नाटक को अन्य विधाओं की तुलना में कम लिखा गया। नाटक एक जटिल विधा है क्योंकि इसमें अभिनय, संगीत, नृत्य और दृश्यकला का समन्वय आवश्यक होता है। इसके अलावा, जीवन की गहरी और जटिल अनुभूतियाँ नाट्य रूप में व्यक्त करना भी एक चुनौती थी, जिससे नाटक में अपेक्षित वृद्धि नहीं हो पाई।
हालांकि, पिछले दो दशकों में हिंदी नाटक में नयापन और प्रयोगशीलता का प्रसार हुआ है, जो इसे एक नई दिशा में ले गया। मोहन राकेश के बाद, हिंदी नाटक ने निराशा और पराजय बोध के क्षेत्र से बाहर निकलने की कोशिश की। इस नई पीढ़ी के नाटककारों ने जीवन की असंगतियों, अन्तर्विरोधों और तनावों को नए रूप में प्रस्तुत किया, जो न केवल सामाजिक और मानसिक हलचलों का, बल्कि नाट्य सृजन की संभावनाओं का भी उद्घाटन था।
प्रमुख नाटककार और उनकी कृतियाँ
- भीष्म साहनी: उनकी कृतियाँ जैसे “हानुश”, “कबीरा खड़ा बाजार में” में सामाजिक यथार्थ और असमानताओं को दर्शाया गया है।
- सर्वेश्वरदयाल सक्सेना: “बकरी”, “लड़ाई”, और “कल भात आयेगा” में जीवन के निरर्थकता और संघर्ष को निरूपित किया गया।
- ज्ञानदेव अग्निहोत्री: “शतुरमुर्ग”, “मणिमधुकर”, “रसगन्धर्व” जैसी कृतियों में नए प्रयोग किए गए हैं।
- मुद्राराक्षस: “मरजीवा”, “तेंदुआ” नाटक में जीवन की जटिलता और मानसिक दबाव को उजागर किया।
- मृदुला गर्ग: “एक और अजनबी” नाटक में रिश्तों की जटिलता और उनके निरर्थक होने की भावना को अभिव्यक्त किया।
- शंकर शेष: “एक और द्रोणाचार्य” और “सेतुबन्ध” में समाज और राजनीति की विडंबनाओं को समाहित किया गया।
राजनीति और समाज पर प्रभाव
1960 के बाद, राजनीति और समाज के असंतुलन ने नाटककारों को काफी प्रभावित किया। इस दौरान नाटककारों ने राजनीतिक संस्थाओं की भ्रष्टता और सिद्धान्तहीनता को अपनी कृतियों में उजागर किया। जैसे:
- डॉ. लक्ष्मीनारायण लाल: “रक्त कमल”, “चतुर्भुज राक्षस”, “गंगा माटी” जैसे नाटकों में उन्होंने राजनीति की आंतरिक विडंबनाओं को बखूबी दिखाया।
- शरद जोशी: “एक था गधा उर्फ अलादाद खां” और “अन्धों का हाथी” में समाज और राजनीति के व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण को प्रस्तुत किया।
हिंदी नाटक में ऐतिहासिक और पौराणिक तत्व
कुछ नाटककारों ने भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं के माध्यम से भारतीय अस्मिता को पहचानने की कोशिश की। इनमें शामिल हैं:
- शंकर शेष: “खजुराहो का शिल्पी”
- गिरिराज किशोर: “प्रजा ही रहने दो”
- नरेन्द्र कोहली: “शंबूक की हत्या”
- जयशंकर त्रिपाठी: “कुरुक्षेत्र का सवेरा”
इन नाटकों में भारतीय संस्कृति, पौराणिक कथाएँ और ऐतिहासिक घटनाएँ नए रूप में प्रस्तुत की गईं, जिससे दर्शकों को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर पुनर्विचार करने का अवसर मिला।
निष्कर्ष
सारांश रूप में कहा जा सकता है कि 1960 के बाद हिंदी नाटक ने कई नई दिशाओं में प्रयोग किए और समकालीन समाज, राजनीति और संस्कृति पर गहरी टिप्पणी दी। यह वह समय था जब नाटक ने पुराने गणित और संबंधों को चुनौती दी और नए दृष्टिकोण से नाट्य रचनाओं को प्रस्तुत किया। समकालीन हिंदी नाटक में प्रयोग, रंग, शिल्प, और विषयवस्तु में विविधता आई, जो इसे एक सशक्त और महत्वपूर्ण साहित्यिक विधा के रूप में स्थापित करती है।
