समकालीन हिंदी कहानी: परिभाषा, विकास और प्रमुख प्रवृत्तियाँ
समकालीन हिंदी कहानी ने 1970 तक अपनी एक विशेष पहचान बना ली थी। यह युग एक तरह से हिंदी कथा साहित्य का उत्कर्ष था, जिसमें राजनीतिक, सामाजिक और सांस्कृतिक बदलावों ने लेखकों के सृजनात्मक और मानसिक स्तर को प्रभावित किया। पुरानी पीढ़ी के साहित्यिक दृष्टिकोण से इतर, समकालीन कहानीकारों ने न केवल पुरानी मानसिकता से बाहर आकर जीवन के गहरे और जटिल पहलुओं को उजागर किया, बल्कि मानववाद के आधार पर इन पर गंभीरता से विचार किया।
नई कहानी की परिभाषा और प्रवृत्तियाँ
नई कहानी को एक यथार्थवादी और सामाजिक रूप से जागरूक साहित्यिक आंदोलन के रूप में देखा गया। इसमें कहानीकारों ने नगरीय जीवन, उसकी कृत्रिमता, सहानुभूति, स्वार्थपरता, और अकेलेपन की भावना को प्रमुखता से प्रस्तुत किया। इस तरह की कहानियों में लेखकों ने जीवन के संघर्षों को सीधे और निर्भीक तरीके से व्यक्त किया, बिना उनसे भागे। इस प्रक्रिया में, अस्तित्ववाद से निकलकर, कहानीकारों का दृष्टिकोण अब अधिक मानवतावादी हो गया था।
कमलेश्वर, निर्मल वर्मा, और अमरकान्त जैसे प्रमुख कहानीकारों ने इस बदलाव को अपनी कहानियों में व्यक्त किया। साथ ही, कथा लेखिकाओं ने भी इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया, जिन्होंने पति-पत्नी और नारी-पुरुष संबंधों पर अपनी कहानियों के माध्यम से सशक्त संदेश दिए।
प्रमुख कहानीकार और उनकी कृतियाँ
- कमलेश्वर – उनकी कहानियाँ, जैसे “बयान” और “राजा निरबंसिया”, में जीवन के तनाव और अकेलेपन को गहरे रूप से चित्रित किया गया है।
- निर्मल वर्मा – “तलाश”, “छुट्टी का दिन” और “जिन्दगी और जोंक” जैसी कहानियों में उन्होंने नारी और पुरुष के टूटने और टूटे हुए रिश्तों को संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया है।
- अमरकान्त – उनकी कहानी “जिन्दगी और जोंक” और अन्य कृतियाँ यह दर्शाती हैं कि कैसे व्यक्ति सामाजिक और मानसिक स्तर पर टूटता है।
- मन्नू भण्डारी – “यही सच है” और “त्रिशंकु” जैसी कहानियों में उन्होंने रिश्तों की जटिलताओं और अंतर्द्वंद्वों को अभिव्यक्त किया है।
- राजेन्द्र यादव – “टूटना” और “अपरिचित” जैसी कृतियाँ नारी और पुरुष के मानसिक संघर्ष को उजागर करती हैं।
नई कहानी का शिल्प और रूप
नई कहानी ने न केवल विषयवस्तु में परिवर्तन किया, बल्कि शिल्प में भी नवाचार किए। यह कहानी किसी एक क्षण या एक संवेदना को व्यक्त करने का माध्यम बन गई। इसे सामाजिक यथार्थ और व्यक्तिगत मानसिकता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास माना जाता है। नई कहानी में कहानीकारों ने यथार्थ को न केवल शाब्दिक रूप में बल्कि गहरी संवेदना और विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण से प्रस्तुत किया।
हिंदी कहानी आंदोलनों का योगदान
समकालीन हिंदी कहानी में विभिन्न आंदोलनों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कुछ प्रमुख आंदोलन इस प्रकार थे:
- नई कहानी
- सचेतन कहानी (महीप सिंह)
- अचेतन कहानी
- साठोत्तरी कहानी
- अकहानी
- जनवादी कहानी
नई कहानी के प्रमुख कहानीकारों की कृतियाँ
- मृदुला गर्ग – “दुनिया का कायदा”
- मंजुल भगत – “सफेद कौआ”
- ज्ञानरंजन – “सम्बन्ध”, “शेष होते हुए”
- उदयप्रकाश – “तिरिछ”, “पीली छतरी वाली लड़की”
- राजेन्द्र उपाध्याय – “ऐश ट्रे”
- शिवप्रसाद सिंह – “अंधकूप”
- ममता कालिया – “बोलने वाली औरत”
निष्कर्ष
समकालीन हिंदी कहानी में पुरानी परंपराओं से निकलकर नये विचार, नए दृष्टिकोण और नए शिल्प का समावेश किया गया है। इन कहानियों ने सामाजिक, मानसिक और व्यक्तिगत बदलावों को निरंतर अपनी कहानी का हिस्सा बनाया। इनकी जटिलताएँ और विविधताएँ हिंदी कथा साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर हैं।
