ज्ञानाश्रयी शाखा के काव्य की सामान्य विशेषताएँ

ज्ञानाश्रयी शाखा की सामान्य विशेषताएँ

संत साहित्य निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर आधारित है और इसकी प्रमुख विशेषताएँ इस प्रकार हैं:


1. निर्गुण ब्रह्म की उपासना

  • संत कवि केवल निर्गुण ब्रह्म की उपासना पर बल देते हैं।
  • ब्रह्म को गुणरहित नहीं, बल्कि गुणातीत माना गया है।

2. सद्गुरु का महत्त्व

  • ब्रह्म की प्राप्ति सद्गुरु के ज्ञान के माध्यम से ही संभव है।
  • सद्गुरु के द्वारा माया-जाल का भेदन कर सत्य का साक्षात्कार कराया जाता है।

3. ज्ञान और प्रेम का संतुलन

  • संत कवि, विशेष रूप से कबीर, ज्ञान और प्रेम को समान रूप से महत्त्व देते हैं।
  • प्रेम की उत्कटता के साथ ज्ञान और अंतस्साधना को कभी उपेक्षित नहीं किया।

4. भक्ति का अनुभूति-पक्ष

  • संत काव्य में भक्ति के अनुभूति-पक्ष का व्यापक चित्रण मिलता है।
  • इनके अनुसार, ज्ञान जीवन में परिवर्तन लाने वाली आँधी की तरह है।

5. सगुणवाद और मूर्तिपूजा का विरोध

  • सगुणवाद, अवतारवाद और मूर्तिपूजा को पूरी तरह अस्वीकार किया गया।
  • केवल निर्गुण ब्रह्म की सत्ता को ही स्वीकार किया गया।

6. सामाजिक विद्रोह और वर्णव्यवस्था का विरोध

  • संत कवि, विशेष रूप से कबीर, रैदास, सेना, और पीपा ने जातिवाद और वर्णव्यवस्था पर तीखा प्रहार किया।
  • इन्होंने समझौते के बजाय क्रांतिकारी मार्ग अपनाया।

7. नाथपंथ और उलटबाँसी का प्रभाव

  • इन कवियों पर नाथपंथ और उसकी साधना पद्धति का गहरा प्रभाव है।
  • प्रतीकात्मकता और उलटबाँसी की शैली का व्यापक उपयोग किया गया।

8. छंद और भाषा की विशेषताएँ

  • संत कवियों ने गेय पद, दोहा, चौपाई, और लोक प्रचलित छंदों का उपयोग किया।
  • भाषा में सहजता, लोकभाषा का प्रयोग, और सांस्कृतिक विविधता के कारण यह आम जनता से जुड़ सकी।

9. सांस्कृतिक विविधता और अनुभवपरकता

  • संत साहित्य देशाटन और अनुभवों पर आधारित था।
  • इस कारण इनकी भाषा सांस्कृतिक विविधता से समृद्ध है।

10. जातीय समरसता का संदेश

  • संत कवियों ने सभी जातियों को समान मानकर ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण का संदेश दिया।

प्रमुख संत कवि

  • कबीर: निर्गुण ब्रह्म की व्यापकता और सामाजिक विद्रोह।
  • रैदास: भक्ति में समानता और प्रेम।
  • पीपा: समाज सुधार और मानवता का संदेश।
  • सेना: जातिवाद विरोध।

निष्कर्ष

ज्ञानाश्रयी शाखा का साहित्य केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक सुधार, वर्णव्यवस्था का विरोध, और मानवीय मूल्यों के प्रचार-प्रसार का सशक्त माध्यम है। यह लोकभाषा में रचित होने के कारण जनमानस से गहराई से जुड़ा और भारतीय साहित्य की अमूल्य धरोहर बना।

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