निर्गुण संत परंपरा और कबीरदास
निर्गुण संत परंपरा का आरंभ 15वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में हुआ था। इस परंपरा का सूत्रपात मुख्य रूप से कबीरदास जैसे महान संतों ने किया। स्वामी रामानंद, जो कबीरदास के गुरु थे, उनके उपदेशों से प्रभावित होकर कबीर और उनके समकालीन संतों ने संतमत की नींव रखी। यह परंपरा भारतीय समाज में धार्मिक और सामाजिक जागृति के लिए अत्यंत प्रभावशाली रही।
निर्गुण संत परंपरा का इतिहास
निर्गुण संत परंपरा की विचारधारा और इसका विकास कई धार्मिक और सांस्कृतिक धारा से प्रेरित था। संत परंपरा के विचारों और उपदेशों का आदान-प्रदान विभिन्न पंथों और संप्रदायों के बीच हुआ। विशेष रूप से बौद्ध धर्म, वज्जयान और सहजयान में इस परंपरा का प्रभाव दिखता है। इसके अलावा, वैष्णव संप्रदाय और नाथपंथ से भी इस विचारधारा में कुछ समन्वय हुआ, जिससे संतमत का विकास हुआ।
स्वामी रामानंद से पहले संत जयदेव (पूर्व), संत ज्ञानदेव और नामदेव (दक्षिण), संत बेनी और सधना (पश्चिम), और संत ललदेव (कश्मीर) जैसे संतों ने भी अपनी काव्य-रचनाओं और उपदेशों के माध्यम से निर्गुण भक्ति की परंपरा को फैलाया।
कबीरदास और संत परंपरा
कबीरदास की भूमिका संत परंपरा के संस्थापक के रूप में महत्वपूर्ण है। कबीर ने ईश्वर की निर्गुण और निराकार रूप की उपासना को प्रोत्साहित किया। उन्होंने ब्राह्मणवादी कर्मकांडी रीति-रिवाजों, सामाजिक भेदभाव, और पंथों के बीच की दीवारों को तोड़ा। कबीर ने अपने सशक्त पदों के माध्यम से सरल, सशक्त और सहज भक्ति का संदेश दिया। उनका प्रमुख उद्देश्य था—सच्ची भक्ति का मार्ग बताना, जिसमें कोई आडंबर न हो। कबीर के विचारों में निर्गुण भक्ति का सिद्धांत प्रमुख था, जहां ईश्वर के साकार रूप की पूजा का विरोध किया गया और उसके निर्गुण रूप की उपासना पर जोर दिया गया।
कबीर के विचारों का व्यापक प्रभाव था और उन्होंने एक नई धार्मिक चेतना का प्रसार किया। उनकी वाणी ने हिंदू और मुस्लिम समाज दोनों को समान रूप से प्रभावित किया। वे न केवल एक धार्मिक नेता थे, बल्कि समाज सुधारक भी थे।
कबीर के बाद की संत परंपरा
कबीरदास के उपदेशों और उनकी संत परंपरा के आधार पर कई पंथों का जन्म हुआ। इनमें प्रमुख पंथ थे—
- कबीरपंथ
- दादूपंथ (दादू दयाल द्वारा स्थापित)
- निरंजनी संप्रदाय (हरिदास द्वारा स्थापित)
- मलूकपंथ (मलूकदास द्वारा स्थापित)
कबीर और उनके अनुयायियों ने धार्मिक एकता और सत्य की तलाश पर बल दिया। संतमत ने भक्ति के रूप में एक नई दिशा दी, जिसमें भगवान के नाम कीर्तन और आत्मज्ञान पर जोर दिया गया। कबीर के उपदेशों ने लोगों को न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी जागरूक किया।
निर्गुण भक्ति का प्रसार
कबीरदास ने निर्गुण भक्ति का प्रचार-प्रसार करते हुए यह बताया कि ईश्वर हर जगह हैं, और उसे किसी मूर्ति या विशेष रूप में नहीं पूजा जा सकता। उनका दृष्टिकोण सर्वजन्य था, और उन्होंने जातिवाद, पंथवाद और धार्मिक आडंबरों का विरोध किया। इस प्रकार, संतमत की यह विचारधारा सामाजिक और धार्मिक समरसता के पक्ष में थी।
आचार्य शुक्ल ने कबीरदास को निर्गुण भक्ति का प्रवर्तक माना और कहा कि कबीर ने भक्ति के क्षेत्र में एक नई सोच की शुरुआत की।
निष्कर्ष
निर्गुण संत परंपरा ने 15वीं शताब्दी में कबीरदास जैसे संतों के माध्यम से एक नई धार्मिक चेतना का जन्म दिया। कबीर ने भक्ति को सरल और निराकार रूप में प्रस्तुत किया और धार्मिक आडंबरों तथा सामाजिक भेदभाव के खिलाफ संघर्ष किया। संतमत की विचारधारा ने भारतीय समाज को एक नई दिशा दी, जिसमें धार्मिक सद्भाव, मानवता, और एकता को प्रमुखता दी गई।
