भक्तिकाल की धार्मिक परिस्थिति

उत्तर भारत में तुर्कों का आगमन और प्रभाव

  1. दिल्ली सल्तनत की स्थापना और प्रारंभिक खलबली
    • तुर्कों के विजय के आरंभिक चरण में कई शहरों को लूटा गया और मंदिरों को तोड़ा गया।
    • कुछ मंदिरों को तोड़कर मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया गया।
  2. मंदिरों के प्रति नीति
    • हिंदुओं और जैनियों के पूजास्थलों के प्रति तुर्कों की नीति मुस्लिम कानून (शरीयत) पर आधारित थी।
    • शरीयत अन्य धर्मों के नए पूजा स्थलों के निर्माण की इजाजत नहीं देता था।
    • गाँवों में जहाँ इस्लाम का प्रचार नहीं था, मंदिर निर्माण पर कोई प्रतिबंध नहीं था।
  3. धर्म परिवर्तन के कारण
    • इस्लाम स्वीकार करने के पीछे राजनीति और धार्मिक लाभ की आशा, अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने की ललक मुख्य कारण थे।
    • कभी-कभी किसी प्रसिद्ध शासक या जनजाति के प्रधान के धर्म परिवर्तन करने पर उसकी प्रजा उसका अनुकरण करती थी।
  4. कट्टरता और सामंजस्य का दौर
    • हिंदू और मुसलमान, दोनों में कुछ कट्टर लोग धार्मिक कट्टरता फैला रहे थे।
    • इसके बावजूद पारस्परिक सामंजस्य और मेल-मिलाप की धीमी प्रक्रिया भी आरंभ हुई।
  5. सांस्कृतिक प्रभाव और सामंजस्य
    • वास्तुकला, साहित्य, और संगीत जैसे क्षेत्रों में हिंदू-मुस्लिम सामंजस्य स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
    • यह प्रक्रिया आगे चलकर भक्ति आंदोलन और सूफीवाद के रूप में धर्म के क्षेत्र में प्रकट हुई।
  6. भक्ति आंदोलन और सूफीवाद
    • मुगल काल (16वीं-17वीं सदी) में भक्ति आंदोलन और सूफीवाद ने सामंजस्य को और अधिक प्रबल किया।
    • भक्ति आंदोलन के कवियों की मानवतावादी दृष्टि ने धार्मिक भेदभाव को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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