हिंदी साहित्य का नामकरण
आचार्य रामचंद्र शुक्ल और अन्य विद्वानों ने हिंदी साहित्य के विभिन्न कालों का नामकरण और विभाजन किया। इसके पीछे प्रमुख आधार साहित्यिक कृतियों की प्रवृत्तियां और उनके प्रसिद्धि के स्तर थे।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल का काल विभाजन
शुक्ल जी का वीरगाथा काल नामकरण के आधार:
- किसी कालखंड में विशेष प्रकार की रचनाओं की प्रमुखता।
- उस समय के ग्रंथों की प्रसिद्धि।
वीरगाथा काल के ग्रंथ:
- विजयपाल रासो (नल्लसिंह)
- खुमान रासो (दलपतविजय)
- पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई)
- हम्मीर रासो (शार्ङ्गधर)
- बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह)
- जयचंदप्रकाश (भट्ट केदार)
- जयमंयक जस चंद्रिका (मधुकर कवि)
- परमाल रासो (जगनिक कवि)
- खुसरो की पहेलियाँ (अमीर खुसरो)
- कीर्तिलता, कीर्ति पताका (विद्यापति)
- विद्यापति पदावली।
शुक्ल जी के नामकरण पर मतभेद
- आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी:
- वीरगाथा काल की सामग्री साहित्यिक कोटि में नहीं आती।
- धार्मिक साहित्य और जैन कृतियों को भी हिंदी साहित्य में शामिल करना चाहिए।
- उदाहरण: रामचरितमानस को भक्तिकाल से निकालने पर इसकी शोभा नष्ट हो जाएगी।
- पंडित राहुल सांकृत्यायन:
- काल को सिद्ध-समंत काल कहा।
- धार्मिक, नैतिक, और आध्यात्मिक साहित्य इस काल की विशेषता।
- डॉ. रामकुमार वर्मा:
- संधि-चारण काल नाम दिया।
- संधि काल: दो भाषाओं का संक्रमण।
- चारण काल: चारण कवियों द्वारा राजाओं के वीरता वर्णन।
- आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी:
- इसे बीजवपन काल कहा।
- पूर्ववर्ती साहित्यिक परंपराओं और काव्य प्रवृत्तियों का निर्वाह।
- श्री चंद्रधर शर्मा गुलेरी:
- इसे अपभ्रंश काल नाम दिया।
- हिंदी का प्रारंभिक विकास अपभ्रंश भाषा से।
हिंदी साहित्य का काल विभाजन (अन्य विद्वानों के अनुसार)
- डॉ. नगेन्द्र:
- आदिकाल (7वीं-14वीं शताब्दी)।
- भक्तिकाल (14वीं-17वीं शताब्दी)।
- रीति काल (17वीं-19वीं शताब्दी)।
- आधुनिक काल (19वीं शताब्दी से अब तक)।
- पुनर्जागरण काल (1857-1900)।
- जागरण काल (1900-1918)।
- छायावाद काल (1918-1938)।
- प्रगति-प्रयोग काल (1938-1953)।
- नवलेखन काल (1953-अब तक)।
हिंदी के प्रथम कवि के संबंध में मत
- सरहप्पा (सरहपाद):
- 7वीं शताब्दी के सिद्धाचार्य कवि।
- काव्य शैली: दोहा और पद।
- अपभ्रंश और संस्कृत शब्दों का समन्वय।
- उदाहरण:जह मन पवन नसंचरइ, रवि शशि नाह पवेश।
तहि वट चित विसाम करू, सरहे कहिअ उवेश।। - समय: 769 ई. (राहुल सांकृत्यायन)।
- पुष्यदंत (पुण्यदंत):
- शिवमहिम के रचयिता।
- रचनाओं का अभाव।
- अमीर खुसरो:
- कुछ विद्वानों ने अस्वीकार किया (12वीं शताब्दी के कवि)।
- विद्यापति:
- 12वीं शताब्दी के कवि।
- चंदबरदाई:
- शुक्ल जी और मिश्रबंधुओं ने हिंदी का प्रथम कवि माना।
- रचना: पृथ्वीराज रासो।
- शालिभद्र सूरि:
- भरतेश्वर बाहुबली रास के रचयिता।
- स्वयंभू:
- डॉ. रामकुमार वर्मा के अनुसार, हिंदी के प्रथम कवि।
निष्कर्ष
- सरहपाद को प्रायः हिंदी का प्रथम कवि माना गया।
- इनकी रचनाओं में दोहा शैली का प्रयोग, अपभ्रंश और हिंदी का समन्वय मिलता है।
- हिंदी साहित्य के काल विभाजन में विचारधाराओं और ऐतिहासिक खोजों के आधार पर मतभेद स्पष्ट हैं।
