हिंदी साहित्य का सामाजिक स्थिति पर प्रभाव:
हिंदी साहित्य का सामाजिक स्थितियों पर गहरा प्रभाव पड़ा, खासकर जब राजनीति और धर्म में अस्थिरता और भ्रष्टाचार फैलने लगे। सामाजिक असमानताएँ, दमन और असहायता का माहौल भारतीय समाज में उत्पन्न हुआ, जिसका साहित्य पर गहरा असर हुआ। इस समय की राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक समस्याएँ साहित्य में प्रतिबिंबित हुईं।
समाज में असमानता और अत्याचार:
वह समय भारतीय समाज के लिए कठिन था, जब शासकों के प्रति विश्वास टूट चुका था और धर्म के मठाधीशों पर भी जनता का भरोसा नहीं रहा। इसके कारण समाज में असहायता और निराशा का वातावरण व्याप्त था। अंधविश्वास, जातिवाद और शोषण की बढ़ती प्रवृत्तियाँ समाज में विद्यमान थीं। स्त्री के साथ अन्याय बढ़ा था, और उन्हें केवल वस्तु के रूप में खरीदा और बेचा जाने लगा था। सती प्रथा, बाल विवाह, दास प्रथा जैसी कुप्रथाएँ आम हो गई थीं, और समाज में अनुशासनहीनता और अत्याचार का बोलबाला था।
साहित्य का सामाजिक कार्य:
इस कठिन समय में, साहित्य एकमात्र ऐसा माध्यम था जिसके द्वारा समाज में आशा और प्रेरणा का संचार किया जा सकता था। अपभ्रंश में रचनाएँ हो रही थीं जो धर्म, नैतिकता और नियमों की पुनर्स्थापना का प्रयास कर रही थीं। इस साहित्य ने समाज को जागरूक किया और गलत प्रथाओं के खिलाफ आवाज उठाई। साहित्य के माध्यम से जनता को प्रलोभन, अत्याचार और असामाजिकता के खिलाफ जागरूक किया गया।
सामाजिक परिवर्तन और संस्कृति का उत्थान:
सातवीं और आठवीं शताबदी में भारतीय समाज में कुछ सुधारों का भी आरंभ हुआ। स्थापत्य कला का प्रचलन बढ़ा और शिल्पियों एवं चित्रकारों को सम्मान दिया जाने लगा। पल्लव शासकों ने कांचीपुरम में बुनकरों को सम्मान देना शुरू किया, जिससे व्यापारिक कलाओं के प्रति समाज की सोच में बदलाव आया। इस समय दक्षिण में वैष्णव आलवार संतों के माध्यम से उच्च और निम्न वर्णों के बीच सामाजिक सद्भावना का संदेश फैलाया गया। समाज में निम्न वर्ग के लोग अपनी सामाजिक स्थिति सुधारने के लिए नए मार्गों की तलाश में थे। इस समय कांचीपूरम जैसे संत प्रतिष्ठित हो रहे थे, जो समाज में उच्च और निम्न वर्ग के बीच एकता का संदेश दे रहे थे।
धार्मिक और दार्शनिक परिवर्तन:
समाज में धार्मिक दार्शनिक दृष्टिकोण भी बदल रहे थे। रामानुजाचार्य और शंकराचार्य के दर्शन ने समाज को नई दिशा दी। शंकराचार्य के अद्वैतवाद में, जगत को मिथ्या और ब्रह्म को सत्य मानते हुए उन्होंने जीवन को ब्रह्म के सत्य से जोड़ने की कोशिश की। वहीं, रामानुजाचार्य के विशिष्टाद्वैत में, ब्रह्म और जगत को शरीर और शरीरी के रूप में देखा गया, जो समाज को एक नया दार्शनिक दृष्टिकोण प्रदान करता था। इन दार्शनिक विचारों ने समाज के धार्मिक और मानसिक दृष्टिकोण में परिवर्तन लाने का कार्य किया।
रामानन्द जी का भक्ति आन्दोलन:
रामानुजाचार्य के शिष्य रामानन्द जी ने भक्ति आन्दोलन को उत्तर भारत में फैलाने का कार्य किया। उन्होंने भक्ति को समाज के हर वर्ग में लोकप्रिय बनाने की कोशिश की। रामानन्द जी के भक्ति आन्दोलन ने जातिवाद और सामाजिक असमानताओं के खिलाफ एक सशक्त आवाज उठाई और समाज के हर व्यक्ति को धार्मिक और सामाजिक सुधार की दिशा में प्रेरित किया।
निष्कर्ष:
सामाजिक, राजनीतिक और धार्मिक समस्याएँ हिंदी साहित्य में स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुईं। साहित्यकारों ने समाज में व्याप्त असमानता, अत्याचार और असहायता के खिलाफ संघर्ष किया और उसे सुधारने का प्रयास किया। इस समय का साहित्य धर्म, नैतिकता और सामाजिक सद्भावना को पुनः स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान था। हिंदी साहित्य ने समाज को जागरूक किया और उसे एक बेहतर दिशा में मार्गदर्शन प्रदान किया।
