देवनागरी में सुधार के प्रयास

(1) बाल गंगाधर का ‘तिलक फांट’ (1904-26)

(2) सावरकर बंधुओं का ‘अ की बारहखड़ी’

(3) श्याम सुन्दर दास का पंचमाक्षर के बदले अनुस्वार के प्रयोग का सुझाव

(4) गोरख प्रसाद का मात्राओं को व्यंजन के बाद दाहिने तरफ अलग रखने का सुझाव (जैसे, कुल- क ु ल)

(5) श्री निवास का महाप्राण वर्ण के लिए अल्पप्राण के नीचे s चिह्न लगाने का सुझाव

(6) हिन्दी साहित्य सम्मेलन का इन्दौर अधिवेशन और काका कालेलकर के संयोजकत्व में नागरी लिपि सुधार समिति का गठन (1935) और उसकी सिफारिशें

(7) काशी नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा अ की बारहखड़ी और श्री निवास के सुझाव को अस्वीकार करने का निर्णय (1945)

(8) उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा गठित आचार्य नरेन्द्र देव समिति का गठन (1947) और उसकी सिफारिशें

(9) शिक्षा मंत्रालय के देवनागरी लिपि संबंधी प्रकाशन- ‘मानक देवनागरी वर्णमाला’ (1966 ई०), ‘हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण’ (1967 ई०), ‘देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण’ (1983 ई०) आदि।

हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी को हिंदी के संदर्भ में वैज्ञानिक लिपि कहा जाता है, क्योंकि लेखन और उच्चारण में बहुत तालमेल हो इस वैज्ञानिकता के बावजूद वर्णाकृति, वर्ण क्रम आदि समस्याएँ सामने आती हैं, तो इनके निवारण के लिए प्रयास किये जाते हैं। 1950 में राजभाषा घोषित किये जाने से पहले कई विद्वानों ने ऐसी समस्याओं के संदर्भ में देवनागरी में सुधार के प्रयास शुरू किये थे। हम यहाँ कुछ प्रमुख सुधार के प्रयत्नों की चर्चा करेंगे।

काका कालेलकर समिति


काका कालेलकर समिति ने दो महत्वपूर्ण सुझाव दिये जिसे महात्मा गांधी और विनोबा भावे का भी
समर्थन प्राप्त है। एक, स्वरों में अ, आ अि. औ, अु जैसे अ की बारह खड़ी का उपयोग किया जाए। दो,
गुजराती की तरह देवनागरी को भी बिना शिरा रेखा के लिखा जाए. जैसे भारत।

हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग


हिंदी साहित्य सम्मेलन प्रयाग ने 1941 में लिपि सुधार समिति बनाई थी, जिसमें निम्नलिखित सुझाव
थे। 1) मात्राओं रेफ और अनुस्वार को ऊपर न लिखकर अथवा लिखा जाए जिससे उनका वर्ण क्रम
स्पष्ट हो- जैसे क ल, क स, ध’ म। 2) इ की मात्रा को बाद में किया जाए, जैसे कीया (किया)
और शील (शील) 3) ऊ की बारह खड़ी अपनायी जाए, 4) संयुक्त व्यंजनों में र को पूरा लिखा जाए,
जैसे प्रेम, करम आदि 5) शिरारेखा का लेखन वैकल्पिक हो। 6) ध और भ भ्रम पैदा करते हैं। अतः
इन्हें ऊपर से शुरू किया जाए जैसे ध, भ।

आचार्य नरेंद्र देव समिति


आचार्य नरेंद्र देव समिति उत्तर प्रदेश सरकार के प्रयत्न से 1947 में बनी थी जिसमें धीरेंद्र वर्मा,
मंगलदेव शास्त्री आदि सदस्य थे। उनकी सिफ़ारिशें थी- 1) क्ष, त्र, श्र, द्य आदि संयुक्त वर्णों को निकाल
देना 2) इ के लिए पश्चगामी, भिन्न मात्रा जैसे की, की 3) ध और भ का रूप।

नागरी प्रचारिणी- सभा


नागरी प्रचारिणी- सभा के अनुरोध पर उत्तर प्रदेश सरकार ने 1953 में लिपि के सुधार के सुझाव दिये
थे। ये हैं- 1) इ की मात्रा (क, की आदि) 2) क्ष, त्र, श्र जैसे सब संयुक्ताक्षरों को अलग लिखा जाए,
जैसे क्ष, तर, शू आदि। 3) मानक वर्णों की सिफ़ारिश – ख, ध, भ, छ।

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