आधुनिक हिंदी गद्य का 1850 से विकास। नामकरण, रामप्रसाद निरंजनी, फोर्ट विलियम कॉलेज के लेखक (लल्लू लाल, सदल मिश्र), राजा शिवप्रसाद और राजा लक्ष्मण सिंह का योगदान।

खड़ी बोली गद्य का उद्भव और विकास: एक संक्षिप्त अवलोकन (1850 से आगे)
आधुनिक हिंदी साहित्य का यह काल (1850 ई. से आगे) हिंदी गद्य के विकास के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नामकरण
- गद्यकाल: आचार्य रामचंद्र शुक्ल
- वर्तमानकाल: मिश्र बंधु
- आधुनिक काल: रामकुमार वर्मा और गणपति चंद्रगुप्त
हिंदी गद्य का प्रारंभिक स्वरूप
- ब्रजभाषा गद्य की नींव:
- विट्ठलदास: ‘श्रृंगार रस मण्डल‘
- गोकुलनाथ (वार्ता साहित्य): ‘84 वैष्णवन की वार्ता‘ और ‘252 वैष्णवन की वार्ता‘
- नाभादास: ‘अष्टयाम‘
- खड़ी बोली गद्य की प्रथम महत्वपूर्ण रचना:
- गंग कवि: ‘चन्द छंद वर्णन की महिमा‘
- प्रथम प्रौढ़ गद्य लेखक (शुक्ल जी के अनुसार):
- रामप्रसाद निरंजनी: ‘भाषायोग वशिष्ठ‘ (साफ-सुथरी खड़ी बोली)
फोर्ट विलियम कॉलेज (स्थापना: 4 मई 1800 ई.) और खड़ी बोली के ‘चार स्तंभ’
फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता के तत्वाधान में, खड़ी बोली को साहित्यिक रूप देने में चार लेखकों का विशेष योगदान रहा।
| लेखक | महत्वपूर्ण रचनाएँ | भाषा शैली/विशेषता |
| 1. लल्लू लाल | ‘प्रेमसागर’ (जॉन गिलक्राइस्ट के आदेश पर), ‘लाल चन्द्रिका’ (बिहारी सतसई पर टीका) | गुजराती ब्राह्मण, ब्रज और उर्दू दोनों में रचना, संस्कृत प्रेस की स्थापना (कलकत्ता), भाषा में आगरा का पुट। |
| 2. सदल मिश्र | ‘नासिकेतोपाख्यान’ (या चंद्रावती) | कॉलेज में कार्यरत, इनकी भाषा में पूर्वीपन (मगही, भोजपुरी का प्रभाव) था। |
| 3. मुंशी सदासुख लाल ‘नियाज’ | ‘सुखसागर’ (श्रीमतभागवत का अनुवाद) | दिल्ली निवासी, शिष्ट और मुहावरेदार भाषा का प्रयोग किया। |
| 4. इंशा अल्ला खां | ‘रानी केतकी की कहानी’ (या उदयभान चरित) | उर्दू के शायर, ठेठ हिन्दी (किसी अन्य भाषा का मिश्रण नहीं) में लिखा। चटकीली, मुहावरेदार एवं चुलबुली भाषा। (शुक्ल जी द्वारा विशेष महत्व)। |
हिंदी-उर्दू संघर्ष काल के प्रमुख गद्यकार (1850 के आस-पास)
इस काल में हिंदी गद्य की दिशा को लेकर दो राजाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
| लेखक | योगदान एवं महत्वपूर्ण रचनाएँ | भाषा नीति |
| 5. राजा शिवप्रसाद ‘सितार-ए-हिन्द’ | शिक्षा विभाग में इन्सपेक्टर, अंग्रेजों के कृपापात्र। मध्यवर्ती मार्ग अपनाया। ‘बनारस अखबार’ (1849) काशी से निकाला। रचनाएं: ‘राजा भोज का सपना‘ (सरल हिन्दी), ‘मानव धर्मसार‘ (संस्कृतनिष्ठ), ‘इतिहास तिमिरनाशक‘ (उर्दू बहुल)। | हिन्दी के पक्षधर – सर सैयद अहमद खां और गार्सा-द-तासी के विरोध का सामना किया। |
| 6. राजा लक्ष्मण सिंह | आगरा निवासी। ‘प्रजा हितैषी’ नामक पत्र आगरा से निकाला। ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’ का शुद्ध हिन्दी में अनुवाद। अंग्रेज विद्वान फ्रेडरिक पिन्काट (इंग्लैंड) ने इनकी भाषा की प्रशंसा की। | शुद्ध हिन्दी के समर्थक – संस्कृतनिष्ठ, तत्सम शब्दावली के पक्षधर। |
संघर्षरत अन्य लेखक
- 7. बाबू नवीन चन्द्रराय: इन्होंने राजा शिवप्रसाद के साथ मिलकर उर्दू के पक्षपातियों से संघर्ष किया। गार्सा-द-तासी इनसे बहुत नाराज हुए।
