भक्ति के संप्रदाय
भक्ति आंदोलन ने भारतीय समाज में न केवल धार्मिक दृष्टिकोण से, बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी परिवर्तन की प्रक्रिया को बढ़ावा दिया। भक्ति के विभिन्न संप्रदायों ने भारतीय संस्कृति, विशेषकर हिंदी साहित्य को गहरे रूप से प्रभावित किया। इनमें से चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों का संक्षेप में परिचय निम्नलिखित है:
1. श्री संप्रदाय (रामानुजाचार्य)
श्री संप्रदाय के प्रवर्तक रामानुजाचार्य थे। उन्होंने विशिष्टाद्वैतवाद का सिद्धांत प्रस्तुत किया। उनके अनुसार, ब्रह्म विशेषण से युक्त है और वह जीव और जगत दोनों को धारण करता है। रामानुजाचार्य का यह विचार था कि जगत मिथ्या नहीं, वास्तविक है, और यह भगवान की साकार रूप में उपासना का एक मार्ग है। श्री संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत था कि भक्ति का वास्तविक रूप करुणा और लोकोन्मुखता में है। रामानुज की परंपरा में रामानंद का महत्वपूर्ण योगदान था। रामानंद ने आध्यात्मिक समानता का संदेश दिया और अवर्ण, सवर्ण, स्त्री, पुरुष सभी को अपने शिष्य बनाया। वे भक्ति में जातिवाद के खिलाफ थे और सभी को समान दृष्टि से देखा। रामानंद के प्रसिद्ध शिष्यों में रैदास, कबीर, धन्ना, पीपा, सुरसुरानंद आदि शामिल हैं। उन्होंने हिंदी को अपने विचारों का प्रचार करने का माध्यम बनाया।
2. ब्राह्म संप्रदाय (मध्वाचार्य)
ब्राह्म संप्रदाय के प्रवर्तक मध्वाचार्य थे। उनका जन्म गुजरात में हुआ था। इस संप्रदाय का सिद्धांत मुख्य रूप से द्वैतवाद पर आधारित था, जिसमें भगवान और जीव के बीच स्पष्ट भेद था। इस संप्रदाय का हिन्दी साहित्य से सीधे संबंध नहीं है, हालांकि इस संप्रदाय ने अन्य संस्कृतियों और भक्ति आंदोलनों को प्रभावित किया।
3. रुद्र संप्रदाय (विष्णुस्वामी)
रुद्र संप्रदाय के प्रवर्तक विष्णुस्वामी थे। इस संप्रदाय का प्रमुख सिद्धांत था भगवान विष्णु की उपासना और भक्त के लिए भगवान के अनुग्रह पर विश्वास। इस संप्रदाय ने भक्ति के नित्यलीला में प्रवेश को जीव का लक्ष्य माना। रुद्र संप्रदाय, विशेष रूप से महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुष्टि संप्रदाय के रूप में हिंदी साहित्य में मौजूद है। वल्लभाचार्य ने कृष्ण की उपासना को महत्व दिया और प्रेमलक्षणा भक्ति का प्रचार किया। इस संप्रदाय का प्रभाव सूरदास और अष्टछाप के कवियों पर देखा गया।
4. सनकादि संप्रदाय (निम्बार्काचार्य)
सनकादि संप्रदाय के प्रवर्तक निम्बार्काचार्य थे। यह संप्रदाय राधा और कृष्ण की उपासना पर बल देता था, जिसमें राधा को कृष्ण की सर्वोत्तम भक्त माना गया। निम्बार्काचार्य ने द्वैताद्वैत सिद्धांत का प्रचार किया, जिसमें भगवान और जीव का एकात्मता के साथ भेद माना जाता था। इस संप्रदाय का प्रभाव हिंदी भक्ति साहित्य में विशेष रूप से देखा गया, और इसके अनुयायी राधावल्लभी संप्रदाय से जुड़ी काव्य परंपराओं के प्रमुख थे। हितहरिवंश ने राधावल्लभी संप्रदाय को प्रचलित किया, और उनकी रचनाएँ राधा-कृष्ण की प्रेम भक्ति पर आधारित थीं।
निष्कर्ष: इन चार प्रमुख वैष्णव संप्रदायों ने न केवल भारतीय समाज को भक्ति के माध्यम से एकसूत्र में पिरोने का कार्य किया, बल्कि हिंदी साहित्य में भी उनके प्रभाव ने काव्य, साहित्यिक विचारधारा और भाषा में एक नई दिशा प्रदान की। रामानुजाचार्य, रामानंद, वल्लभाचार्य और निम्बार्काचार्य के सिद्धांतों और उनकी भक्ति की परंपराओं ने भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य को आकार दिया।
