भक्तिकाल (1318 से 1643 ई० तक) की पूर्वपीठिका:
भारतीय धर्म-साधना के इतिहास में भक्ति मार्ग का एक विशिष्ट स्थान है, जो सदियों से समाज को दिशा देने वाला सिद्धांत बना। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने भक्ति को धर्म की भावात्मक अनुभूति के रूप में परिभाषित किया है। भक्ति का प्रवर्तन महाभारत काल में हुआ था, लेकिन यह पूरी तरह से पुराण काल में विकसित हुआ। भक्ति के बीज वेदों में भी मौजूद थे, जिनमें देवी-देवताओं का आह्वान प्राकृत शक्तियों के प्रतीक रूप में किया गया था। वेदकाल में, मानव प्रकृति की शक्ति की बजाय इंद्र, वरुण, सूर्य, अग्नि जैसे देवताओं की पूजा करता था, लेकिन उपनिषद काल में ध्यान परमशक्ति ब्रह्म की ओर अधिक केंद्रित हुआ। इस समय, त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु, और महेश की पूजा का प्रचार हुआ।
भक्ति का विकास और सामाजिक संदर्भ: प्राचीन काल से ही भारत में धर्म और मोक्ष की साधना के तीन प्रमुख मार्ग—कर्म, ज्ञान और भक्ति—व्याप्त थे। इन मार्गों का समय-समय पर महत्व बदलता रहा। जहां एक ओर उपनिषद काल में ज्ञान का महत्व था, वहीं ब्राह्मण काल में कर्मकांड का प्रभाव था। हालांकि, ब्राह्मण काल में यज्ञों की विकृतियों और कर्मकांडों के विस्तार के कारण बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने आकर वैदिक कर्मकांड के विरोध में एक नयी धारणा प्रस्तुत की। बौद्ध और जैन धर्म ने धार्मिक अनुशासन में बदलाव की आवश्यकता को महसूस किया और इसे रूपांतरित किया।
साथ ही, दक्षिण भारत में एक अन्य भक्ति परंपरा का सूत्रपात हुआ था। यह परंपरा ईसा पूर्व कई शताब्दियों से चली आ रही थी, जिसका प्रसार छठी सदी के उत्तरार्ध से हुआ। दक्षिण भारत के संतो ने भक्ति आंदोलन को जन्म दिया, जिसमें वे नयनार (शिव के भक्त) और आलवार (विष्णु के भक्त) के नाम से प्रसिद्ध हुए। इन संतों का उद्देश्य भक्ति और प्रेम के माध्यम से समाज में एकता और सद्भाव का संदेश देना था।
इन भक्ति आंदोलनों ने व्यक्तिगत भक्ति को मुक्तिदायिनी और सुधारक माना। यह विचार न केवल ब्राह्मणों तक सीमित था, बल्कि कई अन्य जातियों के लोगों को भी इसमें शामिल किया गया। इन आंदोलनों ने भक्ति के मार्ग को एक प्रकार से लोकतांत्रिक बना दिया, जिसमें कोई भी व्यक्ति अपनी जाति, परिवार या लिंग की परवाह किए बिना भगवान के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त कर सकता था। इस आंदोलन को विभिन्न स्थानीय शासकों का भी समर्थन प्राप्त हुआ, जो इससे प्रभावित थे और उन्होंने इसे फैलाने में सहायता की।
रामानुजाचार्य और भक्ति का दर्शन: रामानुजाचार्य ने भक्ति आंदोलन को विशिष्टाद्वैत दर्शन के माध्यम से एक दार्शनिक आधार प्रदान किया। रामानुजाचार्य और उनके अनुयायी जैसे मध्वाचार्य, निम्बार्क, और विष्णुस्वामी ने शंकराचार्य के अद्वैतवाद से असहमत होते हुए भक्ति को प्रपत्ति-मार्गी रूप में प्रस्तुत किया। इसमें शरणागति और समर्पण भाव की प्रधानता थी। इन वैष्णवाचार्यों ने दक्षिण और उत्तर भारत के बीच सांस्कृतिक और भक्ति दृष्टि से पुल का कार्य किया और भक्ति को एक व्यापक आंदोलन का रूप दिया।
रामानुजाचार्य से रामानंद तक भक्ति का विस्तार: रामानुजाचार्य के बाद रामानंद (1300 ई. के आसपास) ने भक्ति आंदोलन को उत्तर भारत में फैलाया। रामानंद ने इसे एक सामाजिक और धार्मिक आंदोलन के रूप में बदल दिया। भक्ति को एक साधना पद्धति से बाहर निकालकर यह एक बड़ा जनांदोलन बन गया। इसके परिणामस्वरूप कई महान भक्त कवि उत्पन्न हुए, जैसे कबीर, सूरदास, तुलसीदास और मीरा बाई, जिनकी कविताएँ आज भी लोगों के दिलों में गूंजती हैं।
भक्तिकाव्य का मानवतावादी स्वरूप: भक्तिकाव्य ने हिन्दी साहित्य को स्वर्ण युग दिया। भक्त कवियों की कविताएँ मानवतावादी दृष्टिकोण से ओत-प्रोत थीं। ये कवि संकीर्ण मानसिकता से ऊपर उठकर समाज को जागरूक करने के लिए प्रेरित करते थे। भक्ति आंदोलन ने विशेष रूप से उन समाजों और व्यक्तियों को महत्व दिया जो धार्मिक भेदभाव, वर्ग संघर्ष और सामाजिक कुरीतियों से प्रभावित थे। इस आंदोलन ने मानवता, समानता और प्रेम का संदेश दिया और समाज को रूढ़िवादिता और पाखंड के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने का अवसर दिया।
निष्कर्ष: भक्तिकाल का काव्य और साहित्य मूलतः एक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में उभरा, जिसका उद्देश्य न केवल धार्मिक साधना को प्रोत्साहित करना था, बल्कि उस समय के समाज को नए दृष्टिकोण और विचारों के साथ जागरूक करना था। भक्ति आंदोलन ने न केवल धार्मिक, बल्कि सामाजिक सुधारों की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे यह काल भारतीय साहित्य और समाज का स्वर्ण युग बन गया।
