उत्तर भारत में तुर्कों का आगमन और प्रभाव
- दिल्ली सल्तनत की स्थापना और प्रारंभिक खलबली
- तुर्कों के विजय के आरंभिक चरण में कई शहरों को लूटा गया और मंदिरों को तोड़ा गया।
- कुछ मंदिरों को तोड़कर मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया गया।
- मंदिरों के प्रति नीति
- हिंदुओं और जैनियों के पूजास्थलों के प्रति तुर्कों की नीति मुस्लिम कानून (शरीयत) पर आधारित थी।
- शरीयत अन्य धर्मों के नए पूजा स्थलों के निर्माण की इजाजत नहीं देता था।
- गाँवों में जहाँ इस्लाम का प्रचार नहीं था, मंदिर निर्माण पर कोई प्रतिबंध नहीं था।
- धर्म परिवर्तन के कारण
- इस्लाम स्वीकार करने के पीछे राजनीति और धार्मिक लाभ की आशा, अथवा सामाजिक प्रतिष्ठा प्राप्त करने की ललक मुख्य कारण थे।
- कभी-कभी किसी प्रसिद्ध शासक या जनजाति के प्रधान के धर्म परिवर्तन करने पर उसकी प्रजा उसका अनुकरण करती थी।
- कट्टरता और सामंजस्य का दौर
- हिंदू और मुसलमान, दोनों में कुछ कट्टर लोग धार्मिक कट्टरता फैला रहे थे।
- इसके बावजूद पारस्परिक सामंजस्य और मेल-मिलाप की धीमी प्रक्रिया भी आरंभ हुई।
- सांस्कृतिक प्रभाव और सामंजस्य
- वास्तुकला, साहित्य, और संगीत जैसे क्षेत्रों में हिंदू-मुस्लिम सामंजस्य स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा।
- यह प्रक्रिया आगे चलकर भक्ति आंदोलन और सूफीवाद के रूप में धर्म के क्षेत्र में प्रकट हुई।
- भक्ति आंदोलन और सूफीवाद
- मुगल काल (16वीं-17वीं सदी) में भक्ति आंदोलन और सूफीवाद ने सामंजस्य को और अधिक प्रबल किया।
- भक्ति आंदोलन के कवियों की मानवतावादी दृष्टि ने धार्मिक भेदभाव को कम करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।
