द्विवेदी युग में आलोचना

द्विवेदी युग में आलोचना साहित्य का विकास

द्विवेदी युग हिंदी साहित्य में आलोचना के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण चरण है। इस काल में आलोचना ने साहित्य को गहराई से समझने और व्याख्या करने का कार्य किया। आलोचकों ने काव्य, अलंकार, छंद और साहित्यिक गुणों की व्याख्या के साथ-साथ तुलनात्मक, अन्वेषणात्मक और शोधपरक आलोचना को आगे बढ़ाया।


महत्वपूर्ण आलोचक और कृतियाँ

  1. जगन्नाथप्रसाद ‘भानु’
    • प्रमुख कृतियाँ:
      • ‘काव्य प्रभाकर’ (1910)
      • ‘छंद सारावली’ (1917)
  2. लाला भगवानदीन
    • प्रमुख कृति: ‘अलंकार मंजूषा’ (1916)।
    • बिहारी और देव पर आलोचना।
  3. पद्मसिंह शर्मा
    • तुलनात्मक आलोचना की शुरुआत:
      • 1907 में बिहारी और सादी की तुलना द्वारा।
  4. मिश्रबन्धु (श्यामबिहारी मिश्र और शुकदेवबिहारी मिश्र)
    • प्रमुख कृति: ‘हिन्दी नवरत्न’ (1910)।
    • शोध और आलोचना के सम्मिश्रण का उत्कृष्ट उदाहरण।
  5. महावीर प्रसाद द्विवेदी
    • ‘सरस्वती’ पत्रिका के माध्यम से परिचयात्मक आलोचना को बढ़ावा दिया।
    • काव्य और गद्य दोनों विधाओं पर आलोचनात्मक टिप्पणियाँ।
  6. बद्रीनारायण चौधरी ‘प्रेमघन’
    • व्याख्यात्मक आलोचना के लिए प्रसिद्ध।
    • प्रमुख आलोचनाएँ:
      • ‘संयोगिता स्वयंवर’
  7. बालकृष्ण भट्ट
    • व्याख्यात्मक आलोचना के क्षेत्र में उल्लेखनीय।
    • प्रमुख आलोचनाएँ:
      • ‘नीलदेवी’, ‘परीक्षागुरु’, ‘संयोगिता स्वयंवर’
  8. कृष्णबिहारी मिश्र
    • बिहारी और देव की काव्य परंपरा पर आलोचना।

आलोचना की विशेषताएँ

  1. तुलनात्मक आलोचना
    • साहित्यिक व्यक्तित्वों और कृतियों की तुलना।
    • उदाहरण: पद्मसिंह शर्मा द्वारा बिहारी और सादी की तुलना।
  2. परिचयात्मक आलोचना
    • साहित्यकारों और कृतियों के परिचय और उनके गुण-दोष की विवेचना।
    • उदाहरण: महावीर प्रसाद द्विवेदी की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित टिप्पणियाँ।
  3. अन्वेषणात्मक और शोधपरक आलोचना
    • ऐतिहासिक तथ्यों और कृतियों के स्रोतों की खोज।
    • प्रमुख योगदान:
      • ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ (1897)
      • ‘मिश्रबन्धु-विनोद’ (1913)।
  4. व्याख्यात्मक आलोचना
    • रचनाओं के गूढ़ अर्थ और साहित्यिक तत्वों की व्याख्या।
    • उदाहरण: ‘संयोगिता स्वयंवर’ पर बद्रीनारायण चौधरी और बालकृष्ण भट्ट का लेखन।

द्विवेदी युग की आलोचना का महत्व

द्विवेदी युग में आलोचना साहित्य ने हिंदी गद्य को नई दृष्टि और गहराई प्रदान की। आलोचना ने साहित्य को समझने और विवेचन करने की परंपरा को मजबूत किया। इसके माध्यम से हिंदी साहित्य को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, और रचनात्मकता की नई ऊँचाइयों तक पहुँचाया गया।

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