आदिकाल की पृष्ठभूमि:
हिंदी साहित्य का आदिकाल (10वीं से 14वीं शताब्दी) भाषा और साहित्यिक विकास के एक महत्वपूर्ण समय को दर्शाता है। इस काल में संस्कृत और अपभ्रंश भाषाओं का प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। संस्कृत का साहित्यिक प्रभाव बहुत व्यापक था, लेकिन इसकी कठिन भाषा के कारण जनसामान्य के लिए यह समझने में कठिन हो रहा था। यही कारण था कि जनभाषा के रूप में अपभ्रंश का विकास हुआ। इस प्रक्रिया में भाषा को सरल बनाया गया और अपभ्रंश ने लोक भाषा का रूप लिया।
अपभ्रंश का विकास:
सातवीं शताब्दी के आसपास अपभ्रंश भाषा पूरी तरह से विकास की ओर बढ़ी। अपभ्रंश भाषा संस्कृत के तत्सम शब्दों से भरपूर थी, और यह जनसमूह की समझ में आने लायक थी। अपभ्रंश ने संस्कृतनिष्ठ शब्दावली के साथ-साथ सरल वाक्य संरचना को अपनाया, जिससे यह आम जन को अधिक सुलभ हुई। दसवीं शताब्दी तक अपभ्रंश साहित्य ने अपने आप को एक सशक्त साहित्यिक भाषा के रूप में स्थापित किया। इस समय के साहित्य में विभिन्न काव्य रूपों और प्रवृत्तियों का समावेश हुआ, और कथा एवं शिल्प-विधान संस्कृत साहित्य के बंधनों से मुक्त हो गए।
राजाश्रय और लोकाश्रय साहित्य:
आदिकाल में साहित्यिक रचनाएँ राजाश्रय, धर्माश्रय और लोकाश्रय के आधार पर रची जा रही थीं। इस समय साहित्य के उद्देश्य में जनसाधारण की भावनाओं का चित्रण और उनके जीवन के साथ सम्बद्ध विषयों का समावेश था। वीर रस, शृंगार रस, और आध्यात्मिक रस की प्रवृत्तियाँ इस काल की साहित्यिक प्रवृत्तियाँ थीं।
- वीर रस: वीर रस की रचनाएँ युद्ध और शौर्य से सम्बंधित होती थीं, और इन्हें मुख्य रूप से राजाश्रय कवि लिखा करते थे। वीर रस की ओजस्वी शैली के कारण इसे ‘रासो’ कहा गया। वीर रस की रचनाओं में युद्ध के दौरान सैनिकों के साहस और संघर्ष को उजागर किया जाता था।
- शृंगार रस और आध्यात्मिक रस: इस समय शृंगार रस और आध्यात्मिक रस के मिश्रण से कुछ अत्यंत सुंदर काव्य रचनाएँ उत्पन्न हुईं। इन रचनाओं में प्रेम, भक्ति और मानवीय भावनाओं का मिश्रण था।
हिन्दी का प्रारम्भ और अपभ्रंश:
हिंदी भाषा का आदिकाल, अपभ्रंश से जुड़ा हुआ था। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इसे “आदि काल” कहा, जिसमें अपभ्रंश का प्रभाव प्रमुख था। दसवीं से चौदहवीं शताब्दी तक अपभ्रंश भाषा का ही वर्चस्व था, और इसमें नए तत्सम शब्दों का आगमन हुआ। यह काल हिंदी की नींव रखने वाला काल था, जिसमें अपभ्रंश ने एक सशक्त साहित्यिक भाषा का रूप लिया।
साहित्यिक रचनाएँ और कवि:
इस समय के प्रमुख कवियों और रचनाओं में वीर रस, भक्ति, शृंगार और आध्यात्मिक साहित्य का विकास हुआ। विद्यापति जैसे कवि इस काल में सक्रिय थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से हिंदी भाषा को एक नए दिशा में स्थापित किया। इसके अलावा सरहपाद और अन्य कवियों ने भी इस समय की महत्वपूर्ण रचनाओं में योगदान दिया।
साहित्य के उदाहरण:
- रचनाएँ:
- “नाद न, बिंदु न रवि न ससि मण्डल । चिअराअ सहाबे मूलक ।।”
- “उजू रे उजु जाडि मा तेहु रेबंक । निअहि वोहि जा जहुरे लंक ।।”
- सरहपाद का काव्य:
- “हम्मीर कज्ज जज्जल भण्इ फोहाणल यह मई जलउ । सुलितान-सीस करवाल दह तज्जि कलेवर दिअचलउ ।।”
- “शाड्र्गधर जनम अवधि हम रूप निहारल नयन न तिरपति भेल । से हो मधु वोल स्रवनहि सूनल सुति पथ परस न मेल ।।”
इन रचनाओं में वीर रस, शृंगार और भक्ति के भावों का समावेश था, और यह उस समय की सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों को व्यक्त करते थे।
निष्कर्ष:
आदिकाल का साहित्य भारतीय साहित्य के इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसमें अपभ्रंश का प्रभाव स्पष्ट था, और इसी काल में हिंदी की नींव पड़ी। इस समय के साहित्य में धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक विचारों का संगम हुआ, जो बाद के साहित्यिक विकास के लिए मार्गदर्शक बना।
