पूर्णांक: 40 अंक
समय: 1:30 घंटे
पाठ: 4. न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् / 5. सेवा हि परमो धर्मः
📝 खण्ड अ — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (10 अंक)
निर्देश: सही विकल्प चुनकर लिखिए। (प्रत्येक 1 अंक)
1. शृगालः किमर्थं वनं गच्छति?
(अ) क्रीडितुम् (ब) पिपासया बुभुक्षया च (स) स्नातुम् (द) पठितुम्
2. ‘द्राक्षाफलम्’ का अर्थ क्या है?
(अ) आम (ब) अंगूर (स) केला (द) सेब
3. शृगालः अन्ते किं वदति?
(अ) मधुरम् (ब) आम्लम् (स) तिक्तम् (द) कषायम्
4. ‘पलायते’ का अर्थ क्या है?
(अ) दौड़ता है (ब) भाग जाता है (स) पढ़ता है (द) खाता है
5. नागार्जुनः कः आसीत्?
(अ) राजा (ब) चिकित्सकः (स) कृषकः (द) शिक्षकः
6. नागार्जुनः कुत्र कार्य करोति स्म?
(अ) गृहे (ब) प्रयोगशालायाम् (स) उद्याने (द) विद्यालये
7. ‘सेवा’ का अर्थ क्या है?
(अ) सेवा (ब) खेल (स) पढ़ाई (द) भोजन
8. द्वितीयः युवकः किं कृतवान्?
(अ) औषधं निर्मितवान् (ब) रोगिणः सेवां कृतवान् (स) गृहं गतवान् (द) सुप्तवान्
9. ‘क्तवतु’ प्रत्यय का प्रयोग किस काल में होता है?
(अ) वर्तमान (ब) भूत (स) भविष्यत् (द) आज्ञा
10. ‘लभते’ किस प्रकार की धातु है?
(अ) परस्मैपदी (ब) आत्मनेपदी (स) उभयपदी (द) नामधातु
📝 खण्ड ब — अति लघु उत्तरीय प्रश्न (10 अंक)
निर्देश: उत्तर एक पंक्ति में लिखिए। (प्रत्येक 2 अंक)
11. शृगालः कां पश्यति?
12. ‘आम्लम्’ का अर्थ क्या है?
13. नागार्जुनः महाराजं किं निवेदितवान्?
14. द्वितीयः युवकः किमर्थं खिन्नः आसीत्?
15. ‘सेवा हि परमो धर्मः’ का अर्थ क्या है?
📝 खण्ड स — लघु उत्तरीय प्रश्न (10 अंक)
निर्देश: उत्तर 2-3 वाक्यों में लिखिए। (प्रत्येक 5 अंक)
16. शृगालः द्राक्षाफलं कथं प्राप्तुं प्रयत्नं करोति? वर्णयत।
अथवा
‘न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्’ कथायाः शिक्षा क्या है?
17. नागार्जुनः द्वितीयं युवकं किमर्थं चितवान्?
अथवा
सेवा भावना के बिना चिकित्सक क्यों नहीं हो सकता?
📝 खण्ड द — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 अंक)
निर्देश: उत्तर विस्तार से लिखिए। (प्रत्येक 10 अंक)
18. ‘सेवा हि परमो धर्मः’ पाठ का सारांश हिन्दी में लिखिए।
अथवा
निम्नलिखित श्लोक का अनुवाद एवं भावार्थ लिखिए —
“आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥”
📋 मॉडल उत्तर पत्र
खण्ड अ — वस्तुनिष्ठ प्रश्न
| प्रश्न | उत्तर |
|---|---|
| 1 | (ब) पिपासया बुभुक्षया च |
| 2 | (ब) अंगूर |
| 3 | (ब) आम्लम् |
| 4 | (ब) भाग जाता है |
| 5 | (ब) चिकित्सकः |
| 6 | (ब) प्रयोगशालायाम् |
| 7 | (अ) सेवा |
| 8 | (ब) रोगिणः सेवां कृतवान् |
| 9 | (ब) भूत |
| 10 | (ब) आत्मनेपदी |
खण्ड ब — अति लघु उत्तरीय प्रश्न
11. शृगालः द्राक्षालतां पश्यति।
12. ‘आम्लम्’ का अर्थ है — खट्टा।
13. नागार्जुनः महाराजं निवेदितवान् — “महाराज! मम चिकित्साकार्याय एकः सहायकः आवश्यकः” इति।
14. द्वितीयः युवकः खिन्नः आसीत् यतः सः रोगिणः सेवायां निरतः आसीत्, अतः औषधनिर्माणाय समयं न प्राप्तवान्।
15. ‘सेवा हि परमो धर्मः’ का अर्थ है — सेवा ही सर्वश्रेष्ठ धर्म है।
खण्ड स — लघु उत्तरीय प्रश्न
16. शृगालः द्राक्षाफलं प्राप्तुं बार-बार उत्पतति — एकवारम्, द्विवारम्, त्रिवारम्, पुनः पुनः। उछलने से तस्य स्वेदः जायते, श्रमः जायते। परन्तु द्राक्षाफलं उपरि लतासु दृश्यते, अतः सः तत् प्राप्तुं न शक्नोति। अन्ते सः वदति — “आम्लं द्राक्षाफलम्” इति।
अथवा
‘न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम्’ कथायाः शिक्षा — जब हमें कोई वस्तु प्राप्त नहीं होती, तो हम उसे बुरा कहकर अपनी असफलता को छिपाने का प्रयास करते हैं। यह मनोवृत्ति “अंगूर खट्टे हैं” कहलाती है। हमें परिश्रम करना चाहिए और असत्य नहीं बोलना चाहिए।
17. नागार्जुनः द्वितीयं युवकं चितवान् यतः सः रोगिणः सेवायां निरतः आसीत्। तेन औषधनिर्माणाय समयं न प्राप्तम्। परन्तु सेवा भावना एव चिकित्सकस्य प्रमुखं गुणम् अस्ति। अतः नागार्जुनः तं सहायकरूपेण स्वीकृतवान्।
अथवा
सेवा भावना के बिना चिकित्सक नहीं हो सकता क्योंकि चिकित्सक का मुख्य कार्य रोगियों की सेवा करना है। यदि उसमें सेवा भावना नहीं होगी, तो वह रोगी की सच्चे मन से सेवा नहीं कर पाएगा। इसलिए नागार्जुन ने कहा — “सेवाभावनां विना चिकित्सकः कथं भवेत्?”
खण्ड द — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
18. ‘सेवा हि परमो धर्मः’ पाठ का सारांश:
नागार्जुन एक प्रसिद्ध रसायनशास्त्रज्ञ और चिकित्सक थे। वे दिन-रात प्रयोगशाला में कार्य करते थे। एक दिन उन्होंने महाराज से सहायक की आवश्यकता बताई। राजा ने कहा — “कल कुछ योग्य युवक आएंगे। परीक्षा लेकर योग्य को चुन लें।”
अगले दिन दो युवक आए। दोनों की विद्या समान थी। नागार्जुन ने उन्हें एक विशिष्ट रसायन बनाकर लाने को कहा और दो दिन का समय दिया। साथ ही कहा — “राजमार्ग से जाना।”
दो दिन बाद पहला युवक आया। उसने घर की समस्याओं के बावजूद औषधि बनाई। दूसरा युवक दुःखी था। उसने बताया — “राजमार्ग में एक रोगी को देखा। उसे घर ले गया। दो दिन उसकी सेवा की। इसलिए औषधि नहीं बना सका।”
नागार्जुन ने दूसरे युवक को चुना। राजा ने पूछा — “पहले ने औषधि बनाई, फिर भी आपने दूसरे को क्यों चुना?”
नागार्जुन ने कहा — “दूसरा भी कुशल है, लेकिन वह सेवा में लीन था। मैंने उस रोगी को पहले राजमार्ग पर देखा था। पहले युवक ने रोगी को देखा भी नहीं। दूसरे ने सेवा भाव से उसकी सेवा की। सेवा भावना के बिना चिकित्सक कैसे हो सकता है? इसलिए मैंने दूसरे को चुना।”
शिक्षा: विद्या और धन से बढ़कर सेवा भावना है। सेवा ही परम धर्म है।
अथवा
श्लोक:
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्थो महान् रिपुः।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कृत्वा यं नावसीदति॥
अनुवाद: आलस्य मनुष्य के शरीर में स्थित महान शत्रु है। परिश्रम के समान कोई मित्र नहीं है, क्योंकि परिश्रम करने वाला कभी दुःखी नहीं होता।
भावार्थ: आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। यह उसे कुछ करने नहीं देता। परिश्रम मनुष्य का सच्चा मित्र है। जो परिश्रम करता है, वह कभी असफल नहीं होता। अतः हमें आलस्य छोड़कर परिश्रम करना चाहिए।
