📋 परीक्षा विवरण
| विवरण | जानकारी |
|---|---|
| माह | अक्टूबर |
| कक्षा | 7वीं |
| विषय | संस्कृत |
| पाठ | 7. ईशावास्यम् इदं सर्वम्, 8. हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः |
| पूर्णांक | 40 अंक |
| समय | 1:30 घंटे |
📝 प्रश्न पत्र
खण्ड (अ) — वस्तुनिष्ठ प्रश्न (10 अंक)
प्रश्न 1. सही उत्तर चुनकर लिखिए। (1×5=5)
(क) ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ का अर्थ है —
(अ) यह सब ईश्वर से व्याप्त है
(ब) यह सब जल से व्याप्त है
(स) यह सब वायु से व्याप्त है
(द) यह सब अग्नि से व्याप्त है
(ख) हिरण्यकशिपु को वरदान किससे मिला था?
(अ) विष्णु से
(ब) शिव से
(स) ब्रह्मा से
(द) इन्द्र से
(ग) प्रह्लाद किसके भक्त थे?
(अ) शिव के
(ब) विष्णु के
(स) ब्रह्मा के
(द) इन्द्र के
(घ) ‘माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः’ — यह किस पाठ का श्लोक है?
(अ) वन्दे भारतमातरम्
(ब) नित्यं पिबामः सुभाषितरसम्
(स) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः
(द) ईशावास्यम् इदं सर्वम्
(ङ) ‘शीलं परं भूषणम्’ का अर्थ है —
(अ) धन श्रेष्ठ आभूषण है
(ब) विद्या श्रेष्ठ आभूषण है
(स) चरित्र श्रेष्ठ आभूषण है
(द) रूप श्रेष्ठ आभूषण है
प्रश्न 2. रिक्त स्थान भरिए। (1×5=5)
(क) ईश्वरः ____________ अस्ति।
(ख) प्रह्लादः ____________ नारायणाय इति जपति स्म।
(ग) नृसिंहः ____________ स्तम्भात् बहिः आगच्छत्।
(घ) शरीरम् आद्यं ____________।
(ङ) हितं मनोहारि च ____________ वचः।
खण्ड (ब) — अतिलघु उत्तरीय प्रश्न (10 अंक)
प्रश्न 3. एकपदेन उत्तर लिखिए। (1×5=5)
(क) हिरण्यकशिपुः कस्य पुत्रः आसीत्?
(ख) प्रह्लादं मारयितुं का आगतवती?
(ग) नृसिंहः कैः हिरण्यकशिपुं मारितवान्?
(घ) ‘सुखार्थिनः कुतो विद्या’ — कस्य वचनम्?
(ङ) ‘शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्’ — किं धर्मसाधनम्?
प्रश्न 4. सही जोड़ी बनाइए। (1×5=5)
| स्तम्भ (अ) | स्तम्भ (ब) |
|---|---|
| (क) ईशावास्यम् | (1) चरित्र |
| (ख) प्रह्लादः | (2) विष्णुभक्त |
| (ग) शीलम् | (3) ईश्वर से व्याप्त |
| (घ) क्रियावान् | (4) दुर्लभ |
| (ङ) हितं मनोहारि | (5) विद्वान् |
खण्ड (स) — लघु उत्तरीय प्रश्न (10 अंक)
प्रश्न 5. निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में लिखिए। (2×3=6)
(क) हिरण्यकशिपुः प्रह्लादं किमर्थं मारयितुम् इच्छति स्म?
(ख) ‘न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत्’ — अस्य भावार्थं लिखत।
(ग) ‘गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः’ — अस्य भावार्थं लिखत।
प्रश्न 6. निम्नलिखित शब्दों के अर्थ हिन्दी में लिखिए। (1×4=4)
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| (क) ईशावास्यम् | |
| (ख) अहर्निशम् | |
| (ग) क्षणशः | |
| (घ) दुर्लभम् |
खण्ड (द) — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (10 अंक)
प्रश्न 7. ‘ईशावास्यम् इदं सर्वम्’ पाठ के आधार पर प्रह्लाद और नृसिंह की कथा हिन्दी में लिखिए। (5 अंक)
प्रश्न 8. ‘हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’ पाठ के आधार पर कोई तीन सूक्तियाँ संस्कृत में लिखिए और उनका हिन्दी अर्थ लिखिए। (5 अंक)
✅ मॉडल उत्तर पत्र
खण्ड (अ) — वस्तुनिष्ठ प्रश्न
प्रश्न 1.
(क) (अ) यह सब ईश्वर से व्याप्त है
(ख) (स) ब्रह्मा से
(ग) (ब) विष्णु के
(घ) (स) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः
(ङ) (स) चरित्र श्रेष्ठ आभूषण है
प्रश्न 2.
(क) ईश्वरः सर्वत्र अस्ति।
(ख) प्रह्लादः ॐ नमो नारायणाय इति जपति स्म।
(ग) नृसिंहः स्तम्भात् बहिः आगच्छत्।
(घ) शरीरम् आद्यं धर्मसाधनम्।
(ङ) हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।
खण्ड (ब) — अतिलघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 3.
(क) कश्यपः
(ख) होलिका
(ग) निजनखैः
(घ) भर्तृहरिः
(ङ) शरीरम्
प्रश्न 4.
| स्तम्भ (अ) | स्तम्भ (ब) |
|---|---|
| (क) ईशावास्यम् | (3) ईश्वर से व्याप्त |
| (ख) प्रह्लादः | (2) विष्णुभक्त |
| (ग) शीलम् | (1) चरित्र |
| (घ) क्रियावान् | (5) विद्वान् |
| (ङ) हितं मनोहारि | (4) दुर्लभ |
खण्ड (स) — लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 5.
(क) हिरण्यकशिपुः प्रह्लादं किमर्थं मारयितुम् इच्छति स्म?
उत्तर: हिरण्यकशिपुः प्रह्लादं मारयितुम् इच्छति स्म यतः प्रह्लादः विष्णोः भक्तः आसीत्। सः अहर्निशं हरेः गुणगानं करोति स्म। हिरण्यकशिपुः स्वयं को ईश्वर मानता था, अतः प्रह्लाद की विष्णुभक्ति उसे असह्य थी।
(ख) ‘न रत्नमन्विष्यति, मृग्यते हि तत्’ — अस्य भावार्थं लिखत।
उत्तर: रत्नं स्वयं न अन्विष्यति, तत् मृग्यते हि। अर्थात् रत्न स्वयं नहीं ढूँढ़ता, वह तो ढूँढ़ा जाता है। इसी प्रकार गुणी जन स्वयं प्रसिद्ध होते हैं, उन्हें ढूँढ़ना नहीं पड़ता।
(ग) ‘गुणाः पूजास्थानं गुणिषु न च लिङ्गं न च वयः’ — अस्य भावार्थं लिखत।
उत्तर: गुणियों में गुण ही पूजा के योग्य हैं, न लिंग और न आयु। अर्थात गुणी व्यक्ति स्त्री हो या पुरुष, बालक हो या वृद्ध — सब पूजनीय हैं।
प्रश्न 6.
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| (क) ईशावास्यम् | ईश्वर से व्याप्त |
| (ख) अहर्निशम् | दिन-रात |
| (ग) क्षणशः | प्रत्येक क्षण |
| (घ) दुर्लभम् | दुर्लभ |
खण्ड (द) — दीर्घ उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न 7. प्रह्लाद और नृसिंह की कथा
हिरण्यकशिपु नाम का एक दैत्यराज था, जो स्वयं को सर्वशक्तिमान और अमर मानता था। उसे ब्रह्मा से वरदान मिला था कि न मनुष्य उसे मार सकता है, न पशु, न दिन में, न रात में, न अस्त्र से, न शस्त्र से। इस वरदान के कारण वह अहंकारी हो गया था।
उसका पुत्र प्रह्लाद परम भक्त था। वह सदा “ॐ नमो नारायणाय” का जप करता था। हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को मारने के अनेक प्रयास किए — हाथी से कुचलवाया, पर्वत से गिराया, समुद्र में फेंकवाया, जहर दिया, होलिका के साथ अग्नि में बैठाया। लेकिन हर बार विष्णु की कृपा से प्रह्लाद बच गया। होलिका स्वयं अग्नि में जल गई।
अंत में हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से पूछा — “तेरा नारायण कहाँ है?” प्रह्लाद ने कहा — “वह सर्वत्र है — स्तंभ में भी।” हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर स्तंभ को तोड़ा। तभी उस स्तंभ से नृसिंह भगवान (आधे मनुष्य, आधे सिंह) प्रकट हुए और उन्होंने संध्या काल में देहरी पर अपने नाखूनों से हिरण्यकशिपु को मार डाला। इस प्रकार ब्रह्मा के वरदान का पूर्ण पालन करते हुए भगवान ने हिरण्यकशिपु का वध किया और प्रह्लाद की रक्षा की।
शिक्षा: ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है। अहंकार का नाश निश्चित है। भक्त की भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती।
प्रश्न 8. तीन सूक्तियाँ
सूक्ति 1:
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः॥
हिन्दी अर्थ: पृथ्वी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।
सूक्ति 2:
शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्॥
हिन्दी अर्थ: शरीर ही धर्म का पहला साधन है।
सूक्ति 3:
शीलं परं भूषणम्॥
हिन्दी अर्थ: शील (चरित्र) ही श्रेष्ठ आभूषण है।
