रैदास के पद
जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात ।। रैदास कनक और कंगन माहि जिमि अंतर कुछ नाहि । जैसे ही अंतर नहीं हिन्दुअन तुरकन माहि । हिंदू तुरक नहीं कछु भेदो सभी मह एक रक्त और मासा । दोस एकऊ दूजा नाहीं, पेख्यों सोड़ रैदासा।। कह रैदास तेरी भगति दूरि है, भाग बड़े सो पावै । तजि अभिमान मेटि आपा पर पिपिलक हवै चुनि खावै।।
प्रभु जी तुम संगति सरन तिहारी जगजीवन राम मुरारी। गली-गली को जल बहि आयो, सुरसरि जाय समायो संगति के परताप महातम नाम गंगोदक पायो । स्वाति बूंद बरसे फनि ऊपर, सोई विज होई लाई। ओही बूँद के मोती निपजै, संगति की अधिकाई ।। तुम चंदन हम रैंड बापुरे, निकट तुम्हारे आसा । संगति के परताप महातम आवै बास सुबासा।। जाति भी ओछी, करम भी ओछा, ओछा कसब हमारा। नीचे से प्रभु ऊंच कियो है, कहि रैदास विचारा।।

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