यह कविता छत्तीसगढ़ी भाषा में लिखी गई है, जो किसान के जीवन, मेहनत, आत्मसम्मान और सकारात्मक सोच का अद्भुत चित्रण करती है।
पाठ योजना: ये जिनगी फेर चमक जाए (कक्षा – 10वीं)
शिक्षण उद्देश्य:
- छात्र छत्तीसगढ़ी भाषा के सौंदर्य और लोक जीवन की सहजता से परिचित हो सकें।
- छात्र किसान के श्रम (मेहनत), आत्मसम्मान और सकारात्मक जीवन दृष्टि को समझ सकें।
- छात्र कविता में प्रयुक्त प्रतीकों (कोठी, धान, घुघुवा, कोइली, पसीना, अमृत) का भावार्थ ग्रहण कर सकें।
- छात्र छत्तीसगढ़ी की विभक्तियों और अलंकारों (उपमा) को पहचान सकें।
Day 1: कवि परिचय, भाषा-परिचय और पहला चरण
- प्रवेश (5 मिनट): कक्षा में एक किसान के खेत में काम करते हुए चित्र दिखाएं। पूछें: “फसल कटने पर किसान के मन में कैसी खुशी होती होगी? अगर घर में अनाज भरा हो, तो जीवन कैसा लगता है?” छात्रों से चर्चा करें।
- कवि परिचय (10 मिनट): भगवती लाल सैन का परिचय दें। बताएं कि वे छत्तीसगढ़ के लोकप्रिय कवि थे, जो किसान, मजदूर और उपेक्षित लोगों के सुख-दुख को अपनी कविताओं में उतारते थे। उनकी प्रमुख कृतियाँ (पहला-नदिया मरे पियास, सुरू रे कान) बताएं। उन्हें ‘छत्तीसगढ़ राज्य अलंकरण’ से सम्मानित किया गया था।
- सस्वर वाचन (5 मिनट): शिक्षक कविता का पहला चरण छत्तीसगढ़ी लहजे में भावपूर्ण पढ़ें।
- “कोठी म धान छलक जाए, ये जिनगी फेर चमक जाए।”
- “झन बेर भाव खेती म कर, मन के भुसभुस निकार फेंकों।”
- व्याख्या (20 मिनट):
- कोठी म धान छलक जाए: घर की कोठरी में धान इतना भरा हो कि वह छलकने लगे। यह अच्छी फसल और समृद्धि का प्रतीक है।
- जिनगी फेर चमक जाए: यदि मेहनत का फल मिले, तो जीवन में चमक आ जाती है।
- भुसभुस निकार फेंकों: मन में शंका, नकारात्मकता और दुख (भुसभुस) को दूर फेंक दो।
- हाँसों-गोठियावों जुरमिल के: मिलकर हँसना और बातें करना। “गोठियाना” मतलब बातचीत करना।
- शब्दार्थ: कोठी (अनाज रखने का स्थान), भुसभुस (शंका/मानसिक दुख), झन (मत), गोठियावों (बातचीत करो)।
- गृहकार्य: पाठ से प्रश्न 1 लिखिए: “‘कोठी म धान छलक जाए, ये जिनगी फेर चमक जाए।’ पंक्ति का आशय स्पष्ट कीजिए।”
Day 2: दूसरा और तीसरा चरण – समझदारी और स्नेह की सीख
- पुनरावृत्ति (5 मिनट): पिछले दिन की कविता का भाव पूछें और गृहकार्य जांचें।
- सस्वर वाचन (5 मिनट): कविता का दूसरा और तीसरा चरण पढ़ें।
- व्याख्या (25 मिनट):
- “जिनगी भर हे रोना-धोना, लिखे कपार लूना बोना।” – किस्मत में दुख ही लिखा है तो क्या करें? कवि कहते हैं कि भाग्य पर मत रोओ।
- “जाना है दुनिया ले सबला, काबर कथ्थस जादू टोना।” – दुनिया में सबसे बड़ा काम “जादू टोना” करना नहीं, बल्कि मेहनत (काबर) करना है।
- बिगिया में कोइली (कोयल) जैसा बोलना: “मुँह घुघवा असन फुलोवौ झन” – कोइली की तरह मीठा बोलना चाहिए, उल्लू (घुघुवा) की तरह बुरा नहीं। यहाँ सकारात्मक बोली बोलने की सीख दी गई है।
- सुंता (सुमिति/सुबुद्धि) से रहना: “सुंता रे था झन आज, हँडिया कस मात फदक जाए।” – हमेशा अच्छी सोच और समझदारी से काम लेना चाहिए, क्रोध में हंडिया (बर्तन) नहीं फोड़ना चाहिए।
- स्नेह की भावना: “मैंह घुघुवा असन फुलोवौ झन… गुँगुवावत मया भभक जाए।” – स्नेह (मया) को दबाकर नहीं रखना चाहिए, खुलकर प्रकट करना चाहिए ताकि मन का बोझ हल्का हो जाए।
- भाव स्पष्ट कीजिए: कवि ने “घुघुवा” (उल्लू) और “कोइली” (कोयल) का उदाहरण क्यों दिया है? (प्रश्न 2 और 4)
- गृहकार्य: पाठ से प्रश्न 3 लिखिए: “सुंता (सुमिति) से रहने से क्या लाभ होता है?”
Day 3: चौथा और पाँचवां चरण – मेहनत का महत्व और आत्मविश्वास
- पुनरावृत्ति (5 मिनट): कविता के पिछले चरणों की सामूहिक व्याख्या दोहराएं।
- व्याख्या (25 मिनट):
- भुइयाँ के पीरा की समझ: “भुइँया के पीरा ल समझो धरती के हीरा ल समझो” – धरती और मिट्टी के दर्द (पीरा) को समझो। धरती को हीरा मानकर उसकी सेवा करो।
- काबर अगास ला नापत हौ: “काबर अगास ला नापत हौ, मोरा के पीरा ल समझो” – कवि कहते हैं, तुम आसमान (अगास) नाप रहे हो (बड़े सपने देख रहे हो), लेकिन मेरे दिल के दर्द को समझो (मेहनत और परिश्रम को महत्व दो)।
- पसीने और अमृत की तुलना: “पसीना अमृत बन जाए, सपने में देखो सोनेहा लाल।” – मेहनत का पसीना ही असली अमृत है, जो जीवन को सफल बनाता है।
- जगत की भाग-दौड़: “जुग तोर बाट ल जोहत हे, पल छिन दिन माला पोहत है।” – संसार आपका इंतजार करता है, समय गुजरता जाता है। इसलिए बिना देर किए मेहनत करो और जीवन को सफल बनाओ।
- अंतिम पंक्ति का सार: “अमरित बन चूहे पसीना तोर, मेहनत दुनिया ल मोहत है।” – मेहनत ही दुनिया को मोहित करती है। मेहनत करने वालों को ही दुनिया पसंद करती है।
- गृहकार्य: पाठ से प्रश्न 6 लिखिए: “पसीने की अमृत से तुलना क्यों की गई है? समझाइए।”
Day 4: भाषा अध्ययन और व्याकरण
- पुनरावृत्ति (5 मिनट): कविता का सस्वर वाचन करवाएं।
- भाषा कार्य (25 मिनट): पाठ्यपुस्तक के “भाषा के बारे में” खंड का अभ्यास कराएं।
- छत्तीसगढ़ी विभक्तियाँ और अव्यय: पाठ से ‘मं’ (में), ‘कस’ (जैसा), ‘ला’ (को), ‘हे’ (है) जैसे शब्द छाँटें। इनके हिंदी अर्थ लिखें। (जैसे – कोठी म = कोठी में, भुइँया के पीरा = धरती का दर्द)।
- अलंकार (उपमा): कविता में “चंदा अस मन, सुंरज कस तन” (चंद्रमा जैसा मन, सूरज जैसा तन)। यहाँ ‘अस’ और ‘कस’ उपमा वाचक शब्द हैं। इसे उपमा अलंकार कहते हैं।
- रस (शांत रस): कविता में जीवन की असारता (नकारात्मकता को हटाकर) और सादगी के भाव हैं। कविता में से शांत रस की पंक्तियाँ चुनें (जैसे – “कोठी म धान छलक जाए, ये जिनगी फेर चमक जाए”)।
- व्यंजना शक्ति: समझाएं कि “कोठी म धान छलक जाए” का व्यंजना (गहरा अर्थ) है – समृद्ध होना, भाग्य का साथ देना। प्रत्येक पाठक के लिए यह अलग अर्थ ले सकता है।
- गृहकार्य: “चंदा अस मन सुरुज कस तन” में कौन सा अलंकार है? अपने शब्दों में लिखिए।
Day 5: अभ्यास, प्रायोजना और मूल्यांकन
- अभ्यास कार्य (20 मिनट): पाठ्यपुस्तक के “पाठ से” और “पाठ से आगे” के प्रश्नों का सामूहिक अभ्यास करें।
- प्रश्न 2 (पाठ से आगे): “भुइँया के पीरा” से कवि का क्या आशय है? (किसान की मेहनत और धरती की प्यास को समझना)।
- प्रश्न 4: मेहनतकश को दुनिया क्यों पसंद करती है? (क्योंकि मेहनत से ही सृष्टि चलती है और लोग उसकी ईमानदारी का सम्मान करते हैं)।
- प्रश्न 6: “जिनगी भर हे रोना-धोना” कथन से सहमत/असहमत होने का तर्क लिखिए। (असहमत – जीवन में मेहनत और सकारात्मक सोच से खुशियाँ लाई जा सकती हैं)।
- प्रायोजना कार्य (15 मिनट):
- छात्रों से कहें कि वे अपने आस-पास के किसी किसान से मिलें और उसके जीवन की दिनचर्या (सुबह से शाम तक) के बारे में जानकारी लिखें।
- कक्षा में किसान जीवन पर आधारित अन्य छत्तीसगढ़ी या हिंदी कविताओं का संकलन करें।
- मूल्यांकन (10 मिनट): कविता के केंद्रीय भाव (मेहनत और सकारात्मकता), घुघुवा-कोइली के प्रतीक, और उपमा अलंकार पर आधारित एक छोटा लिखित परीक्षण लें।
- गृहकार्य: कविता का हिंदी में सुंदर भावार्थ लिखकर लाएं।
(नोट: कविता में छत्तीसगढ़ी शब्दों (जैसे – हे, मं, कस, ला) का प्रयोग हुआ है, कक्षा में इनके हिंदी अर्थ बताना आवश्यक है ताकि छात्रों को पाठ पूरी तरह समझ आए।)
