दशमः पाठः विश्वबन्धुत्वम्
विश्वस्य सर्वान् जनान् प्रति बन्धुत्वस्य भावः एव विश्वबन्धुत्वम् इति कथ्यते। शान्तिमयाय जीवनाय विश्वबन्धुत्वस्य भावना नितरां महत्त्वं भजते। सर्वजनहितं सर्वजनसुखं च बन्धुत्वं विना न सम्भवति। विश्वबन्धुत्वम् एव दृष्टौ निधाय केनापि मनीषिणा निर्दिष्टम् – अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥
साम्प्रतम् अखिले संसारे अशान्तेः हिंसायाः च साम्राज्यं व्याप्तम् अस्ति। येन साधनसम्पन्नः अपि मानवः सुखस्य स्थाने दुःखमेव अनुभवति। यद्यपि ज्ञानबलेन मानवः इदानीं आकाशे विचरितुं, सागरान् सन्तर्तुं, विश्वभ्रमणं कर्तुं, चन्द्रादिग्रहेषु च गन्तुं समर्थः अस्ति, तथापि परस्परं सम्बन्धानां कटुता अशान्तिः चैव दृश्यते। विगतयोः द्वयोः विश्वयुद्धयोः विनाशलीलां सर्वे जानन्ति एव। इदानीं तृतीयस्य युद्धस्य सम्भावना सर्वदा मानवजातिम् आक्रान्तं करोति। आयुधानाम् अविवेकपूर्णः संग्रहः, नाभिकीयशक्तेः परीक्षणम्, देशानां प्रतिद्वंद्विता च विश्वं नाशं प्रति नयन्ति। अतएव विश्वबन्धुत्वम् अपरिहार्यम्।
मानवः मानवं प्रति बन्धुवत् आचरणं कुर्यात्। एकः देशः अन्येन देशेन सह बन्धुतायाः व्यवहारं कुर्यात्। सबलाः देशाः दुर्बलेषु देशेषु आक्रमणं न कुर्युः। स्वार्थस्य लोलुपतायाः महत्वाकाङ्क्षायाः च स्थाने परस्परं सहयोगस्य प्रसारो भवेत्।
अधुना संसारस्य कतिपयेषु महाद्वीपेषु परस्परं शत्रुतायाः हिंसायाश्च साम्राज्यं व्याप्तमस्ति। अखिलं विश्वं विविधाभिः समस्याभिः पीडितम् अस्ति। जीवने शान्तिः दुर्लभा जाता। कुत्रचित् श्वेताश्वेतयोः कारणात् कलहो वर्तते। कुत्रचित् धर्मभेदः विद्वेषस्य कारणमस्ति। कुत्रचित् तु वर्गभेदः, लिङ्गभेदः, जातिभेदः वा। स्वार्थाय, अहंकाराय, शक्तिवर्धनाय चापि देशाः संघर्षरताः सन्ति। अनेन मानवः एव मानवहन्ता सञ्जातः।
तथापि शान्तिस्थापनार्थम् अनेके देशाः अनेकाः संस्थाः च प्रयासरताः सन्ति। यथा संयुक्तराष्ट्रसंघः, गुटनिरपेक्षान्दोलनं, जनान्दोलनं च विश्वबन्धुत्वं स्थापयितुं सततं प्रयत्नं कुर्वन्ति। इदम् अस्माकमपि दायित्वम् इति स्मरणीयम्। संसारे सर्वेषु मानवेषु समानं रक्तं प्रवहति। सर्वे समानाः सन्ति। अस्माकं कामना अस्ति –
सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत्॥
हिन्दी अर्थ (सरल भाषा में)
विश्व के सभी लोगों के प्रति भाईचारे की भावना को ही विश्वबन्धुत्व कहा जाता है। शांतिपूर्ण जीवन के लिए विश्वबन्धुत्व की भावना अत्यंत आवश्यक है। भाईचारे के बिना न तो सबका कल्याण संभव है और न ही सबका सुख। विश्वबन्धुत्व को ध्यान में रखकर किसी विद्वान ने कहा है—
“यह मेरा है, वह पराया है”—ऐसी सोच छोटे मन वालों की होती है।
उदार चरित्र वाले लोगों के लिए तो पूरी पृथ्वी ही परिवार है।
वर्तमान समय में पूरे संसार में अशांति और हिंसा का फैलाव हो गया है। जिसके कारण साधनों से सम्पन्न होने पर भी मनुष्य सुख के स्थान पर दुःख का अनुभव करता है। यद्यपि आज मनुष्य अपने ज्ञान के बल पर आकाश में उड़ सकता है, समुद्र पार कर सकता है, पूरे विश्व की यात्रा कर सकता है और चंद्रमा जैसे ग्रहों तक भी पहुँच चुका है, फिर भी आपसी संबंधों में कड़वाहट और अशांति दिखाई देती है।
पिछले दो विश्वयुद्धों की विनाशलीला को सभी जानते हैं। आज तीसरे विश्वयुद्ध की संभावना भी सदैव मानव जाति को भयभीत करती रहती है। हथियारों का विवेकहीन संग्रह, परमाणु शक्ति का परीक्षण और देशों के बीच प्रतिस्पर्धा—ये सभी संसार को विनाश की ओर ले जा रहे हैं। इसलिए विश्वबन्धुत्व अत्यंत आवश्यक है। मनुष्य को मनुष्य के साथ भाई जैसा व्यवहार करना चाहिए। एक देश को दूसरे देश के साथ भाईचारे का व्यवहार करना चाहिए। शक्तिशाली देशों को कमजोर देशों पर आक्रमण नहीं करना चाहिए। स्वार्थ, लोभ और सत्ता की लालसा के स्थान पर आपसी सहयोग को बढ़ावा देना चाहिए।
आज संसार के कुछ महाद्वीपों में शत्रुता और हिंसा फैली हुई है। पूरा विश्व अनेक समस्याओं से पीड़ित है और जीवन में शांति दुर्लभ हो गई है। कहीं श्वेत और अश्वेत के भेद के कारण संघर्ष है, कहीं धर्मभेद से द्वेष फैल रहा है, तो कहीं वर्गभेद, लिंगभेद और जातिभेद के कारण। स्वार्थ, अहंकार और शक्ति बढ़ाने की चाह में देश आपस में संघर्ष कर रहे हैं। इस प्रकार मनुष्य ही मनुष्य का हत्यारा बन गया है।
फिर भी शांति की स्थापना के लिए अनेक देश और अनेक संस्थाएँ प्रयासरत हैं, जैसे—संयुक्त राष्ट्र संघ, गुटनिरपेक्ष आंदोलन और विभिन्न जन-आंदोलन। ये सभी विश्वबन्धुत्व स्थापित करने के लिए निरंतर प्रयत्न कर रहे हैं। यह बात हमें भी याद रखनी चाहिए कि यह हमारा भी कर्तव्य है। संसार के सभी मनुष्यों में समान रक्त बहता है, सभी मनुष्य समान हैं। हमारी कामना है—
सभी सुखी हों,
सभी निरोग हों,
सभी मंगलमय जीवन देखें,
और कोई भी दुःखी न हो।
