सामाजिक अध्ययन

आधुनिक यूरोप का उदय कक्षा 8 इतिहास

आधुनिक यूरोप का उदय कक्षा 8 इतिहास

 इतिहास मानव के सम्पूर्ण क्रियाकलाप और घटनाओं का एक निरंतर चलने वाला क्रम है। इसलिए जानकारी, समझ, अध्ययन और अध्यापन आदि की सरलता के लिए इतिहासकारों ने विश्व इतिहास को तीन कालों में विभाजित किया है, जो निम्नानुसार है :

  • 1. प्राचीन काल
  • 2. मध्य काल
  • 3. आधुनिक काल

यह विभाजन विभिन्न देशों में एक निश्चित और लम्बी अवधि तक चलने वाले राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और सांस्कृतिक ढाँचे में शामिल हो रही नवीन प्रवृत्तियों के आधार पर किया गया है।

आधुनिक काल की विशेषताएँ

1. तर्क एवं बुद्धिवाद –

इस युग में व्यक्ति किसी तथ्य को तब स्वीकार करता था जब वह उसे तर्क की कसौटी पर प्रमाणित पाता था। इसके कारण यूरोप में विज्ञान का विकास हुआ ।

2. मानववाद

इस युग में मानव की उन्नति और भौतिक सुखों को ज्यादा महत्व दिया जाने लगा। ऐसा माना गया कि मनुष्य में उन्नति करने और एक उन्नत समाज का निर्माण करने की अपरिमित क्षमता है।

3. नवीन अन्वेषण

आधुनिक काल में भौगोलिक खोजों, विज्ञान की प्रगति, औद्योगिक क्रांति एवं नवीन राजनीतिक, सामाजिक विचारधाराओं की शुरुआत हुई।

यूरोप में जहाँ 15 वीं और 16वीं शताब्दियों के बीच आधुनिक काल का आरंभ हुआ, वहीं भारत में आधुनिक काल का उदय 18वीं शताब्दी में हुआ । इसका मतलब यह है कि सम्पूर्ण विश्व में आधुनिक काल का उदय एक साथ नहीं हुआ। विश्व के इस आधुनिक काल का इतिहास जानने के लिए हमें उन तमाम साधनों की जानकारी होना भी जरूरी है, जिन्हें हम इतिहास के स्रोत कहते हैं।

पृष्ठभूमि

पंद्रहवीं शताब्दी तक यूरोप के सामाजिक जीवन पर सामंतों तथा धर्म गुरुओं का वर्चस्व था, जिनकी तुलना में राज- सत्ता (राजा) निर्बल थी। इनके शोषण और दमन से साधारण जनता त्रस्त थी। ईसाइयों के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप को ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था, इसलिए ईश्वर और परलोक से जुड़ी बातों पर ज्यादा महत्व दिया जाता था।

ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस

14वीं शताब्दी में ही यूरोप के इस मध्यकालीन ढाँचे पर प्रहार किए जाने लगे थे। अब मानव के वर्तमान जीवन के दुःख दर्दों पर ज्यादा मनुष्य की सोचने व तर्क करने की शक्ति पर विश्वास करना, प्रचलित पारम्परिक विचारों तर्क के आधार पर समीक्षा करने लगे तथ्यों की तह तक जाना और तब स्वयं निर्णय लेना कि क्या और लोगों को बुद्धिनिष्ठा का महत्व समझाने लगे।

बुद्धिनिष्ठा का अर्थ है : ध्यान दिया जाने लगा। इस समय के प्रबुद्ध विचारक समाज में शिक्षा देने लगे कि "विश्व को अपनी खुली आँखों से देखो और जो बुद्धि को स्वीकार हो उसे ही मानो।"

यूरोप का पुनर्जागरण

वैचारिक क्रांति –

पंद्रहवीं शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण अर्थात् वैचारिक क्रांति का आरंभ हुआ। ग्रीक, लैटिन आदि भाषाओं के प्राचीन ग्रंथों का स्थानीय भाषाओं में अनुवाद तथा नए सिरे से अध्ययन होने लगा। छपाई की मशीन का आविष्कार होने के कारण पुस्तकें अधिक संख्या में आसानी से और कम कीमत पर लोगों को उपलब्ध होने लगीं। फलतः ज्ञान का प्रसार तेजी से हुआ।

छपाई की मशीन का आविष्कार

प्राचीन ज्ञान एवं नवीन विचारों के अध्ययन से वैचारिक क्रांति को प्रेरणा मिली। प्राचीन ग्रंथों में निहित बुद्धि निष्ठा, भौतिक जीवन के महत्व का बोध आदि बातें यूरोप में पुनः जड़ें पकड़ने लगीं।

इस दृष्टिकोण ने साहित्य, चित्रकला, शिल्पकला, विज्ञान आदि सभी विधाओं को प्रभावित किया। कलाकार अपनी कलाकृतियों में देवी-देवताओं, देवदूतों के स्थान पर मनुष्य की भावनाओं एवं प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण करने लगे।

कोपर्निकस तथा गैलिलियो जैसे खगोल वैज्ञानिकों ने ब्रह्मांड के बारे में प्रचलित सिद्धांतों का खंडन करके नए सिद्धांतों का प्रतिपादन किया, जैसे सूर्य नहीं घूमता बल्कि पृथ्वी सूर्य – के चारों ओर चक्कर लगाती है। इन सबका परिणाम यह हुआ कि धार्मिक मान्यताओं पर आधारित विचार प्रभावित होने लगे तथा धर्म सुधार आंदोलन का सूत्रपात हुआ

कोपर्निकस
गैलिलियों

धर्म सुधार आन्दोलन

मध्यकालीन यूरोपीय समाज पर रोमन कैथोलिक चर्च का अत्यधिक नियंत्रण था। ईसाई धर्म ग्रंथ बाईबिल लेटिन भाषा में लिखा गया था। सामान्य लोग इस लेटिन भाषा को नहीं समझते थे। लोगों के इस अज्ञानता का अनुचित लाभ उठाते हुए ईसाई धर्म गुरु कर्म-कांडो को बढ़ावा देते व धर्म के नाम पर लोगों का शोषण करते थे। धर्म-संस्थाओं में भ्रष्टाचार का बोलबाला था। इस भ्रष्टाचार के विरुद्ध यूरोप में जो आंदोलन आरंभ हुआ, उसे धर्म सुधार आंदोलन कहा जाता है।

उन दिनों के विचारकों ने धर्म-संस्थाओं में व्याप्त भ्रष्टाचारों के विरुद्ध आवाज बुलंद की। बाईबिल का अनुवाद स्थानीय भाषाओं में किया गया ताकि सामान्य लोग अपने धर्म-ग्रंथों को स्वयं पढ़ सकें ।

मार्टिन लूथर नामक जर्मन धर्मगुरु ने धार्मिक संस्थाओं के दुराचारों की निंदा करते हुए एक खुला वक्तव्य जारी किया, जिसमें उसने जनता से कहा आप लोगों को धर्म गुरुओं के कथन को ही धर्म न मानकर स्वयं बाईबिल पढ़ना चाहिए और धर्म के तत्वों को समझना चाहिए। उसने ईसाई धर्म गुरु के प्रमुख पोप की निरंकुश सत्ता को चुनौती दी और धर्म व्यवस्था में प्रचलित दोषों का विरोध ( प्रोटेस्ट) किया। इसलिए उसके अनुयायियों को प्रोटेस्टेंट कहा जाने लगा। धर्म सुधार आंदोलन के फलस्वरूप पोप के दबदबे में कमी आई। पोप के वर्चस्व से परेशान यूरोप के कुछ शासकों ने भी पोप का वर्चस्व मानने से इंकार कर दिया। इनमें इंग्लैण्ड का राजा हेनरी अष्टम भी एक था। इस तरह धर्म सुधार आंदोलन ने यूरोप में आधुनिक विचारों का सूत्रपात कर को सम्भव बनाया।

राष्ट्रवाद एवं राष्ट्रीय राजतंत्रों का उदय

सोलहवीं शताब्दी में यूरोप में सामंतों की सत्ता का लोप होने लगा और राजाओं का महत्व बढ़ने लगा। एक निश्चित भौगोलिक क्षेत्र में लंबे समय से निवास करने वाले, समान भाषा, ऐतिहासिक परंपरा, राजनीतिक तथा आर्थिक हित संबंधों वाले लोगों में राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बन गया। धीरे-धीरे सारी सत्ता राजा के हाथों में केन्द्रित हो गई और वह प्रबल हो गया। इन सब कारणों से यूरोप में राष्ट्रीय राजतंत्रों का उदय हुआ। इंग्लैण्ड, फ्रांस, स्पेन आदि राष्ट्रीय राज्य अस्तित्व में आए। इन राष्ट्रीय राज्यों का उदय आधुनिक युग की महत्वपूर्ण विशेषता है।

यूरोप का एशिया के साथ व्यापार

नवजागरण के साथ ही महान खोज – यात्राओं का युग भी आरंभ हुआ ।

भारत और यूरोप देशों के व्यापारिक संबंध बहुत पुराने थे। जल और थल दोनों ही मार्गों से भारत तथा यूरोप के मध्य व्यापार होता था ।

पहला मार्ग –

फारस की खाड़ी से जुड़ा समुद्री मार्ग था जिससे इराक, तुर्क (टर्की), वेनिस और जिनेवा (इटली) के साथ व्यापार होता था

दूसरा मार्ग-

मध्य एशिया से मिश्र होकर यूरोप के लिए जानेवाला थल मार्ग था ।

इस प्रकार यूरोप के सभी क्षेत्रों में भारत की वस्तुओं के वितरण के लिए वेनिस और जिनेवा प्रमुख व्यापारिक केन्द्र थे । इटली ने भारत की प्रमुख वस्तुओं के व्यापार पर अपना अधिकार जमाए रखने के लिए यूरोपीय शक्तियों की हिस्सेदारी समाप्त कर दी। वहीं 1453 ई. में कुस्तुनतुनियाँ (इस्तम्बोल) पर तुर्की ने अधिकार कर लिया।

नए मार्गों की खोज

इस्तम्बोल नगर यूरोप एवं भारत के व्यापारिक मार्ग का मुख्य द्वार था। यूरोपीय व्यापारियों को भारत पहुँचने के लिए एशिया के इसी मार्ग से होकर गुजरना पड़ता था, किन्तु इस्तम्बोल पर तुर्की कब्जे के बाद यूरोप से भारत को जोड़नेवाला यह एकमात्र व्यापारिक थल मार्ग बंद हो गया। अरब व्यापारी अब एशियाई देशों से मूल्यवान रत्न, उत्तम श्रेणी के सूती तथा रेशमी वस्त्र, शक्कर इत्यादि यूरोप ले जाते थे। यह माल इटली के जिनेवा, वेनिस मिलान इत्यादि शहरों में उतारा जाता था जहाँ से यूरोपीय व्यापारी उस माल को भारी चुंगी देकर खरीदते थे और यूरोप के विभिन्न बाजारों में ले जाकर बेचते थे। यूरोप में इन वस्तुओं की बड़ी माँग थी। लेकिन व्यापारी अब अरब के व्यापारियों को हटाकर, भारत से सीधा व्यापार करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने नए व्यापारिक मार्गों की खोज करना आरंभ कर दिया। इस कार्य में यूरोप के कई महत्वाकांक्षी शासकों एवं रानियों ने भी उन्हें पर्याप्त सहयोग प्रदान किया।

कुतुबनुमा (दिशाओं का ज्ञान करनेवाला यंत्र)

कुतुबनुमा (दिशाओं का ज्ञान करनेवाला यंत्र) के आविष्कार के बाद नाविकों ने कुतुबनुमा की सहायता से लम्बी-लम्बी समुद्री यात्राएँ कीं भारत की खोज में निकले इटली के नाविक कोलम्बस ने यूरोप से अमेरिका पहुँचने वाले समुद्री मार्ग की खोज की तथा पुर्तगाली नाविक वास्को डी गामा अपनी लम्बी जलयात्रा के दौरान अफ्रीका के दक्षिणी छोर (उत्तमांशा अंतरीप या Cape of good hope) से होते हुए 20 मई सन् 1498 ई. को भारत के पश्चिमी समुद्रतट पर कालीकट (केरल) बंदरगाह तक पहुँच गया।

व्यापारिक स्पर्धा –

इन नए भूभागों का पता लगते ही पुर्तगाली एवं अन्य यूरोपीय व्यापारी वहाँ आने लगे इस व्यापार से उन्हें भारी लाभ होने लगा। सोलहवीं शताब्दी में इंग्लैण्ड, फ्रांस तथा हॉलैंड भी इस स्पर्धा में उतर पड़े। उन्होंने भी अपनी सामुद्रिक शक्ति बढ़ाई और अपने नाविकों को लम्बे समुद्री अभियानों पर जाने के लिए प्रोत्साहित किया। फलस्वरूप यूरोपीय राष्ट्रों के बीच व्यापारिक स्पर्धा आरंभ हो गई।

व्यापारवाद का उदय-

सत्रहवीं शताब्दी में विदेशी व्यापार यूरोप की अर्थ व्यवस्था का प्रमुख घटक बन गया तथा व्यापार में वृद्धि करना शासकों की प्रमुख नीति बन गई। व्यापार वृद्धि के साथ-साथ यूरोप के व्यापारी वर्ग के पास अपार धन एकत्र होने लगा ।

 व्यापार द्वारा अपने राष्ट्र को अधिकाधिक संपन्न बनाना व अन्य राष्ट्रों को मात देना । शासकों ने इसके लिए अपने व्यापारियों को चुंगी में छूट सहित कई रियायतें दीं। इस आर्थिक नीति को "व्यापारवाद" कहा जाता है।

व्यापारिक कंपनी की स्थापना-

व्यापारियों को विदेशी व्यापार से अपार लाभ तो थे, मगर इसमें उनके लिए कठिनाइयाँ और खतरे भी कम नहीं थे। इन कठिनाइयों से बचने के लिए व्यापारी कारीगरों को काम देने तैयार माल इकट्ठा करने, माल का भंडारण करने जैसे अनेक कामों को सामूहिक रूप से करने में मदद देने लगे। इस प्रकार व्यापारिक कंपनियों की स्थापना आरंभ हुई। सत्रहवीं शताब्दी के आरंभ में व्यापार के लिए भारत आई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भी लंदन के कुछ व्यापारियों द्वारा मिलकर स्थापित की गई कंपनी थी । हालैंड, फ्रांस आदि यूरोपीय देशों में भी इस प्रकार की व्यापारिक कंपनियों की स्थापना हुई।

व्यापारिक कंपनियों की स्थापना

यूरोप में व्यापार वृद्धि के परिणाम

यूरोप के व्यापार में हुई। तीव्र वृद्धि के परिणाम स्वरूप वहाँ के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक जीवन में अनेक परिवर्तन हुए। जो निम्नलिखित है

आर्थिक प्रभाव –

यूरोपीय अर्थव्यवस्था में व्यापार तथा उद्योगों का महत्व बढ़ने लगा मध्यकाल में प्रचलित वस्तु विनिमय की पद्धति के स्थान पर सोने, चाँदी के सिक्के आर्थिक लेन-देन के माध्यम बन गए। अब लंदन, ब्रिस्टल जैसे अनेक नए व्यापारिक केन्द्रों का उदय हुआ। व्यापार के लिए पूँजी उपलब्ध करानेवाले बैंकों की संख्या में वृद्धि हुई । व्यापार में अधिकाधिक पूँजी का विनियोजन होने लगा। जहाज निर्माण जैसे व्यापार से जुड़े अनेक नवीन उद्योगों का प्रारंभ हुआ । व्यापार एवं उद्योगों में अपार वृद्धि के कारण लाभ की मात्रा में भी वृद्धि हुई। फलस्वरूप यूरोपीय राष्ट्र अधिक सम्पन्न और समृद्ध होने लगे ।

सामाजिक प्रभाव –

व्यापारियों से संबंधित अनेक व्यावसायों की वृद्धि के फलस्वरूप समाज में बैंकर, दलाल, लिपिक, हिसाब लिखनेवाले जैसे व्यावसायिकों का एक वर्ग अस्तित्व में आया, जिसे मध्यम वर्ग कहा जाता है। कुशल कारीगर और निर्माता भी इस समुदाय में जुड़ते गए। यह वर्ग रूढ़ियों और परंपराओं के बंधन में जकड़ा हुआ नहीं था। यह वर्ग नवीन बातों को जानने के लिए उत्सुक था। इस तरह मध्यम वर्ग आधुनिक सामाजिक-व्यवस्था की रीढ़ बन गया ।

राजनैतिक प्रभाव –

व्यापार वृद्धि का प्रभाव यूरोप के राजनैतिक क्षेत्र पर भी पड़ा। व्यापारी वर्ग ने अपने ही हित के लिए राजसत्ता का समर्थन किया तो व्यापारियों को देश की सम्पन्नता का आधार मानकर शासकों ने भी व्यापारियों को हर संभव सहायता प्रदान की। इससे देश में व्यापारी वर्ग को महत्व और प्रतिष्ठा प्राप्त होने लगी। व्यापारी वर्ग की बढ़ती प्रतिष्ठा के साथ ही यूरोप में सामंतवाद का पतन भी आरंभ हुआ और एक नई व्यवस्था, जिसे पूँजीवाद कहते हैं, अस्तित्व में आने लगी। यही आधुनिक युग की प्रमुख विशेषता थी। इसने पूँजीपति और मध्यमवर्ग के अलावा तीसरे और बहुसंख्यक श्रमिक वर्ग को जन्म दिया। पूँजीपति, उत्पादन हेतु आवश्यक कच्चे माल के तथा कारखानों में मशीनों से तैयार होनेवाली वस्तुओं के मालिक थे, जिनका मुख्य उद्देश्य था मुनाफा कमाना वस्तुओं की बिक्री पर भी उन्हीं का नियंत्रण था । श्रमिक लोग वस्तुओं का उत्पादन करते थे और पूँजीपतियों से वेतन प्राप्त करते थे

अब व्यापारिक समुदाय ने उत्पादन प्रणाली में सुधार किया, ताकि कम समय में ज्यादा वस्तुएँ तैयार की जा सकें। पहले कारीगर अपने सामान्य औजारों से अपने घरों में अपने परिवार के सदस्यों की मदद से काम करते थे। उन्हें आवश्यक कच्चा माल व्यापारियों से प्राप्त होता था । किन्तु यह धीमी घरेलू व्यवस्था बाजार की लगातार बढ़ती माँग की पूर्ति करने में समर्थ नहीं थी । अठारहवीं सदी की नवीन कारखाना व्यवस्था में कारखाने का मालिक पूँजी लगाकर बड़ी मात्रा में कच्चा माल खरीदता था। नई मशीनों की मदद से कारीगरों को काम पर लगाकर वस्तुएँ तैयार करता था और वही उन्हें बाजार में बेचता था

श्रमिक अब घरों में नहीं बल्कि निश्चित वेतन पर कारखानों में काम करते थे। सबसे पहले इंग्लैंड में इस नई व्यवस्था का उदय हुआ। मशीनों का उपयोग भी सबसे पहले इंग्लैंड में हुआ सूत कताई की मशीन, नए किस्म के करघों और भाप की शक्ति से चलनेवाले इंजन के आविष्कार के कारण इंग्लैंड में सूती कपड़ों के उत्पादन में खूब वृद्धि हुई । मानवीय श्रम अथवा पशुबल से चलनेवाली मशीनें अब भाप की शक्ति से चलनेवाली मशीनें बनीं।

भाप की शक्ति से चलनेवाले इंजन के आविष्कार

भाप की शक्ति से पानी के जहाजों को तेज गति से चलाना संभव हुआ और यातायात आसान हुआ।

विकास के इस नए दौर को, कारखानों में मशीनों की मदद से वस्तुओं के बेहिसाब उत्पादन को औद्योगिक क्रांति का नाम दिया गया।

आधुनिक यूरोप का उदय

18वीं सदी के उत्तरार्द्ध में इंग्लैंड से शुरू हुई इस औद्योगिक क्रांति ने अन्य यूरोपीय देशों की उत्पादन प्रणाली को भी प्रभावित किया। आगे चलकर बिजली तथा धमन-भट्टी जैसे आविष्कारों ने लोहे की ढलाई जैसे मुश्किल काम को आसान बना दिया। इस तरह नए-नए आविष्कारों और साधनों ने औद्योगिक क्रांति को अधिक प्रभावी बना दिया। तेज गति से कम समय में ज्यादा उत्पादन की क्षमता प्राप्त कर यूरोपीय देश अपने उद्योगों के लिए कच्चे माल की प्राप्ति के लिए दूसरे देशों की ओर उन्मुख हुए।

उपनिवेशों की स्थापना –

यूरोपीय लोगों ने सर्व प्रथम अमेरिका महाद्वीप के सम्पन्न प्रदेशों को हस्तगत किया और वहाँ अपने उपनिवेश स्थापित किए। स्पेन ने मुख्यतः दक्षिणी तथा मध्य अमेरिका में अपनी सत्ता स्थापित की। इंग्लैंड ने उत्तरी अमेरिका में अटलांटिक महासागरों के तटवर्ती भागों में अपने उपनिवेश बसाए दक्षिण पूर्व एशिया में इंडोनेशिया पर डचों ने भारत पर सर्व प्रथम पुर्तगालियों ने तदनंतर अँग्रेजों, डचों एवं फ्रांसीसियों ने कब्जा जमाया तथा आगे चलकर अफ्रीका और आस्ट्रेलिया में भी यूरोपवासियों ने अपने उपनिवेश स्थापित किए। अपने उद्योगों के लिए अधिकाधिक कच्चा माल प्राप्त करने के लिए उन्होंने उपनिवेशों पर मनमाने प्रतिबंध लगाए। उनके कच्चे माल से अपने उद्योगों को चलाया और अपने तैयार माल को भी वापस उन्हीं देशों में ऊंची कीमतों पर बेचा। इस प्रकार उन्होंने उपनिवेशों के मूल निवासियों का दमन करके उनका अत्यधिक आर्थिक शोषण किया।

1850 में यूरोप में औद्योगिक क्षेत्र का दृश्य
उपनिवेशों से संबंधित इस नीति को "उपनिवेशवाद" कहा जाता है।

यह उपनिवेशवाद यूरोपीय राष्ट्रों की व्यापार वृद्धि और व्यापारियों की बढ़ती धन-लिप्सा का ही परिणाम था । उपनिवेशवाद के दो बड़े परिणाम हुए –

  1. अधिकाधिक उपनिवेशों को हथियाने के लिए यूरोपीय राष्ट्रों में संघर्ष होने लगे, जो अंततः प्रथम विश्व युद्ध में बदल गए।
  2. अपने अधीनस्थ उपनिवेशों पर अधिकार जमाए रखने के लिए यूरोपीय शक्तियों ने वहाँ की जनता को अशिक्षित और पिछड़ा हुआ बनाए रखा, जिससे इन औपनिवेशिक राष्ट्रों के समग्र संसाधनों का न सिर्फ भरपूर शोषण हुआ, बल्कि वे अशिक्षा और पिछड़ेपन के गहरे गर्त में भी डूबते चले गए।

याद रखने योग्य महत्वपूर्ण बातें

  • विश्व इतिहास को तीन कालों में बाँटा गया है-प्राचीन काल मध्यकाल और आधुनिक काल।
  • आधुनिक काल का अर्थ-नवीन विचार धाराओं, प्रवृतियों और क्रिया-कलापों से है।
  • आधुनिक काल की विशेषताएँ (1) तर्क एवं बुद्धिवाद (2) मानववाद (3) नवीन अन्वेषण।
  • यूरोप में आधुनिक काल का उदय 16 वीं व 17 वीं शताब्दी में हुआ। इतिहास सम्बन्धी जानकारी देने वाले साधन इतिहास के स्रोत कहलाते हैं।
  • लिखित इतिहास, मौखिक इतिहास, संचार साधन व प्राचीन धरोहर इतिहास के प्रमुख स्रोत हैं।
  • 15 वीं शताब्दी में यूरोप में पुनर्जागरण अर्थात् वैचारिक क्रांति का आरंभ हुआ।
  • फॉपरनिकस और गैलिलियो जैसे वैज्ञानिक इसी युग में हुए थे। ईसाई धर्म ग्रंथ बाइबिल’ लॅटिन भाषा में लिखा गया था।
  • धार्मिक भ्रष्टाचार के विरुद्ध मध्यकाल में धर्म सुधार आन्दोलन चलाया गया था। कोलम्बस ने उत्तरी अमेरिका और पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा ने भारत और अफ्रीका के अंतरीपों की खोज की।
  • 17 वीं शताब्दी में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ने जन्म लिया।
  • व्यापारिक सफलताओं ने यूरोप के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर खूब प्रभाव डाला। समाज शोषक व शोषित वर्ग में बँट गया।
  • मशीनों का उपयोग सबसे पहले इंग्लैंड में हुआ।
  • इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रांति की शुरुआत 18वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में हुई।
  • यूरोप के लोगों ने सर्वप्रथम अमेरिका के सम्पन्न राज्यों पर अधिकार जमाकर, उपनिवेशवाद का सूत्रपात किया।
  • इंग्लैण्ड ने उत्तरी अमेरिका, डचों ने इण्डोनेशिया पर उपनिवेश की स्थापना की।
  • भारत पर सर्वप्रथम पुर्तगालियों ने फिर क्रमश: अंग्रेजों डचों, फ्रांसीसियों और अंत में अंग्रेजों ने उपनिवेश बनाया।
  • 17 वीं शताब्दी में ईस्ट इण्डिया कम्पनी भारत आई।
  • व्यापारिक उन्नति के फलस्वरूप यूरोप में सामंतवाद का अंत हुआ। ★ उत्पादन के साधनों पर जहाँ पूँजीपतियों का आधिपत्य होता है, उसे पूँजीवाद या पूँजीवादी व्यवस्था कहते हैं।

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1. उचित संबंध जोड़िए-

1. कॉपरनिकस(क) पोप के वर्चस्व को मानने से इंकार
2. कोलम्बस(ख) खगोल वैज्ञानिक
3. मार्टिन लूथर(ग) धर्मव्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचारों का विरोध
4. हेनरी अष्टम(घ) यूरोप से अमेरिका तक के समुद्री मार्ग की खोज ।

उत्तर- 1. (ख), 2. (घ), 3. (ग), 4. (क)।

प्रश्न 2. प्रश्नों के उत्तर दीजिए-

(1) छपाई कला के आविष्कार से क्या-क्या लाभ हुए?

उत्तर- छपाई कला के आविष्कार से पुस्तकों की संख्या बढ़ी, कीमतें घटी, इसलिए ज्ञान का प्रसार तेजी से हुआ।

(2) अरब व्यापारी क्या-क्या वस्तुएँ यूरोप के व्यापारियों को बेचते थे ?

उत्तर – अरब व्यापारी यूरोप के व्यापारियों को मूल्यवान रत्न, उत्तम कोटि के सूती तथा रेशमी वस्त्र तथा शक्कर आदि बेचा करते थे।

(3) मार्टिन लूथर के अनुयायियों को प्रोटेस्टेंट कहा जाता है, क्यों ?

उत्तर- मार्टिन लूथर नामक जर्मन धर्मगुरु ने धार्मिक संस्थाओं के दुराचारों की निन्दा करते हुए एक खुला वक्तव्य जारी किया था जिसमें उसने जनता के लिए कहा कि- “आप लोगों को धर्म गुरुओं के कथनों को ही धर्म न मानकर स्वयं बाइबिल पढ़ना चाहिए और धर्म के तत्वों को समझना चाहिए।” उन्होंने ईसाई धर्म के गुरु के प्रमुख पोप की निरंकुश सत्ता को चुनौती दी और धर्म व्यवस्था में प्रचलित दोषों का विरोध (प्रोटेस्ट) किया। इसलिए उनके अनुयायी प्रोटेस्टेंट कहलाए।

(4) यूरोपीय व्यापारियों ने व्यापारिक कम्पनियों की स्थापना की, क्यों ?

उत्तर- यूरोपीय व्यापारी बहुत परिश्रमी थे। उन्हें अपने माल को बेचने की लिए बड़े बाजारों की आवश्यकता थी जब कई व्यापारी एक साथ व्यापार करेंगे को अधिक लाभ और सुरक्षा होगी। अतः उन्होंने कई कम्पनियों की स्थापना की।

(5) मध्यम वर्ग आधुनिक सामाजिक व्यवस्था की रीढ़ बन गया, क्यों ?

उत्तर-व्यापारिक प्रतिस्पर्धा के फलस्वरूप समाज में कई नये वर्गों का जन्म हुआ, जिनमें बैंकर, दलाल, लिपिक आदि। प्रमुख थे। इन्हें ही मध्यम वर्ग कहा जाता था। कुशल कारीगर और निर्माता भी इसी वर्ग में आते थे। यह वर्ग रूढ़ियों से दूर और नवीन परिवर्तनों पर आस्था रखता था। मध्यम वर्ग की सामाजिक व आर्थिक महत्व के कारण वे सामाजिक व्यवस्था के रीढ़ बन गए।

(6)पुनर्जागरण का स्वरूप स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – पुनर्जागरण” का शाब्दिक अर्थ वैचारिक क्रांति से है। यूरोप में पुनर्जागरण 19वीं शताब्दी में प्रारंभ हुआ। इस काल में प्राचीन ग्रंथों का स्थानीय भाषाओं में नये ढंग से अनुवाद प्रारंभ हुआ। छपाई मशीनों के आविष्कार ने इस क्रांति को अपने शिखर पर पहुँचा दिया। अत्यधिक मात्रा में पुस्तकें छपने लगी और दाम भी सस्ते हो गए, फलस्वरूप ज्ञान का प्रसार तेजी से हुआ। प्राचीन ज्ञान और नवीन विचारों के अध्ययन ने जनमानस को नई दृष्टि प्रदान किया। साहित्य, चित्रकला, विज्ञान आदि सभी विधाओं को इस दृष्टिकोण ने प्रभावित किया। अब कलाकार अपनी कलाकृतियों में देवताओं और देवदूतों के स्थान पर मनुष्य को भावों व प्राकृतिक सौन्दर्य का चित्रण करने लगे थे।

(7) औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप कौन-कौन से तीन वर्ग प्रमुखता से अस्तित्व में आए ? इनकी स्थिति पर संक्षेप में प्रकाश डालिए।

उत्तर- औद्योगिक क्रांति के फलस्वरूप निम्नलिखित तीन वर्ग प्रमुखता से अस्तित्व में आए

1. पूँजीपति वर्ग- यह वर्ग समाज का सबसे सम्पन्न था। उत्पादन के सभी साधनों पर इनका एकाधिकार था। इनका मुख्य उद्देश्य अधिकतम लाभ कमाना था। वस्तुओं को ब्रिकों पर भी इन्हीं का नियंत्रण था।
2. मध्यम वर्ग- व्यवसायों में वृद्धि के फलस्वरूप समाज में बैंकर, दलाल, लिपिक हिसाब रखने वाले जैसे व्यावसायिकों का एक नया वर्ग अस्तित्व में आया, जिसे मध्यम वर्ग कहा जाता है। कुशल कारीगर और निर्माता भी इस समुदाय से जुड़ते गए। यह वर्ग रूढ़ियों और परम्पराओं के बंधन में जकड़ा हुआ नहीं था।
3. अमिक वर्ग- यह वर्ग समाज का सबसे निम्न स्तर के लोगों का था। इनकी आर्थिक स्थिति अति शोचनीय थी और अशिक्षा, अंधविश्वासों से जकड़े हुए थे। श्रमिक, खेतिहर मजदूर आदि इस वर्ग में आते हैं।

(8)सामंतवाद का पतन किस प्रकार हुआ ?

उत्तर-व्यापार में आए तेजी का यूरोप की राजनीति में भी गहरा प्रभाव पड़ा व्यापारियों ने अपने हितों की सुरक्षा के लिए सरकार का समर्थन किया, वहीं सरकार ने भी व्यापारियों को आगे बढ़ाने के लिए तथा उनकी जान माल की सुरक्षा के लिए समुचित उपाय किया। इससे देश में व्यापारियों का सम्मान और महत्व बढ़ने लगा। व्यापारियों की लगातार बढ़ती प्रतिष्ठा के साथ ही सामन्तवाद का पतन शुरू हुआ और अंत में एक नई व्यवस्था ने जन्म लिया, जिसे पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के नाम से जाना जाता है।

(9) व्यापार में वृद्धि का यूरोप पर क्या प्रभाव पड़ा ?

उत्तर- व्यापारिक उन्नति का यूरोप के आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक जीवन पर व्यापक प्रभाव पड़ा। यूरोप विश्व का सबसे बड़ा व्यापारिक शक्ति के रूप में उभरा और उसको आर्थिक स्थिति सुदृढ़ हो गई। समाज में पूँजीपति, मध्यम और श्रमिक तीन वर्ग बन गए और वर्ग संघर्ष बढ़ गया। व्यापारियों का राजनीतिक महत्व बढ़ गया फलस्वरूप सामंतवाद का पतन हो गया। श्रमिकों की स्थिति में भी बदलाव आया। अब लोग वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाने लगे तथा धीरे-धीरे समाज रूढ़िवादिता व अंधविश्वासों से ऊपर उठने लगे।

आधुनिक यूरोप का उदय: कक्षा 8 सामाजिक विज्ञान के लिए 20 MCQs

अध्याय 1: आधुनिक यूरोप का उदय

  1. विश्व इतिहास को कितने कालों में विभाजित किया गया है?
    A) दो
    B) तीन
    C) चार
    D) पाँच
    उत्तर: B) तीन
  2. आधुनिक काल की प्रमुख विशेषता क्या है?
    A) धर्म आधारित समाज
    B) तर्क एवं बुद्धिवाद
    C) सामंती व्यवस्था
    D) उपनिवेशवाद का अंत
    उत्तर: B) तर्क एवं बुद्धिवाद
  3. यूरोप में आधुनिक काल का आरंभ कब हुआ?
    A) 14वीं शताब्दी
    B) 15वीं और 16वीं शताब्दी
    C) 17वीं शताब्दी
    D) 18वीं शताब्दी
    उत्तर: B) 15वीं और 16वीं शताब्दी
  4. पुनर्जागरण का मुख्य उद्देश्य क्या था?
    A) धार्मिक सुधार
    B) बुद्धिनिष्ठा और भौतिक जीवन का महत्व
    C) औद्योगिक क्रांति
    D) व्यापार वृद्धि
    उत्तर: B) बुद्धिनिष्ठा और भौतिक जीवन का महत्व
  5. छपाई की मशीन के आविष्कार से क्या प्रभाव पड़ा?
    A) व्यापार बढ़ा
    B) ज्ञान का तीव्र प्रसार हुआ
    C) कृषि में सुधार हुआ
    D) धर्मगुरुओं की सत्ता बढ़ी
    उत्तर: B) ज्ञान का तीव्र प्रसार हुआ
  6. ‘कोपर्निकस’ ने कौन-सा सिद्धांत प्रस्तुत किया?
    A) पृथ्वी स्थिर है
    B) सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाता है
    C) पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है
    D) चंद्रमा सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाता है
    उत्तर: C) पृथ्वी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती है
  7. धर्म सुधार आंदोलन का मुख्य कारण क्या था?
    A) चर्च की भ्रष्टाचार प्रवृत्ति
    B) व्यापारिक प्रतिस्पर्धा
    C) विज्ञान का विकास
    D) राजनीतिक अस्थिरता
    उत्तर: A) चर्च की भ्रष्टाचार प्रवृत्ति
  8. मार्टिन लूथर ने किसके विरुद्ध आवाज उठाई?
    A) ईसाई धर्म
    B) बाइबिल
    C) पोप और चर्च की निरंकुशता
    D) विज्ञान के सिद्धांत
    उत्तर: C) पोप और चर्च की निरंकुशता
  9. प्रोटेस्टेंट आंदोलन का आरंभ किसने किया?
    A) गैलिलियो
    B) कोपर्निकस
    C) मार्टिन लूथर
    D) वास्को डी गामा
    उत्तर: C) मार्टिन लूथर
  10. राष्ट्रीय राजतंत्र के उदय के समय किसका पतन हुआ?
    A) पोप की सत्ता
    B) सामंतवाद
    C) औद्योगिक क्रांति
    D) व्यापारवाद
    उत्तर: B) सामंतवाद
  11. वास्को डी गामा भारत कब पहुँचा?
    A) 1498
    B) 1492
    C) 1500
    D) 1453
    उत्तर: A) 1498
  12. कुतुबनुमा का उपयोग किसके लिए किया जाता था?
    A) दिशा ज्ञात करने
    B) समय मापन
    C) वजन मापने
    D) भौगोलिक नक्शे बनाने
    उत्तर: A) दिशा ज्ञात करने
  13. औद्योगिक क्रांति का आरंभ कहाँ हुआ?
    A) फ्रांस
    B) इंग्लैंड
    C) जर्मनी
    D) स्पेन
    उत्तर: B) इंग्लैंड
  14. व्यापारवाद का अर्थ क्या है?
    A) व्यापार पर नियंत्रण
    B) व्यापार द्वारा राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाना
    C) व्यापारिक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना
    D) उपनिवेशों का विकास
    उत्तर: B) व्यापार द्वारा राष्ट्र की संपन्नता बढ़ाना
  15. प्रथम विश्व युद्ध का एक मुख्य कारण क्या था?
    A) औद्योगिक क्रांति
    B) उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा
    C) पुनर्जागरण
    D) धर्म सुधार आंदोलन
    उत्तर: B) उपनिवेशों की प्रतिस्पर्धा
  16. मध्यम वर्ग किस काल की देन है?
    A) प्राचीन काल
    B) मध्यकाल
    C) आधुनिक काल
    D) औपनिवेशिक काल
    उत्तर: C) आधुनिक काल
  17. ‘उपनिवेशवाद’ का उद्देश्य क्या था?
    A) विज्ञान का विकास
    B) नए व्यापारिक मार्ग खोजना
    C) कच्चा माल प्राप्त करना और तैयार माल बेचना
    D) धार्मिक सुधार करना
    उत्तर: C) कच्चा माल प्राप्त करना और तैयार माल बेचना
  18. औद्योगिक क्रांति का मुख्य प्रभाव क्या था?
    A) कृषि का विकास
    B) कारखानों में वस्त्र उत्पादन
    C) शासकों की शक्ति में वृद्धि
    D) व्यापारियों की संख्या में कमी
    उत्तर: B) कारखानों में वस्त्र उत्पादन
  19. ईस्ट इंडिया कंपनी किसके द्वारा स्थापित की गई?
    A) पुर्तगाल
    B) इंग्लैंड
    C) फ्रांस
    D) स्पेन
    उत्तर: B) इंग्लैंड
  20. यूरोप में व्यापारिक क्रांति का मुख्य कारण क्या था?
    A) पुनर्जागरण
    B) नए व्यापारिक मार्गों की खोज
    C) धार्मिक आंदोलन
    D) औद्योगिक क्रांति
    उत्तर: B) नए व्यापारिक मार्गों की खोज

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