महाकवि कालिदासकृत महाकाव्य ‘रघुवंशम्’ के प्रथम सर्ग से यह पाठ लिया गया है। इस काव्य में राजा दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक इक्ष्वाकुवंशीय राजाओं का वर्णन किया गया है।
श्लोक 1
वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम्।
आसीन्महीक्षितामाच्यः प्रणवश्छन्दसामिव॥
हिन्दी अर्थ:
वैवस्वत मनु नाम के एक राजा थे, जो विद्वानों द्वारा अत्यंत सम्माननीय थे। वे पृथ्वी के राजाओं में श्रेष्ठ थे, जैसे वेदों में ‘ॐ’ (प्रणव) श्रेष्ठ माना जाता है।
श्लोक 2
तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः।
विलीप इति राजेन्दुरिन्दुः क्षीरनिधाविव॥
हिन्दी अर्थ:
उसी वंश में शुद्ध चरित्र वाली माता से विलीप नाम का राजा उत्पन्न हुआ, जो स्वयं अत्यंत पवित्र था। वह राजाओं में ऐसा था जैसे क्षीरसागर में चंद्रमा।
श्लोक 3
आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः।
आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः॥
हिन्दी अर्थ:
उसकी बुद्धि उसके रूप के अनुरूप थी, उसके शास्त्र बुद्धि के अनुरूप थे, उसके कार्य शास्त्रों के अनुसार प्रारंभ होते थे और उनका परिणाम भी श्रेष्ठ होता था।
श्लोक 4
प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्।
सहस्रगुणमुत्सष्टुमावर्तते हि रसं रविः॥
हिन्दी अर्थ:
वह राजा प्रजा के कल्याण के लिए ही उनसे कर (बलि) लेता था, क्योंकि जैसे सूर्य जल को लेकर उसे हजार गुना बढ़ाकर वर्षा करता है।
श्लोक 5
प्रजानां विनयाधानाद् रक्षणाद् भरणादपि।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः॥
हिन्दी अर्थ:
प्रजा को अनुशासन सिखाने, उनकी रक्षा करने और पालन करने के कारण वह उनका सच्चा पिता था; जबकि अन्य पिता तो केवल जन्म देने वाले होते हैं।
श्लोक 6
द्वेष्योपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम्।
त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता॥
हिन्दी अर्थ:
जो शिष्ट व्यक्ति था, वह अप्रिय होने पर भी स्वीकार्य था, जैसे रोगी के लिए कड़वी दवा। परंतु दुष्ट व्यक्ति प्रिय होने पर भी त्याज्य था, जैसे साँप के काटे हुए अंगुली।
श्लोक 7
तस्य दाक्षिण्यरूढेन नाम्ना मगधवंशजा।
पत्नी सुदक्षिणेत्यासीद्वधूरस्येव दक्षिणा॥
हिन्दी अर्थ:
उसकी पत्नी मगध वंश की थी और उसका नाम सुदक्षिणा था। वह अपने नाम के अनुरूप अत्यंत उदार और सुशील थी।
श्लोक 8
अथाभ्यर्च्य विधातारं प्रयतौ पुत्रकाम्यया।
तौ दम्पती वशिष्ठस्य गुरोर्जग्मतुराश्रमम्॥
हिन्दी अर्थ:
पुत्र की इच्छा से, विधाता (ईश्वर) की पूजा करके वे दोनों पति-पत्नी गुरु वशिष्ठ के आश्रम गए।
श्लोक 9
हैयङ्रवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान्।
नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्यानां मार्गशाखिनाम्॥
हिन्दी अर्थ:
वे दोनों घी लेकर मार्ग में मिले हुए वनवासियों और चरवाहों से जंगल के रास्तों और शाखाओं के नाम पूछते हुए आगे बढ़े।
