इस अध्याय में पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न जीवों की विविधता तथा उनके वर्गीकरण का अध्ययन किया जाता है।
1.1 जैव विविधता (Biodiversity)
हमारे चारों ओर विभिन्न प्रकार के जीव-जंतु और पौधे दिखाई देते हैं। एक ही समूह के सदस्यों में अधिक समानताएँ होती हैं तथा दूसरे समूहों के सदस्यों से अंतर होता है।
- प्रजाति (Species): जिन सदस्यों में अधिकतम समानताएँ होती हैं, उनके समूह को प्रजाति कहते हैं। जैसे— मनुष्य (Homo sapiens) में विकसित मस्तिष्क, कम शरीर के बाल आदि समान लक्षण पाए जाते हैं।
- विविधताएँ (Variations): एक ही प्रजाति के सदस्यों में समानताओं के साथ-साथ कुछ भिन्नताएँ भी होती हैं। जैसे— सभी मनुष्यों के अंगूठे के निशान अलग-अलग होते हैं।
- जैव विविधता: किसी विशेष क्षेत्र में पाए जाने वाले जीवों की विविधता उस क्षेत्र की जैव विविधता कहलाती है।
1.2 समूहीकरण एवं वर्गीकरण (Grouping and Classification)
- समूहीकरण (Grouping): किसी विशेषता के आधार पर वस्तुओं को समूहों में रखने की प्रक्रिया।
- वर्गीकरण (Classification): समूहीकरण की एक विशेष विधि जिसमें एक विशेषता की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर समूह बनाए जाते हैं, और एक समूह के सदस्य दूसरे समूह में नहीं आते।
उदाहरण: लकड़ी की वस्तुएँ, काँच की वस्तुएँ, खेलने की वस्तुएँ आदि।
1.3 वर्गीकरण के पूर्व प्रयास
| वैज्ञानिक | योगदान |
|---|---|
| अरस्तू (Aristotle) | आवास के आधार पर जीवों को स्थल और जल में बाँटा। |
| जॉन रे (John Ray, 1686) | पौधों का बाह्य संरचना के आधार पर वर्गीकरण किया। |
| लीनियस (Linnaeus, 1735) | ‘Systemae Naturae’ में द्विजगत वर्गीकरण (पादप जगत एवं प्राणी जगत) प्रस्तुत किया। इन्होंने पदानुक्रम (Hierarchy) की शुरुआत की। |
लीनियस का पदानुक्रम (मनुष्य के लिए):
| स्तर | नाम |
|---|---|
| जगत (Kingdom) | Animalia |
| संघ (Phylum) | Chordata |
| वर्ग (Class) | Mammalia |
| गण (Order) | Primate |
| कुल (Family) | Hominidae |
| वंश (Genus) | Homo |
| प्रजाति (Species) | sapiens |
लीनियस की सीमाएँ:
- कोशिका की आंतरिक संरचना का अध्ययन नहीं कर पाए।
- यूग्लीना जैसे जीव दोनों (पौधे एवं जंतु) के लक्षण दर्शाते हैं।
1.4 व्हिटेकर का वर्गीकरण (Whittaker’s Five Kingdom Classification)
व्हिटेकर ने जीवों को पाँच जगतों में विभाजित किया:
| जगत | मुख्य लक्षण | उदाहरण |
|---|---|---|
| मोनेरा (Monera) | प्रोकैरियोटिक, एककोशिकीय, कोशिका भित्ति पेप्टिडोग्लाइकेन की बनी | जीवाणु, सायनोबैक्टीरिया |
| प्रोटिस्टा (Protista) | यूकैरियोटिक, एककोशिकीय, स्वपोषी/विषमपोषी | अमीबा, पैरामीशियम, यूग्लीना |
| कवक (Fungi) | यूकैरियोटिक, विषमपोषी, कोशिका में क्लोरोप्लास्ट अनुपस्थित | म्यूकर, यीस्ट, मशरूम, राइजोपस |
| पादप (Plantae) | बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक, स्वपोषी, सेल्यूलोजिक कोशिका भित्ति | स्पाइरोगाइरा, फर्न, नीम, गेहूँ |
| प्राणी (Animalia) | बहुकोशिकीय, यूकैरियोटिक, विषमपोषी, कोशिका भित्ति अनुपस्थित | शेर, मछली, मनुष्य, हाइड्रा |
पाँच जगत वर्गीकरण के आधार:
- केंद्रक झिल्ली की उपस्थिति/अनुपस्थिति (प्रोकैरियोटिक/यूकैरियोटिक)
- शरीर का संगठन (एककोशिकीय/बहुकोशिकीय)
- पोषण की विधि (स्वपोषी/विषमपोषी)
1.5 द्विनाम पद्धति (Binomial Nomenclature)
लीनियस ने जीवों के वैज्ञानिक नामकरण की पद्धति प्रस्तुत की, जिसमें प्रत्येक जीव का नाम दो शब्दों में होता है:
- पहला शब्द — वंश (Genus), पहला अक्षर बड़ा
- दूसरा शब्द — प्रजाति (Species), सभी अक्षर छोटे
- दोनों शब्दों को तिरछे अक्षरों में या रेखांकित किया जाता है।
उदाहरण:
| जीव | वैज्ञानिक नाम |
|---|---|
| मेंढक | Rana tigrina |
| शेर | Panthera leo |
| गौरैया | Passer domesticus |
| मनुष्य | Homo sapiens |
1.6 प्राणी जगत का वर्गीकरण
प्राणी जगत को मुख्यतः दो भागों में बाँटा गया है:
- कशेरुकी (Vertebrata) — रीढ़ की हड्डी वाले
- स्तनधारी (Mammalia) — बाल, बाह्य कान
- पक्षी (Aves) — पंख
- सरीसृप (Reptilia) — शुष्क शल्कीय त्वचा
- उभयचर (Amphibia) — नम त्वचा
- मछली (Pisces) — शल्क, गिल्स
- अकशेरुकी (Invertebrata) — रीढ़ रहित
- केंचुआ, जोंक, मच्छर, घोंघा, टेपवर्म आदि।
1.7 वर्गीकरण की आवश्यकता
- जीवों का सरल, स्पष्ट एवं व्यवस्थित अध्ययन।
- विभिन्न जीवों में अंतर करना।
- जैव विविधता को समझना।
- विकासात्मक संबंधों को समझना।
नोट: वर्गीकरण का आधार और प्रणाली समय के साथ बदलती रहती है क्योंकि नए जीवों की खोज होती रहती है और कुछ प्रजातियाँ विलुप्त हो जाती हैं।
