गज़ल
कहाँ तो तय या चिरागों हरेक घर के लिए, कहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।
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यहाँ दरख्तों के साये में धूप लगती है, चलो यहाँ से चलें और उम्र भर के लिए। न हो कमीज तो पाँवों से पेट ढँक लैगे, ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफर के लिए।
खुदा नहीं, न सही, आदमी का ख्वाब सही, कोई हसीन नज़ारा तो है नज़र के लिए।
वे मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता, मैं बेकरार हूँ आवाज में असर के लिए।
तेरा निज़ाम हैं सिल दे जुबान शायर की, ये एहतियात जरूरी है इस बहर के लिए।
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150/ आरोह
जिएँ तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले, मरे तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए।

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