सूक्तयः पाठ 19 कक्षा 8 संस्कृत
1. श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्
संस्कृत: श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।
हिन्दी अर्थ: श्रद्धावान् व्यक्ति ज्ञान प्राप्त करता है।
भावार्थ: जिसमें श्रद्धा (आस्था) होती है, वही ज्ञान प्राप्त कर सकता है। बिना श्रद्धा के ज्ञान स्थिर नहीं होता। गुरु, शास्त्र और साधना के प्रति श्रद्धा आवश्यक है।
शब्दार्थ:
- श्रद्धावान् – श्रद्धा रखने वाला
- लभते – प्राप्त करता है
- ज्ञानम् – ज्ञान
2. योगः कर्मसु कौशलम्
संस्कृत: योगः कर्मसु कौशलम्।
हिन्दी अर्थ: कर्म में कुशलता ही योग है।
भावार्थ: किसी भी कार्य को कुशलता एवं निपुणता से करना ही सच्चा योग है। केवल कर्म करना नहीं, बल्कि दक्षता के साथ करना योग है। यह गीता का प्रसिद्ध सूत्र है।
शब्दार्थ:
- योगः – योग
- कर्मसु – कर्मों में
- कौशलम् – कुशलता, निपुणता
3. वीरभोग्या वसुन्धरा
संस्कृत: वीरभोग्या वसुन्धरा।
हिन्दी अर्थ: पृथ्वी वीरों के द्वारा भोगी जाती है।
भावार्थ: पृथ्वी का सुख केवल वीर, पराक्रमी और साहसी व्यक्ति ही भोग सकते हैं। कायर और निर्बल नहीं। अतः मनुष्य को वीरता एवं साहस का विकास करना चाहिए।
शब्दार्थ:
- वीरभोग्या – वीरों द्वारा भोगने योग्य
- वसुन्धरा – पृथ्वी
4. महाजनो येन गतः स पन्थाः
संस्कृत: महाजनो येन गतः स पन्थाः।
हिन्दी अर्थ: श्रेष्ठ लोग जिस मार्ग से गए हैं, वही मार्ग है।
भावार्थ: महापुरुषों, संतों और आदर्श व्यक्तियों के द्वारा अपनाया गया मार्ग ही हमारे लिए अनुकरणीय है। उनके पदचिह्नों पर चलना ही श्रेयस्कर है।
शब्दार्थ:
- महाजनः – महापुरुष, सज्जन
- येन – जिससे
- गतः – गया
- सः – वह
- पन्थाः – मार्ग
5. यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः
संस्कृत: यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः।
हिन्दी अर्थ: जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते हैं।
भावार्थ: जिस समाज या परिवार में स्त्रियों का सम्मान होता है, वहाँ देवता निवास करते हैं। स्त्री का सम्मान समृद्धि और शांति का आधार है।
शब्दार्थ:
- यत्र – जहाँ
- नार्यः – स्त्रियाँ
- पूज्यन्ते – पूजा होती है
- रमन्ते – निवास करते हैं
- तत्र – वहाँ
- देवताः – देवता
6. सत्यमेव जयते नानृतम्
संस्कृत: सत्यमेव जयते नानृतम्।
हिन्दी अर्थ: सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं।
भावार्थ: सत्य सदा विजयी होता है। असत्य का अंत निश्चित है। यह भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य भी है।
शब्दार्थ:
- सत्यमेव – सत्य ही
- जयते – जीतता है
- न – नहीं
- अनृतम् – असत्य
7. परोपकाराय सतां विभूतयः
संस्कृत: परोपकाराय सतां विभूतयः।
हिन्दी अर्थ: सज्जनों की सम्पत्ति भलाई के लिए होती है।
भावार्थ: सज्जन लोग अपनी सम्पत्ति, धन, विद्या आदि का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करते हैं। यही सच्चा परोपकार है।
शब्दार्थ:
- परोपकाराय – परोपकार के लिए
- सताम् – सज्जनों की
- विभूतयः – सम्पत्तियाँ
8. दूरतः पर्वताः रम्याः
संस्कृत: दूरतः पर्वताः रम्याः।
हिन्दी अर्थ: दूर से पर्वत सुन्दर लगते हैं।
भावार्थ: दूर से देखने पर हर वस्तु सुंदर लगती है, किन्तु निकट जाने पर उसकी वास्तविकता ज्ञात होती है। अतः किसी भी वस्तु या व्यक्ति को दूर से नहीं, निकट से देखना चाहिए। यह “दूर के ढोल सुहावने” के समान है।
शब्दार्थ:
- दूरतः – दूर से
- पर्वताः – पर्वत
- रम्याः – सुन्दर
9. धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः
संस्कृत: धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः।
हिन्दी अर्थ: धर्म से हीन (मनुष्य) पशुओं के समान हैं।
भावार्थ: जिस मनुष्य में धर्म, करुणा, नैतिकता नहीं, वह पशु के समान है। मनुष्य का वास्तविक जीवन धर्म के आचरण से ही सार्थक होता है।
शब्दार्थ:
- धर्मेण – धर्म से
- हीनाः – हीन
- पशुभिः – पशुओं के
- समानाः – समान
10. लोभः पापस्य कारणम्
संस्कृत: लोभः पापस्य कारणम्।
हिन्दी अर्थ: लोभ पाप का कारण है।
भावार्थ: लालच ही पाप का मूल कारण है। लोभ से मनुष्य अनैतिक कार्य करता है। अतः लोभ का त्याग करना चाहिए।
शब्दार्थ:
- लोभः – लालच
- पापस्य – पाप का
- कारणम् – कारण
