पृथ्वीराज रासो का परिचय

पृथ्वीराज रासो ढाई हजार पृष्ठों का बहुत बड़ा ग्रंथ है जिसमें ६९ समय (सर्ग या अध्याय) हैं। प्राचीन समय में प्रचलित प्रायः सभी छंदों का इसमें व्यवहार हुआ है। मुख्य छन्द हैं-कवित्त (छप्पय), दूहा(दोहा), तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या ।

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पृथ्वीराज रासो हिंदी साहित्य के आदिकाल की सर्वाधिक चर्चित और विवादास्पद रचना है। इसे दिल्ली के अंतिम हिंदू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के जीवन पर आधारित रासक परंपरा का प्रथम हिंदी महाकाव्य माना जाता है। हालाँकि, इसकी ऐतिहासिकता, रचनाकाल और प्रामाणिकता को लेकर विद्वानों में गहरा मतभेद है।


रासो का परिचय और स्वरूप

  • रचनाकार: परंपरा से चंदवरदायी (चंद कवि/पृथ्वीभट्ट) को माना जाता है, जो पृथ्वीराज के अभिन्न मित्र और दरबारी कवि थे।
  • परंपरा: यह रासक परंपरा का काव्य है, जो नृत्य (रास) और गान से विकसित हुआ। इसमें कथा काव्य, चरित काव्य, और आख्यायिका के लक्षण मिलते हैं।
  • काव्य रूप: इसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य होने का गौरव प्राप्त है, हालांकि इसमें महाकाव्य के सभी शास्त्रीय लक्षण घटित नहीं होते। डॉ. नित्यानंद तिवारी इसे ‘पंवारा’ या रोमांचक आख्यान मानते हैं।
  • विभिन्न पाठ: रासो के पाँच प्रमुख पाठ (संस्करण) प्राप्त हैं: बृहत् (लगभग 11,000 रूपक), मध्यम (लगभग 3,500 रूपक), लघु (लगभग 1200 रूपक), और लघुतम (400-550 रूपक)।
  • विकास क्रम: विद्वानों के अनुसार, इन रूपों का विकास क्रम लघुतम $\rightarrow$ लघु $\rightarrow$ मध्यम $\rightarrow$ बृहत्‌ है।

रासो की कथावस्तु (संक्षेप)

‘पृथ्वीराज रासो’ की कथा संयोगिता हरण और शहाबुद्दीन गोरी से युद्ध के इर्द-गिर्द घूमती है:

  1. संयोगिता स्वयंवर: कन्नौज के राजा जयचंद द्वारा राजसूय यज्ञ और संयोगिता का स्वयंवर आयोजित करना, जिसमें पृथ्वीराज को आमंत्रित न करके, द्वार पर उनकी प्रतिमा (द्वारपाल) स्थापित करना।
  2. प्रेम और अपहरण: पृथ्वीराज द्वारा जयचंद की पुत्री संयोगिता का अपहरण करना, जिसके कारण दोनों राज्यों में भयंकर युद्ध हुआ।
  3. कैंवास वध: मंत्री कैंवास द्वारा दासी से अनुचित संबंध बनाने पर पृथ्वीराज द्वारा उसका वध करना, और इस शर्त पर शव देना कि चंद उसे कन्नौज दिखाएंगे।
  4. गोरी वध: पृथ्वीराज के बंदी होने और आँखें निकलवाने के बाद, चंदवरदायी का अवधूत वेष में ग़ज़नी जाना। चंद के संकेत पर पृथ्वीराज द्वारा शब्दभेदी बाण चलाकर शहाबुद्दीन गोरी का वध करना और स्वयं भी वीरगति को प्राप्त होना।
  5. समाप्ति: चंद द्वारा अपने पुत्र जल्हण को रासो की पुस्तक सौंपकर उसे पूर्ण करने का संकेत देना।

प्रामाणिकता और ऐतिहासिकता पर विवाद

‘पृथ्वीराज रासो’ की सबसे अधिक आलोचना इसकी अनैतिहासिकता के कारण हुई है।

पक्षआलोचक / विद्वानमुख्य तर्क
अप्रामाणिक / जालीआचार्य रामचंद्र शुक्ल, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, डॉ. बूलर1. संवत्-विरोध: रासो में दिए गए संवत् (जन्म 1175, युद्ध 1158) ऐतिहासिक तथ्यों और शिलालेखों से मेल नहीं खाते। 2. घटना-विरोध: संयोगिता हरण, समरसिंह का समकालीन होना, और पृथ्वीराज द्वारा गोरी का वध करना असंगत है। 3. भाषिक संदेह: शुक्ल जी ने भाषा को ‘बिल्कुल बेठिकाने’ और व्याकरण-रहित बताया। 4. अन्य नाम: ग्रंथ में चंगेज़ और तैमूर जैसे परवर्ती शासकों के नाम मिलते हैं। 5. जयानक का ‘पृथ्वीराज विजय’: समसामयिक होते हुए भी यह ग्रंथ रासो की घटनाओं से मेल नहीं खाता।
प्रामाणिकबाबू श्यामसुंदर दास, मोहन लाल विष्णु लाल पंड्या1. काव्य ग्रंथ: इसे इतिहास नहीं, काव्य ग्रंथ मानकर ऐतिहासिक कसौटी पर कसना अनुचित है। 2. आनंद संवत् की कल्पना: पंड्या जी ने 90-91 वर्ष का अंतर पाकर आनंद संवत् की कल्पना की (जो सर्वमान्य नहीं है)।

रचनाकाल पर मत

  • ओझा जी: 16वीं शताब्दी।
  • शुक्ल जी: परवर्ती रचना और भट्ट-भणन्त (जाली ग्रंथ)।
  • हजारी प्रसाद द्विवेदी: वर्तमान रूप 17वीं शताब्दी के मध्य का है।
  • डॉ. माताप्रसाद गुप्त: संवत् 1400 के लगभग।

रासो की भाषा

  • शुक्ल जी: भाषा को बेठिकाने और व्याकरण-रहित माना।
  • गार्सा द तासी: कन्नौजी बोली का काव्य कहा।
  • डॉ. धीरेन्द्र वर्मा: व्याकरणिक ढाँचे को ब्रजभाषा का मानते हैं।
  • डॉ. दशरथ शर्मा / मीनाराम रंगा: प्राचीन राजस्थानी
  • डॉ. नामवर सिंह: यह अपभ्रंशोत्तर युग में रचित, पूर्वी राजस्थान और ब्रजमंडल की पिंगल भाषा की रचना है। यह आदिकाल की परिनिष्ठित मध्यदेशीय काव्यभाषा है, जिसमें पुरानी हिंदी का स्वरूप झलकता है।

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