1️⃣ छठी शताब्दी ई०पू० : पृष्ठभूमि
छठी शताब्दी ई०पू० का काल भारत में धार्मिक, सामाजिक और बौद्धिक परिवर्तन का समय था।
यज्ञों की जटिलता, कर्मकाण्ड, पशुबलि और वर्ण-व्यवस्था की कठोरता के कारण नए धार्मिक आंदोलनों का उदय हुआ। इन्हीं आंदोलनों में जैन धर्म प्रमुख है।
2️⃣ महावीर (वर्धमान)

- महावीर स्वामी जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर (महापुरुष) थे।
- इनके बचपन का नाम वर्धमान था।
- इनका जन्म 540 ई०पू० में एक राजपरिवार में वैशाली (वर्तमान बिहार) के निकट हुआ।
- 30 वर्ष की आयु में इन्होंने गृहत्याग कर कठोर तपस्या प्रारम्भ की।
- इन्द्रियों पर विजय प्राप्त करने के कारण वे:
- महावीर (महान वीर)
- जिन (विजेता)
कहलाए।
👉 उनके उपदेश अहिंसा, तप, संयम और त्याग पर आधारित थे।
3️⃣ जैन धर्म के त्रिरत्न (Three Jewels)
जैन धर्म के अनुसार मोक्ष प्राप्ति के लिए त्रिरत्न आवश्यक हैं—
- सही बातों में विश्वास (सम्यक दर्शन)
- सही बातों को ठीक से समझना (सम्यक ज्ञान)
- उचित कर्म करना (सम्यक चरित्र)
4️⃣ जैन धर्म के पाँच महाव्रत
महावीर स्वामी ने अपने अनुयायियों को पाँच महाव्रतों का पालन करने का उपदेश दिया—
- अहिंसा – किसी भी जीव को न मारना
- सत्य – सच बोलना
- अस्तेय – चोरी न करना
- अपरिग्रह – अनुचित धन या वस्तुओं का संग्रह न करना
- ब्रह्मचर्य / इन्द्रियनिग्रह – इन्द्रियों को वश में रखना
5️⃣ जैन अनुयायियों के सम्प्रदाय
महावीर स्वामी के निर्वाण के लगभग दो शताब्दियों बाद, जैन धर्म दो सम्प्रदायों में बँट गया—
- श्वेताम्बर
- सफेद वस्त्र धारण करते हैं
- दिगम्बर
- निर्वस्त्र (वस्त्र न पहनने वाले) माने जाते हैं
✍️ निष्कर्ष
- जैन धर्म ने अहिंसा और नैतिक जीवन पर विशेष बल दिया।
- छठी शताब्दी ई०पू० के धार्मिक आंदोलनों ने भारतीय समाज को कर्मकाण्ड से हटाकर नैतिकता और आत्मसंयम की ओर मोड़ा।
- जैन धर्म का प्रभाव आज भी भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों में स्पष्ट दिखाई देता है।
