द्विवेदी युग: जागरण-सुधार-काल (1900-1920 ई.)
1. परिचय एवं नामकरण
- नामकरण: इस युग का नाम इस काल के पथ-प्रदर्शक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर रखा गया है।
- अन्य नाम: डॉ. नगेन्द्र ने इसे ‘जागरण-सुधार-काल’ कहा है।
- मुख्य प्रवर्तक: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी (सन् 1903 में ‘सरस्वती’ पत्रिका के संपादक बने)।
2. ऐतिहासिक एवं राजनैतिक पृष्ठभूमि
- असंतोष का कारण: 1858 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों की वादाखिलाफी और आर्थिक शोषण की नीति ने जनता में क्षोभ पैदा किया।
- आर्थिक प्रभाव: भारत का कच्चा माल बाहर जाना और तैयार माल यहाँ बेचना, जिससे देश निर्धन होता गया।
- राजनैतिक नेतृत्व: गोपाल कृष्ण गोखले और बाल गंगाधर तिलक जैसे नेताओं का उदय हुआ।
- परिवर्तन: भारतेन्दु युग जहाँ केवल दुर्दशा पर दुःख प्रकट करता था, वहीं द्विवेदी युग ने स्वतंत्रता प्राप्ति की प्रेरणा देना शुरू किया।
3. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी का योगदान
- भाषा परिमार्जन: उन्होंने खड़ीबोली को काव्य की मुख्य भाषा बनाया और व्याकरणिक शुद्धि तथा वर्तनी की एकरूपता पर बल दिया।
- विषय परिवर्तन: उन्होंने ‘नायिका-भेद’ और ‘समस्यापूर्ति’ जैसी पुरानी रूढ़ियों को छोड़कर विविध और स्वतंत्र विषयों पर लिखने के लिए कवियों को प्रेरित किया।
- सरस्वती पत्रिका: इस पत्रिका के माध्यम से उन्होंने हिंदी साहित्य को दिशा-निर्देश दिया।
4. प्रमुख कवि एवं उनका वर्गीकरण
| श्रेणी | प्रमुख कवि |
| द्विवेदी जी की प्रेरणा से उभरे कवि | मैथिलीशरण गुप्त, गोपालशरण सिंह, गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’, लोचनप्रसाद पाण्डेय। |
| परंपरागत मार्ग बदलने वाले कवि | अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, नाथूराम शर्मा ‘शंकर’, राय देवीप्रसाद ‘पूर्ण’। |
5. द्विवेदी युगीन कविता की मुख्य विशेषताएँ
- राष्ट्रीयता की भावना: देशप्रेम और स्वाधीनता की चेतना का प्रसार।
- खड़ीबोली का प्रयोग: काव्य भाषा के रूप में ब्रजभाषा का स्थान अब खड़ीबोली ने ले लिया।
- नीति और आदर्श: श्रृंगारिकता के स्थान पर नैतिकता, आदर्श और उपदेशात्मकता पर बल दिया गया।
- विषय विस्तार: कविता अब केवल राजाओं या नायिकाओं तक सीमित न रहकर सामान्य मानव, प्रकृति और सामाजिक समस्याओं तक पहुँच गई।
- छन्द वैविध्य: पुराने छंदों के साथ-साथ नए और विविध छंदों का प्रयोग हुआ।
- हास्य-व्यंग्य: सामाजिक कुरीतियों और अंग्रेजी शासन पर व्यंग्यपूर्ण कविताओं की रचना।
निष्कर्ष
द्विवेदी युग हिंदी साहित्य का वह पड़ाव है जहाँ भाषा को अनुशासन मिला और साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन न रहकर ‘लोक-मंगल’ और ‘राष्ट्र-निर्माण’ बन गया। आचार्य द्विवेदी ने हिंदी कविता को मध्यकालीन बोझ से मुक्त कर आधुनिकता की ठोस जमीन पर खड़ा किया।
महत्त्वपूर्ण तथ्य: जून 1900 की ‘सरस्वती’ में प्रकाशित ‘हे कविते’ शीर्षक कविता में द्विवेदी जी ने ब्रजभाषा के प्रयोग पर अपना क्षोभ प्रकट किया था।
