क्रीडाम वयं श्लोकान्त्याक्षरीम् कक्षा 7 संस्कृत पाठ 6
इस पाठ का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को श्लोकों के माध्यम से खेल-खेल में संस्कृत सीखने तथा विद्या के महत्व को समझाना है। पाठ में अन्त्याक्षरी क्रीडा का वर्णन है, जिसमें एक छात्र श्लोक पढ़ता है और अगला छात्र उस श्लोक के अंतिम अक्षर से शुरू होने वाला नया श्लोक पढ़ता है। साथ ही इसमें विद्या की महिमा पर आधारित अनेक श्लोक संकलित हैं। यह पाठ विद्या शब्द के रूप, क्तवतु प्रत्यय तथा सुभाषितों का भी ज्ञान देता है।
📖 पाठ का सारांश
एक दिन कुछ बालिकाएँ वर्षा के कारण बाहर नहीं खेल पा रही थीं। तब दीपिका ने कहा — “वर्षा हो रही है, हम बाहर कैसे खेलें?” तब भारती ने कहा — “बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है। यह एक नई क्रीडा है — अन्त्याक्षरी क्रीडा।” सबने पूछा — “अन्त्याक्षरी क्रीडा क्या है?” भारती ने बताया — “हम दो समूह बनाएँगे। पहले समूह का नाम ‘ज्ञानमाला’ और दूसरे समूह का नाम ‘रत्नमाला’ होगा। पहले समूह का कोई सदस्य एक श्लोक पढ़ेगा। उस श्लोक के अंतिम अक्षर से दूसरे समूह का सदस्य नया श्लोक पढ़ेगा। इस प्रकार क्रीडा चलती रहेगी।”
सभी ने कहा — “अहो! महान आनन्द होगा।” तब सबने मिलकर क्रीडा प्रारंभ की।
क्रीडा में प्रयुक्त कुछ श्लोक:
ज्ञानमाला समूह:
- रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः।
विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धा इव किंशुकाः॥
(रूप और यौवन से संपन्न तथा विशाल कुल में जन्मे हुए भी विद्याहीन लोग निर्गंध पलाश के फूलों की तरह शोभा नहीं पाते।) - काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा॥
(बुद्धिमानों का समय काव्य-शास्त्र के आनंद में बीतता है, जबकि मूर्खों का समय बुरी आदतों, नींद या कलह में बीतता है।) - विद्या विवादाय धनं मदाय शक्तिः परेषां परिपीडनाय।
खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय॥
(दुर्जन की विद्या विवाद के लिए, धन अहंकार के लिए, शक्ति दूसरों को पीड़ा देने के लिए होती है; परंतु सज्जन का इसका विपरीत होता है — विद्या ज्ञान के लिए, धन दान के लिए, शक्ति रक्षा के लिए।)
रत्नमाला समूह:
- येषां न विद्या न तपो न दानं ज्ञानं न शीलं न गुणो न धर्मः।
ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति॥
(जिनके पास विद्या, तप, दान, ज्ञान, शील, गुण और धर्म नहीं है, वे संसार में पृथ्वी पर भार स्वरूप मनुष्य के रूप में पशु की तरह घूमते हैं।) - तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च लक्ष्मीर्वाणी यशस्विनी।
तत्त्वज्ञानं परा शान्तिर्यदा विद्या भवेत्तव॥
(जब तुम्हारे पास विद्या होती है, तब आजीविका, कीर्ति, लक्ष्मी, यशस्विनी वाणी, तत्वज्ञान और परम शांति प्राप्त होती है।) - विद्या नाम नरस्य रूपमधिकं प्रच्छन्नगुप्तं धनं।
विद्या भोगकरी यशःसुखकरी विद्या गुरूणां गुरुः।
विद्या बन्धुजनो विदेशगमने विद्या परा देवता।
विद्या राजसु पूज्यते न हि धनं विद्याविहीनः पशुः॥
(विद्या मनुष्य का श्रेष्ठ रूप है, छिपा हुआ धन है। विद्या भोग देने वाली, यश और सुख देने वाली, गुरुओं की भी गुरु है। विदेश जाने पर विद्या बंधु है, विद्या परम देवता है। राजाओं में विद्या की पूजा होती है, धन की नहीं। विद्याहीन तो पशु है।) - शनैः पन्थाः शनैः कन्था शनैः पर्वतलङ्घनम्।
शनैर्विद्या शनैर्वित्तं पञ्चैतानि शनैः शनैः॥
(रास्ता धीरे-धीरे चलना, चादर धीरे-धीरे बुनना, पर्वत धीरे-धीरे चढ़ना, विद्या धीरे-धीरे अर्जित करना, धन धीरे-धीरे संचित करना — ये पाँच कार्य धीरे-धीरे करने चाहिए।) - न विद्यया विना सौख्यं नराणां जायते ध्रुवम्।
अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यो विद्याभ्यासं समाचरेत्॥
(विद्या के बिना मनुष्यों को निश्चित रूप से सुख नहीं मिलता। इसलिए धर्म, अर्थ और मोक्ष के लिए विद्याभ्यास करना चाहिए।) - ताराणां भूषणं चन्द्रः लतानां भूषणं सुमम्।
पृथिव्याः भूषणं राजा विद्या सर्वस्य भूषणम्॥
(तारों का आभूषण चंद्रमा है, लताओं का आभूषण फूल है, पृथ्वी का आभूषण राजा है, परंतु विद्या सबका आभूषण है।) - न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम्॥
(विद्या रूपी धन न चोर द्वारा चुराया जा सकता है, न राजा द्वारा छीना जा सकता है, न भाइयों में बाँटा जा सकता है, न भारी होता है। खर्च करने पर यह नित्य बढ़ता ही है। इसलिए विद्याधन सब धनों में प्रधान है।)
📚 शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| क्रीडा | खेल |
| श्लोक | श्लोक |
| अन्त्याक्षरी | अंतिम अक्षर से शुरू होने वाला खेल |
| वृष्टिः | बारिश |
| अभिलषामः | चाहते हैं |
| बहिः | बाहर |
| आवश्यकता | जरूरत |
| नूतना | नई |
| नियमान् | नियम |
| सूचयतु | बताइए |
| गणद्वयम् | दो समूह |
| रचयामः | बनाते हैं |
| प्रथमगणस्य | पहले समूह का |
| नाम | नाम |
| द्वितीयगणस्य | दूसरे समूह का |
| पद्यम् | पद्य |
| अन्तिमेन | अंतिम |
| व्यञ्जनवर्णेन | व्यंजन वर्ण से |
| सदस्यः | सदस्य |
| सदस्या | सदस्या |
| क्रमशः | क्रम से |
| प्रचलति | चलता है |
| आनन्दः | आनंद |
| भविष्यति | होगा |
| अक्षरात् | अक्षर से |
| पद्यं गायति | पद्य गाता है |
| रत्नमालागणः | रत्नमाला समूह |
| ज्ञानमालागणः | ज्ञानमाला समूह |
| रूपयौवनसम्पन्नाः | रूप और यौवन से सम्पन्न |
| विशालकुलसम्भवाः | विशिष्ट कुल में जन्मे |
| विद्याहीनाः | विद्या से रहित |
| निर्गन्धाः | गंधहीन |
| किंशुकाः | पलाश के फूल |
| धीमताम् | बुद्धिमानों का |
| व्यसनेन | बुरी आदतों से |
| मदाय | अहंकार के लिए |
| परिपीडनाय | कष्ट देने के लिए |
| खलः | दुर्जन |
| शीलम् | चरित्र |
| मर्त्यलोके | संसार में |
| भुवि | धरती पर |
| भारभूताः | भार |
| कठिनव्रतम् | कठोर नियम |
| वृत्तिः | आजीविका |
| लक्ष्मीः | सम्पत्ति |
| यशस्विनी | कीर्ति से युक्त |
| तत्त्वज्ञानम् | यथार्थ ज्ञान |
| प्रच्छन्नगुप्तम् | छिपा हुआ |
| भोगकरी | सुख देने वाली |
| यशःसुखकरी | यश और सुख देने वाली |
| विदेशगमने | विदेश जाने पर |
| परा | श्रेष्ठ |
| विद्याविहीनः | विद्या रहित |
| पन्थाः | रास्ता |
| कन्था | चादर |
| पर्वतलङ्घनम् | पर्वत पर चढ़ना |
| वित्तम् | धन |
| सौख्यम् | सुख |
| ध्रुवम् | निश्चित |
| समाचरेत् | करना चाहिए |
| अनिवार्यम् | अत्यंत आवश्यक |
| ताराणाम् | नक्षत्रों का |
| भूषणम् | आभूषण |
| सुमम् | फूल |
| चोरहार्यम् | चोर द्वारा हरण योग्य |
| राजहार्यम् | राजा द्वारा हरण योग्य |
| भ्रातृभाज्यम् | भाई-बहनों में बाँटने योग्य |
| भारकारि | भार रूप |
| व्यये कृते | खर्च करने पर |
| विद्याधनम् | विद्या रूपी धन |
| सर्वधनप्रधानम् | सब धनों में प्रमुख |
📝 व्याकरण: विद्या शब्द के रूप (स्त्रीलिङ्ग)
| विभक्ति | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथमा | विद्या | विद्ये | विद्याः |
| द्वितीया | विद्याम् | विद्ये | विद्याः |
| तृतीया | विद्यया | विद्याभ्याम् | विद्याभिः |
| चतुर्थी | विद्यायै | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| पञ्चमी | विद्यायाः | विद्याभ्याम् | विद्याभ्यः |
| षष्ठी | विद्यायाः | विद्ययोः | विद्यानाम् |
| सप्तमी | विद्यायाम् | विद्ययोः | विद्यासु |
| सम्बोधन | हे विद्ये! | हे विद्ये! | हे विद्याः! |
📝 पाठ्यपुस्तक अभ्यास प्रश्नोत्तर
1. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन उत्तरं लिखन्तु
(क) विद्याहीनाः कीदृशाः किंशुकाः इव न शोभन्ते?
उत्तर: निर्गन्धाः
(ख) धीमतां कालः कथं गच्छति?
उत्तर: काव्यशास्त्रविनोदेन
(ग) केषां कालः निद्रया कलहेन वा गच्छति?
उत्तर: मूर्खाणाम्
(घ) खलस्य विद्या किमर्थम्?
उत्तर: विवादाय
(ङ) सज्जनस्य विद्या किमर्थम्?
उत्तर: ज्ञानाय
(च) चन्द्रः केषां भूषणम् अस्ति?
उत्तर: ताराणाम्
(छ) सर्वधनप्रधानं किम्?
उत्तर: विद्याधनम्
2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु
(क) निर्गन्धाः किंशुकाः इव के न शोभन्ते?
उत्तर: विद्याहीनाः जनाः निर्गन्धाः किंशुकाः इव न शोभन्ते।
(ख) मूर्खाणां कालः कथं गच्छति?
उत्तर: मूर्खाणां कालः व्यसनेन निद्रया कलहेन वा गच्छति।
(ग) दुर्जनः विद्यायाः धनस्य शक्तेः च उपयोगं कथं करोति?
उत्तर: दुर्जनः विद्यायाः उपयोगं विवादाय, धनस्य उपयोगं मदाय, शक्तेः उपयोगं परेषां परिपीडनाय च करोति।
(घ) कीदृशाः मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति?
उत्तर: येषां विद्या, तपः, दानम्, ज्ञानम्, शीलम्, गुणः, धर्मः च न सन्ति, तादृशाः मनुष्याः भुवि भारभूताः भवन्ति।
(ङ) शनैः शनैः कानि साधनीयानि?
उत्तर: पन्थाः, कन्था, पर्वतलङ्घनम्, विद्या, वित्तम् — एतानि पञ्च शनैः शनैः साधनीयानि।
3. उचितान् वाक्यांशान् परस्परं संयोजयन्तु
| (क) | (ख) |
|---|---|
| तदा वृत्तिश्च कीर्तिश्च | यदा विद्या भवेत्तव |
| खलस्य साधोर्विपरीतमेतत् | ज्ञानाय दानाय च रक्षणाय |
| शनैर्विद्या शनैर्वित्तं | पञ्चैतानि शनैः शनैः |
| विद्याहीना न शोभन्ते | निर्गन्धा इव किंशुकाः |
| न चोरहार्यं न च राजहार्यम् | न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि |
| विद्या राजसु पूज्यते | न हि धनम् |
| अतो धर्मार्थमोक्षेभ्यः | विद्याभ्यासं समाचरेत् |
4. उदाहरणानुसारम् अधः रेखाङ्कितानि पदानि आश्रित्य प्रश्ननिर्माणं कुर्वन्तु
(क) राजा पृथिव्याः भूषणं भवति। — राजा कस्याः भूषणं भवति?
(ख) साधोः विद्या ज्ञानाय भवति। — कस्य विद्या ज्ञानाय भवति?
(ग) विद्या गुरूणां गुरुः। — विद्या केषां गुरुः?
(घ) ते मर्त्यलोके भुवि भारभूताः भवन्ति। — ते मर्त्यलोके भुवि कीदृशाः भवन्ति?
(ङ) विद्याहीनाः न शोभन्ते। — के न शोभन्ते?
(च) सर्वस्य लोचनं शास्त्रम्। — सर्वस्य किं शास्त्रम्?
(छ) विद्या राजसु पूज्यते। — विद्या केषु पूज्यते?
(ज) काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम्। — केषां कालः काव्यशास्त्रविनोदेन गच्छति?
5. मञ्जूषातः समुचितानि पदानि स्वीकृत्य रिक्तस्थानानि पूरयन्तु
मञ्जूषा: रक्षणाय, मदाय, विवादाय, परिपीडनाय, ज्ञानाय, दानाय
सज्जनस्य:
- विद्या — ज्ञानाय
- धनम् — दानाय
- शक्तिः — रक्षणाय
दुर्जनस्य:
- विद्या — विवादाय
- धनम् — मदाय
- शक्तिः — परिपीडनाय
6. उदाहरणानुसारम् अधोलिखितानां पदानां विभक्तिं वचनं च लिखन्तु
यथा — ताराणाम् — षष्ठी विभक्तिः, बहुवचनम्
(क) विद्याम् — द्वितीया विभक्तिः, एकवचनम्
(ख) धनस्य — षष्ठी विभक्तिः, एकवचनम्
(ग) कलहेन — तृतीया विभक्तिः, एकवचनम्
(घ) नराणाम् — षष्ठी विभक्तिः, बहुवचनम्
(ङ) मर्त्यलोके — सप्तमी विभक्तिः, एकवचनम्
(च) ज्ञानाय — चतुर्थी विभक्तिः, एकवचनम्
(छ) राजसु — सप्तमी विभक्तिः, बहुवचनम्
🎯 अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न
अन्त्याक्षरी क्रीडा क्या है?
एक खेल जिसमें एक श्लोक के अंतिम अक्षर से अगला श्लोक शुरू किया जाता है।
इस पाठ में कितने समूह बनाए गए?
दो — ज्ञानमाला और रत्नमाला
विद्याहीन लोग किसके समान नहीं शोभते?
निर्गंध पलाश के फूलों के समान
बुद्धिमानों का समय कैसे बीतता है?
काव्य-शास्त्र के आनंद में
मूर्खों का समय कैसे बीतता है?
बुरी आदतों, नींद या कलह में
दुर्जन की विद्या किसके लिए होती है?
विवाद के लिए
सज्जन की विद्या किसके लिए होती है?
ज्ञान के लिए
दुर्जन का धन किसके लिए होता है?
अहंकार के लिए
सज्जन का धन किसके लिए होता है?
दान के लिए
दुर्जन की शक्ति किसके लिए होती है?
दूसरों को पीड़ा देने के लिए
सज्जन की शक्ति किसके लिए होती है?
रक्षा के लिए
तारों का आभूषण क्या है?
चंद्रमा
लताओं का आभूषण क्या है?
फूल
पृथ्वी का आभूषण क्या है?
राजा
सबका आभूषण क्या है?
विद्या
विद्याधन कैसा धन है?
जो न चोरी जा सकता है, न राजा द्वारा छीना जा सकता है, न बाँटा जा सकता है, न भारी होता है, खर्च करने पर बढ़ता है।
सब धनों में प्रधान क्या है?
विद्याधन
विद्याहीन मनुष्य किसके समान है?
पशु के समान
शनैः शनैः कौन-कौन से पाँच कार्य करने चाहिए?
रास्ता चलना, चादर बुनना, पर्वत चढ़ना, विद्या अर्जित करना, धन संचित करना
विद्या के बिना क्या नहीं मिलता?
सुख
धर्म, अर्थ और मोक्ष के लिए क्या करना चाहिए?
विद्याभ्यास
‘विद्या’ शब्द किस लिंग का है?
स्त्रीलिंग
‘विद्या’ शब्द के प्रथमा विभक्ति बहुवचन का रूप क्या है?
विद्याः
‘विद्या’ शब्द के षष्ठी विभक्ति एकवचन का रूप क्या है?
विद्यायाः
