न लभ्यते चेत् आम्लं द्राक्षाफलम् कक्षा 7 संस्कृत पाठ 4
इस पाठ का मुख्य उद्देश्य विद्यार्थियों को पंचतंत्र की प्रसिद्ध कथा के माध्यम से नैतिक शिक्षा देना है। यह कथा उस मनोवृत्ति को दर्शाती है जिसमें मनुष्य जब कोई वस्तु प्राप्त नहीं कर पाता, तो वह उसे बुरा कहकर अपनी असफलता को छिपाने का प्रयास करता है। इसे ही “अंगूर खट्टे हैं” कहा जाता है। साथ ही यह पाठ आत्मनेपदी धातुओं (लट्-लकार) का भी परिचय कराता है।
📖 पाठ का सारांश
एक बार एक भूखा-प्यासा शृगाल (लोमड़ी) भोजन की खोज में वन में घूम रहा था। बहुत भटकने पर भी उसे कुछ नहीं मिला। वह थक गया और दुःखी हो गया। वह इधर-उधर देखने लगा — बाईं ओर, दाईं ओर, आगे, पीछे। उसे पसीना आ गया और प्यास लग गई।
तभी उसने एक द्राक्षालता (अंगूर की बेल) देखी, जिस पर ऊँचाई पर मीठे-मीठे अंगूर लटक रहे थे। अंगूरों को देखकर शृगाल के मुँह में पानी (लार) आ गया। वह बार-बार उछलने लगा — एक बार, दो बार, तीन बार, बार-बार। उछलने से उसे पसीना आ गया और श्रम हो गया। लेकिन अंगूर बहुत ऊँचे थे, वह उन्हें प्राप्त न कर सका।
अन्त में, जब वह अंगूर प्राप्त न कर सका, तो वह कहने लगा — “ये अंगूर खट्टे हैं! ये अंगूर खट्टे हैं!” और वह वहाँ से भाग गया।
शिक्षा: यह कथा बताती है कि जब हमें कोई वस्तु प्राप्त नहीं होती, तो हम उसे बुरा कहकर अपनी असफलता को छिपाने का प्रयास करते हैं। यह मनोवृत्ति “अंगूर खट्टे हैं” कहलाती है। हमें परिश्रम करना चाहिए और असफल होने पर भी सत्य को स्वीकार करना चाहिए।
📝 पाठ का मूल पाठ
एकः शृगालः:
एकः शृगालः वनं गच्छति।
पिपासा, तस्य बुभुक्षा
पिपासया बुभुक्षया वनं गच्छति
सः वनं गच्छति, सः वनं गच्छति।
तत्र गच्छति, किमपि न लभते
इतोऽपि गच्छति, किमपि न लभते
श्रान्तः जायते, खिन्नः जायते
सः श्रान्तः जायते, खिन्नः जायते
किं च करोति? सः किं च करोति?
वामतः पश्यति, दक्षिणतः पश्यति
अग्रतः पश्यति, पृष्ठतः पश्यति
स्वेदः जायते, तृषा जायते
तस्य स्वेदः जायते, तृषा जायते
किं च पश्यति? सः किं च पश्यति?
किं च पश्यति? सः किं च पश्यति?
पश्यति द्राक्षालतां
सः पश्यति द्राक्षाफलम्
उपरि उपरि लतासु दृश्यते च तत्फलम्
अनुक्षणं तन्मुखे रसः जायते
किं च करोति? सः किं च करोति?
एकवारम् उत्पतति, द्विवारम् उत्पतति
त्रिवारम् उत्पतति, पुनः पुनः उत्पतति
स्वेदः जायते, तस्य श्रमः जायते
किं कथयति? सः किं कथयति?
आम्लं द्राक्षाफलम् आम्लं द्राक्षाफलम्
इत्येवं कथयति, सः पलायते
इत्येवं कथयति, सः पलायते॥
📚 शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| शृगालः | लोमड़ी |
| वनम् | जंगल |
| पिपासा | प्यास |
| बुभुक्षा | भूख |
| किमपि | कुछ भी |
| इतोऽपि | और भी |
| लभते | पाता है |
| श्रान्तः | थका हुआ |
| खिन्नः | दुःखी |
| जायते | होता है |
| वामतः | बाईं ओर |
| दक्षिणतः | दाईं ओर |
| अग्रतः | आगे |
| पृष्ठतः | पीछे |
| स्वेदः | पसीना |
| तृषा | प्यास |
| द्राक्षालता | अंगूर की बेल |
| उपरि | ऊपर |
| दृश्यते | दिखाई देता है |
| अनुक्षणम् | उसी क्षण |
| रसः | लार |
| एकवारम् | एक बार |
| द्विवारम् | दो बार |
| त्रिवारम् | तीन बार |
| उत्पत्ति | कूदना |
| पुनः पुनः | बार-बार |
| कथयति | कहता है |
| आम्लम् | खट्टा |
| द्राक्षाफलम् | अंगूर |
| पलायते | भाग जाता है |
📝 व्याकरण: आत्मनेपदी धातु (लट्-लकार)
लट्-लकार (वर्तमान काल) — आत्मनेपद
| पुरुष | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| प्रथम | लभते | लभेते | लभन्ते |
| मध्यम | लभसे | लभेथे | लभध्वे |
| उत्तम | लभे | लभावहे | लभामहे |
अन्य आत्मनेपदी धातुएँ:
- सेव् — सेवते, सेवेते, सेवन्ते
- वन्द् — वन्दते, वन्देते, वन्दन्ते
- शुभ् — शोभते, शोभेते, शोभन्ते
- वर्त् — वर्तते, वर्तेते, वर्तन्ते
- वर्ध् — वर्धते, वर्धेते, वर्धन्ते
- कम्प् — कम्पते, कम्पेते, कम्पन्ते
- याच् — याचते, याचेते, याचन्ते
- लज्ज् — लज्जते, लज्जेते, लज्जन्ते
- वीक्ष् — वीक्षते, वीक्षेते, वीक्षन्ते
- पलाय् — पलायते, पलायेते, पलायन्ते
📝 पाठ्यपुस्तक अभ्यास प्रश्नोत्तर
1. एकः शृगालः इति गीतस्य साभिनयं कक्षायां गानं कुर्वन्तु।
(छात्र स्वयं करें)
2. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानाम् एकपदेन पदद्वयेन वा उत्तरं लिखन्तु
(क) कः वनं गच्छति?
उत्तर: शृगालः
(ख) शृगालः कां पश्यति?
उत्तर: द्राक्षालताम्
(ग) शृगालस्य मुखे किं जायते?
उत्तर: रसः
(घ) द्राक्षालतायां शृगालः किं पश्यति?
उत्तर: द्राक्षाफलम्
(ङ) द्राक्षाफलं कुत्र दृश्यते?
उत्तर: उपरि लतासु
(च) किं शृगालः पुनः पुनः उत्पतति?
उत्तर: आम्
(छ) किं शृगालः द्राक्षाफलं प्राप्नोति?
उत्तर: न
3. अधः प्रदत्तानां प्रश्नानां पूर्णवाक्येन उत्तरं लिखन्तु
(क) शृगालः कथं वनं गच्छति?
उत्तर: शृगालः पिपासया बुभुक्षया च वनं गच्छति।
(ख) वनं गत्वा शृगालस्य किं जायते?
उत्तर: वनं गत्वा शृगालः श्रान्तः खिन्नः च जायते।
(ग) शृगालः द्राक्षाफलं कुत्र पश्यति?
उत्तर: शृगालः द्राक्षाफलं उपरि लतासु पश्यति।
(घ) द्राक्षाफलं दृष्ट्वा कस्य मुखे रसः जायते?
उत्तर: द्राक्षाफलं दृष्ट्वा शृगालस्य मुखे रसः जायते।
(ङ) अन्ते शृगालः किं वदति?
उत्तर: अन्ते शृगालः वदति — “आम्लं द्राक्षाफलम्, आम्लं द्राक्षाफलम्” इति।
4. उपरि प्रदत्तां मञ्जूषां दृष्ट्वा रिक्तस्थानेषु उचितक्रियापदानि लिखन्तु
(क) वन्दते — वन्देते — वन्दन्ते
(ख) पलायते — पलायेते — पलायन्ते
(ग) जायते — जायेते — जायन्ते
5. उदाहरणानुसारम् एकवचनरूपं दृष्ट्वा द्विवचन-बहुवचनरूपाणि लिखन्तु
| धातुः | एकवचनम् | द्विवचनम् | बहुवचनम् |
|---|---|---|---|
| कम्प् | कम्पते | कम्पेते | कम्पन्ते |
| वर्ध् | वर्धते | वर्धेते | वर्धन्ते |
| वर्त् | वर्तते | वर्तेते | वर्तन्ते |
| प्र + काश् | प्रकाशते | प्रकाशेते | प्रकाशन्ते |
| वन्द् | वन्दते | वन्देते | वन्दन्ते |
| याच् | याचते | याचेते | याचन्ते |
| लज्ज् | लज्जते | लज्जेते | लज्जन्ते |
| वीक्ष् | वीक्षते | वीक्षेते | वीक्षन्ते |
| सेव् | सेवते | सेवेते | सेवन्ते |
| शुभ् | शोभते | शोभेते | शोभन्ते |
6. उदाहरणानुसारं वाक्यद्वयं लिखन्तु
यथा — शत्रुः (पलाय्) — शत्रुः पलायते। चोरः (पलाय्) — चोरौ पलायेते।
(क) वृक्षः (वर्ध्) — वृक्षः वर्धते। बाला (वर्ध्) — बाला वर्धते।
(ख) छात्रः (वन्द्) — छात्रः वन्दते। भक्ता (वन्द्) — भक्ता वन्दते।
(ग) वैद्यः (वीक्ष्) — वैद्यः वीक्षते। प्रेक्षका (वीक्ष्) — प्रेक्षका वीक्षते।
(घ) कर्मचारी (सेव्) — कर्मचारी सेवते। महिला (सेव्) — महिला सेवते।
(ङ) वृक्षः (कम्प्) — वृक्षः कम्पते। रुग्णा (कम्प्) — रुग्णा कम्पते।
7. उदाहरणं दृष्ट्वा वाक्यानि उचितरूपैः पूरयन्तु
(क) शुनकं दृष्ट्वा बालकस्य भयं जायते।
(ख) मूषकः मार्जारं दृष्ट्वा पलायते।
(ग) रात्रिकाले मार्गदीपः प्रकाशते।
(घ) अहं देवं वन्दे।
(ङ) त्वं किमर्थं लज्जसे?
(च) वयं देशं सेवामहे।
🎯 अतिरिक्त महत्वपूर्ण प्रश्न
शृगालः कुत्र गच्छति?
वनम्
शृगालः किमर्थं वनं गच्छति?
पिपासया बुभुक्षया च
शृगालः कां पश्यति?
द्राक्षालताम्
द्राक्षाफलं कुत्र दृश्यते?
उपरि लतासु
शृगालः कति वारं उत्पतति?
एकवारम्, द्विवारम्, त्रिवारम्, पुनः पुनः
शृगालः अन्ते किं वदति?
आम्लं द्राक्षाफलम्
शृगालः किं प्राप्नोति?
न प्राप्नोति
‘आम्लम्’ का अर्थ क्या है?
खट्टा
‘द्राक्षाफलम्’ का अर्थ क्या है?
अंगूर
‘पलायते’ का अर्थ क्या है?
भाग जाता है
इस कथा की शिक्षा क्या है?
जब हमें कोई वस्तु नहीं मिलती, तो हम उसे बुरा कहकर अपनी असफलता छिपाते हैं। यह गलत है। हमें परिश्रम करना चाहिए और सत्य स्वीकार करना चाहिए।
‘अंगूर खट्टे हैं’ मुहावरे का अर्थ क्या है?
जो वस्तु मिल न सके, उसे बुरा कहना
आत्मनेपदी धातु क्या है?
जिन धातुओं के रूप आत्मनेपद में चलते हैं, उन्हें आत्मनेपदी धातु कहते हैं। जैसे — लभ्, सेव्, वन्द्, शुभ् आदि।
लट्-लकार क्या है?
वर्तमान काल को लट्-लकार कहते हैं।
‘लभते’ का अर्थ क्या है?
पाता है
‘श्रान्तः’ का अर्थ क्या है?
थका हुआ
‘खिन्नः’ का अर्थ क्या है?
दुःखी
‘स्वेदः’ का अर्थ क्या है?
पसीना
‘तृषा’ का अर्थ क्या है?
प्यास
