परिभाषा: लोकोक्तियाँ वे कथन हैं जो समाज के अनुभव से बने होते हैं और संक्षिप्त रूप में गहरी बात कहते हैं।
प्रचलित 20 लोकोक्तियाँ (अर्थ सहित)
| लोकोक्ति | अर्थ |
|---|---|
| अंधों में काना राजा | जहाँ सब अयोग्य हों, वहाँ थोड़े गुणी को भी बहुत सम्मान मिलता है। |
| अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है | अपने स्थान पर सबको बड़प्पन मिलता है। |
| अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता | अकेला व्यक्ति बड़ा कार्य नहीं कर सकता। |
| अब पछताए होत क्या, जब चिड़िया चुग गई खेत | अवसर बीत जाने पर पछताने से कोई लाभ नहीं। |
| आम के आम, गुठलियों के दाम | एक कार्य से दोहरा लाभ। |
| ईमानदार की धोती कुत्ता नहीं खींचता | ईमानदार का सब आदर करते हैं। |
| उच्चे कुआँ, ऊँचा भरना | बड़े लोगों के साथ बड़ा व्यवहार करना चाहिए। |
| उल्टी गंगा बहाना | विपरीत दिशा में कार्य करना। |
| ऊँट के मुँह में जीरा | अधिक वस्तु के सामने थोड़ी वस्तु का होना। |
| एक अनार सौ बीमार | एक वस्तु के लिए अनेकों का लालायित होना। |
| एक हाथ से ताली नहीं बजती | विवाद में दोनों पक्षों का होना आवश्यक है। |
| कंगाल में बड़ी ही जाती है | निर्धन व्यक्ति के मन में भी आत्मसम्मान होता है। |
| करे कोई, भरे कोई | अपना काम दूसरे को करने देना। |
| कहाँ राजा भोज, कहाँ गंगू तेली | बड़े और छोटे में अंतर होता है। |
| कान पकड़कर सीधा करना | कठोरता से सुधारना। |
| काल करे सो आज कर | कार्य को कल पर न छोड़ें। |
| कुत्ता कुत्ते की दुम काटता नहीं | अपनी जाति को नुकसान नहीं पहुँचाते। |
| कुएँ की मछली | संकीर्ण विचार वाला व्यक्ति। |
| केवल पानी से लहर नहीं उठती | प्रभाव डालने के लिए कुछ आधार चाहिए। |
| खाने को हैं, सोने को नहीं | पेट-भर रोजगार मिलना, लेकिन आराम न मिलना। |
| घड़ा रहे न पानी, चारों ओर हाहाकार | बिखर जाने पर सब पछताते हैं। |
| चार दिन की चाँदनी, फिर अंधेरी रात | सुख क्षणभंगुर होता है। |
| चोर की दाढ़ी में तिनका | चोर का सदैव डर बना रहता है। |
| छोटा मुँह, बड़ी बात | जिसकी सामर्थ्य न हो वह बड़ी बातें करे। |
| जब जागो तब सवेरा | जब भी मनुष्य सचेत हो जाए, उसके लिए नई शुरुआत होती है। |
| जिसकी लाठी उसकी भैंस | जिसके पास अधिकार हो, उसी की बात मानी जाती है। |
| जैसा बोओगे, वैसा काटोगे | अपने कर्मों के अनुसार फल मिलता है। |
| जैसे को तैसा | बुराई का बुराई से जवाब देना। |
| जो गरजते हैं वे बरसते नहीं | जो ज़्यादा बोलते हैं, वे कम करते हैं। |
| ठहरे पानी में मछली पैदा नहीं होती | क्रियाशीलता के बिना सफलता नहीं मिलती। |
| तन को न्यारे, मन को प्यारे | भले ही शारीरिक रूप से दूर हों, पर दिल से पास हों। |
| दूध का जला छाछ भी फूँक-फूँककर पीता है | जो एक बार धोखा खा जाता है, वह हर चीज़ से डरता है। |
| दो मुँह वाली बात | अनिश्चितता या दोहरा व्यवहार। |
| नाच न जाने, आँगन टेढ़ा | स्वयं में कमी न देखकर बहाने बनाना। |
| नौ गज की चुनरी, तीन गज की ज़मीन | बड़ी पोशाक, छोटी जगह – असंगति। |
| पर का पानी, प्यास न बुझाना | दूसरों की चीज़ से तृप्ति न मिलना। |
| पेट में चूहे दौड़ना | अत्यधिक भूख लगना। |
| फल गिरे तो चटक, कलम गिरे तो सटक | आदत से मजबूरी। |
| बिना बुराई के भला नहीं | हर अच्छाई में कोई न कोई कमी होती ही है। |
| बिना मैं क्या, मैं के बिना क्या | अपने होने का महत्व समझना। |
| मन के हारे हार, मन के जीते जीत | मनोबल ही सफलता की कुंजी है। |
| मुँह में राम, बगल में छुरी | बाहर से अच्छा, अन्दर से बुरा। |
| रेता पानी न माँगे | मूर्ख व्यक्ति कभी कुछ नहीं माँगता। |
| लातों के भूत, बातों से नहीं मानते | जो सीधी बात न समझें, उन्हें कठोरता से समझाना चाहिए। |
| शेर की खाल में लोमड़ी | बाहरी रूप से ताकतवर, वास्तव में कमज़ोर। |
| सब घी नहीं, कुछ छाछ भी | सभी वस्तुएँ एक समान नहीं होतीं। |
| हाथ में तरकारी, ज़बान पर घी | समर्थन न होते हुए भी बड़ी-बड़ी बातें करना। |
| हीरा कबाड़ में नहीं बिकता | अच्छी चीज़ सस्ते दाम पर नहीं मिलती। |
