सन्तश्रीगहिरागुरु:
श्रीगहिरागुरु: महान् समाजसुधारक: दार्शनिक: तपस्वी च आसीत्। तस्य जन्म पञ्चाधिकएकोनविंशतिशततमे (1905) खीस्ताब्दे रायगढ़मण्डलान्तर्गते गहिराग्रामेऽभवत्। तत्रभवतः पिता श्री बुडकीकँवरमहोदयः सम्पन्नो कृषकः जनजातीयसमूहस्य ग्रामप्रमुख: च आसीत्। मातुर्नाम् श्रीमती सुमित्रा देवी आसीत्। गहिरागुरो: वास्तविकं नाम श्री रामेश्वरकँवर: आसीत्। अन्येषां बालकानां सदृशः तस्य बाल्यकाल: प्रकृत्याः सान्निध्ये व्यतीतः।
किशोरावस्थायां रामेश्वरकँवर: गंभीरप्रवृत्तिं प्राप्तवान्। जनजातीयसमूहस्य दुरवस्थां विलोक्य सः भृशं दुःखी आसीत्। तत्रभवान् तान् आत्मनिर्भरकरणार्थ भगीरथप्रयत्नं कृतवान्। एकदा रामेश्वरकँवर: टीपाझरननाम्नि स्थाने अष्टदिनात्मकं अहर्निशं साधनामकरोत्। सः जनान् उपदिशति स्म। गहिराग्रामे सः शिवमन्दिरस्य निर्माणमपि कारयितवान्। मन्दिरस्य प्राङ्गणे च प्रतिदिनं कीर्तनं करोति स्म। सः रात्रौ भगवद्चिन्तनं कुर्वन् वने इतस्ततश्च भ्रमति स्म। यदा कदा सः समाधिमपि अधिगच्छति स्म। शनैः शनैः तस्य सम्बोधनं गहिरागुरु: अभवत्। सः जनजातीयसमूहस्य नेतृत्वम् अकरोत्। स्वभावतः जनेषु लोकप्रियः अभवत्।
गृहस्थजीवनं व्यतीतं कुर्वन् गहिरागुरु: लोककल्याणे अनवरतं संलग्नः जातः। अनेकेषु स्थानेषु तेन शिक्षासंस्थानानि संस्थापितानि। तेषु संस्कृतपाठशालाः, आश्रमविद्यालयाः, महाविद्यालयाः च सन्ति। जीवने शिक्षायाः महत्त्वं निर्विवादम्। तस्मात् कारणात् कालान्तरे सः वंचितसमुदायस्य छात्रेभ्यः अनेकान् छात्रावासान् चापि प्रारभयामास। बहवः जना: संस्थाश्च तस्य कल्याणकारीकार्यक्रमेषु सहयोगं दत्तवन्तः। तदनन्तरं शासकीयानुदानेन तानि शिक्षासंस्थानानि गति प्राप्तानि।
निजसमुदायस्य विकासाय त्रिचत्वारिंशतधिकैकोनविंशतिशततमे (1943) खीस्ताब्दे सः गहिराग्रामे सनातनसन्तसमाजनाम संस्थां स्थापयत्। सः वाञ्छति स्म यत् जनाः वैयक्तिकं महत्त्वं विहाय संगठने योजयेयुः।
गुरुमहोदयस्य शिक्षायाः सारः अस्ति—सत्यं, शान्तिः, दया, क्षमा च। ततः सः सात्विकजीवनयापनाय उपदेशं दत्तवान्। जनान् स्वच्छतायाः महत्त्वम् अबोधयत्। तस्य व्यक्तित्वे ईदृशं आकर्षणमासीत् यत् जनाः सहजैव प्रभाविताः संजाताः। उत्तरोत्तरं अनुयायीनाम् अभिवर्धनम् अभवत्। गहिरागुरोः ते अनुयायिनः ग्रामे ग्रामे भ्रमन् तस्य विचारस्य प्रसारं प्रचारञ्च कृतवन्तः।
सप्तचत्वारिशतधिकैकोनविंशतिशततमे (1947) खीस्ताब्दे भारतस्य स्वतंत्रतायाः समये यदा नौवाखलीस्थाने भीषणोपद्रवः अभवत् तदा गहिरागुरु: गान्धिमहोदयेन सह जनान् शांतिव्यवस्थायै न्यवेदयत्। समाजसेवायां तस्य उल्लेखनीययोगदानं नूनं पुरस्करणीयम्।
षडशीत्यधिकसप्ताशीत्यधिकैकोनविंशतिशततमे (1986–87) खीस्ताब्दे सः ‘इन्दिरागाँधीराष्ट्रियसमाजसेवा’ इति पुरस्कारेण सम्मानितः जातः। नवम्बरमासे एकविंशत्यां दिनाङ्के षण्णवत्यधिकैकोनविंशतिशततमे (21 नवम्बर, 1996) खीस्ताब्दे गहिरागुरोः देहावसानं अभवत्। मरणोपरान्ते गुरुमहोदयः मध्यप्रदेशशासनेन ‘बिरसामुण्डाआदिवासीसेवा’ इत्यनेन पुरस्कारेण सम्मानितः जातः। तत्पश्चात् शहीदवीरनारायणसिंहपुरस्कारं च लब्धवान्। तस्य स्मृतौ छत्तीसगढशासनेन गहिरागुरुपर्यावरणं पुरस्कारं उद्घोषितम्।
तथ्यमिदमस्ति यत् जनानां प्रेम स्नेहं च गहिरागुरवे वास्तविकः पुरस्कारः वर्तते। अद्यापि जनाः तम् आदरपूर्वकं स्मरन्ति।
हिन्दी अर्थ (सरल भाषा में)
श्री गहिरा गुरु एक महान समाज सुधारक, दार्शनिक तथा तपस्वी थे। उनका जन्म सन 1905 ई. में रायगढ़ मंडल के अंतर्गत गहिरा ग्राम में हुआ। उनके पिता श्री बुडकी कँवर एक सम्पन्न किसान थे और जनजातीय समुदाय के ग्राम प्रमुख भी थे। उनकी माता का नाम श्रीमती सुमित्रा देवी था। गहिरा गुरु का वास्तविक नाम श्री रामेश्वर कँवर था। अन्य बच्चों की तरह उनका बचपन भी प्रकृति के सान्निध्य में बीता।
किशोरावस्था में रामेश्वर कँवर गंभीर स्वभाव के हो गए। जनजातीय समाज की दयनीय स्थिति को देखकर वे बहुत दुःखी हुए। उन्होंने उन्हें आत्मनिर्भर बनाने के लिए अथक प्रयास किए। एक बार उन्होंने टीपाझरना नामक स्थान पर आठ दिनों तक दिन-रात तपस्या की। वे लोगों को उपदेश दिया करते थे। गहिरा ग्राम में उन्होंने शिव मंदिर का निर्माण भी करवाया। मंदिर प्रांगण में प्रतिदिन कीर्तन होता था। वे रात में भगवान का चिंतन करते हुए वन में इधर-उधर भ्रमण करते थे। कभी-कभी वे समाधि की अवस्था में भी चले जाते थे। धीरे-धीरे लोग उन्हें गहिरा गुरु कहने लगे। उन्होंने जनजातीय समाज का नेतृत्व किया और स्वभाव से ही वे लोगों में लोकप्रिय हो गए।
गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी गहिरा गुरु निरंतर लोक-कल्याण के कार्यों में लगे रहे। उन्होंने अनेक स्थानों पर शिक्षण संस्थानों की स्थापना की। इनमें संस्कृत पाठशालाएँ, आश्रम विद्यालय और महाविद्यालय शामिल थे। जीवन में शिक्षा का महत्व निर्विवाद है, इसी कारण आगे चलकर उन्होंने वंचित समाज के छात्रों के लिए अनेक छात्रावास भी प्रारंभ किए। अनेक व्यक्तियों और संस्थाओं ने उनके कल्याणकारी कार्यों में सहयोग दिया। बाद में सरकारी अनुदान से ये शिक्षण संस्थान उन्नति करने लगे।
अपने समुदाय के विकास के लिए उन्होंने 1943 ई. में गहिरा ग्राम में सनातन सन्त समाज नामक संस्था की स्थापना की। वे चाहते थे कि लोग व्यक्तिगत स्वार्थ छोड़कर संगठन के साथ जुड़ें।
गुरुजी की शिक्षा का सार था—सत्य, शांति, दया और क्षमा। वे सात्त्विक जीवन जीने का उपदेश देते थे। लोगों को स्वच्छता का महत्व समझाते थे। उनके व्यक्तित्व में ऐसा आकर्षण था कि लोग सहज ही उनसे प्रभावित हो जाते थे। धीरे-धीरे उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती गई। उनके अनुयायी गाँव-गाँव घूमकर उनके विचारों का प्रचार-प्रसार करते थे।
1947 ई. में भारत की स्वतंत्रता के समय नौवाखली में भयंकर दंगे हुए। उस समय गहिरा गुरु ने महात्मा गांधी के साथ मिलकर लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की। समाज सेवा में उनका योगदान अत्यंत सराहनीय है।
1986–87 ई. में उन्हें ‘इंदिरा गांधी राष्ट्रीय समाज सेवा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। 21 नवम्बर 1996 को उनका देहावसान हो गया। मृत्यु के बाद मध्यप्रदेश शासन द्वारा उन्हें ‘बिरसा मुंडा आदिवासी सेवा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। इसके बाद उन्हें शहीद वीर नारायण सिंह पुरस्कार भी प्रदान किया गया। उनकी स्मृति में छत्तीसगढ़ शासन ने ‘गहिरा गुरु पर्यावरण पुरस्कार’ की घोषणा की।
यह सत्य है कि लोगों का प्रेम और स्नेह ही गहिरा गुरु के लिए सबसे बड़ा वास्तविक पुरस्कार है। आज भी लोग उन्हें आदरपूर्वक स्मरण करते हैं।
