अलंकार परिचय

जो किसी वस्तु को अलंकृत करे वह अलंकार कहलाता है।

दूसरे अर्थ में-

“काव्य अथवा भाषा को शोभा बनाने वाले मनोरंजक ढंग को अलंकार कहते है।”

अलंकार का शाब्दिक अर्थ

अलंकार का शाब्दिक अर्थ है ‘आभूषण’। 

“जिस प्रकार सुवर्ण आदि के आभूषणों से शरीर की शोभा बढ़ती है उसी प्रकार काव्य-अलंकारों से काव्य की शोभा बढ़ती है।”

  • संस्कृत के अलंकार संप्रदाय के प्रतिष्ठापक आचार्य दण्डी के शब्दों में-

‘काव्य शोभाकरान् धर्मान अलंकारान् प्रचक्षते’

“काव्य के शोभाकारक धर्म (गुण) अलंकार कहलाते हैं।”

अलंकार की व्युत्पत्ति

‘अलंकार’ शब्द ‘अलं+कृ’ के योग से बनता है। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार दी जाती है- अलंकारः, अर्थात जो आभूषित करता हो वह ‘अलंकार’ है। एक मान्यता है कि जिस प्रकार अलंकारों-आभूषणों या गहनों से आभूषित होकर कोई कामिनी अधिक आकर्षक लगती है, उसी प्रकार काव्य भी अलंकारों से आभूषित होकर अत्यधिक आकर्षक हो जाता है। 

अलंकार का महत्त्व

काव्य में अलंकार की महत्ता सिद्ध करने वालों में आचार्य भामह, उद्भट, दंडी और रुद्रट के नाम विशेष प्रख्यात हैं। इन आचार्यों ने काव्य में रस को प्रधानता न दे कर अलंकार की मान्यता दी है।

जब तक हिन्दी में ब्रजभाषा साहित्य का अस्तित्व बना रहा तब तक अलंकार का महत्त्व सुरक्षित रहा। आधुनिक युग में इस दिशा में लोग उदासीन हो गये हैं। काव्य में रमणीय अर्थ, पद-लालित्य, उक्ति-वैचिव्य और असाधारण भाव-सौन्दर्य की सृष्टि अलंकारों के प्रयोग से ही होती है। जिस तरह कामिनी की सौन्दर्य-वृद्धि के लिए आभूषणों की आवश्यकता पड़ती है उसी तरह कविता-कामिनी की सौन्दर्य-श्री में नये चमत्कार और नये निखार लाने के लिए अलंकारों का प्रयोग अनिवार्य हो जाता है। बिना अलंकार के कविता विधवा है। तो अलंकार कविता का श्रृंगार, उसका सौभाग्य है।

संक्षेप में,

      अलंकार कवि को सामान्य व्यक्ति से अलग करता है। जो कलाकार होगा वह जाने या अनजाने में अलंकारों का प्रयोग करेगा ही। इनका प्रयोग केवल कविता तक सीमित नहीं वरन् इनका विस्तार गद्य में भी देखा जा सकता है।

         इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि अलंकार कविता की शोभा और सौन्दर्य है, जो शरीर के साथ भाव को भी रूप की मादकता प्रदान करता है।

अलंकार के भेद

इसके तीन भेद होते है:-

  1. शब्दालंकार
  2. अर्थालंकार
  3. उभयालंकार

शब्दालंकार :-

जिस अलंकार में शब्दों के प्रयोग के कारण कोई चमत्कार उत्पत्र हो जाता है वे ‘शब्दालंकार’ कहलाते है।

शब्द के दो रूप है- ध्वनि और अर्थ।

ध्वनि के आधार पर शब्दालंकार की सृष्टि होती है। इस अलंकार में वर्ण या शब्दों की लयात्मकता या संगीतात्मकता होती है, अर्थ का चमत्कार नहीं।

शब्दालंकार के भेद

इस के प्रमुख भेद है-

(i) अनुप्रास अलंकार (Alliteration)

(ii) यमक अलंकार (Repetition of same word)

(iii) श्लेष अलंकार (Paranomasia)

(iv) वक्रोक्ति अलंकार (The Crooked Speech)

(v) वीप्सा अलंकार (Vipsa Alankar)

(vi) प्रश्न अलंकार (Prshn Alankar)

(i)अनुप्रास अलंकार(Alliteration) :-

यह शब्द ‘अनु’ तथा ‘प्रास’ शब्दों के योग से बना है। ‘अनु’ का अर्थ है :- बार-बार तथा ‘प्रास’ का अर्थ है- वर्ण। जहाँ स्वर की समानता के बिना भी वर्णों की बार-बार आवृत्ति होती है, वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है।

जैसे- मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्र बुलाए।

यहाँ पहले पद में ‘म’ वर्ण की आवृत्ति और दूसरे में ‘स’ वर्ण की आवृत्ति हुई है। इस आवृत्ति से संगीतमयता आ गयी है।

अनुप्रास के प्रकार:-

इसके तीन प्रकार है- (क)छेकानुप्रास (ख) वृत्यनुप्रास (ग) लाटानुप्रास

(क)छेकानुप्रास-

जहाँ स्वरूप और क्रम से अनेक व्यंजनों की आवृत्ति एक बार हो, वहाँ छेकानुप्रास होता है।

महाकवि देव ने इसका एक सुन्दर उदाहरण इस प्रकार दिया है-

रीझि रीझि रहसि रहसि हँसि हँसि उठै

साँसैं भरि आँसू भरि कहत दई दई।

यहाँ ‘रीझि रीझ’, ‘रहसि-रहसि’, ‘हँसि-हँसि’ और ‘दई-दई’ में छेकानुप्रास है, क्योंकि व्यंजनवर्णों की आवृत्ति उसी क्रम और स्वरूप में हुई है।

(ख)वृत्यनुप्रास-

जहाँ एक व्यंजन की आवृत्ति एक या अनेक बार हो, वहाँ वृत्यनुप्रास होता है। रसानुकूल वर्णों की योजना को वृत्ति कहते हैं।

उदाहरण इस प्रकार है-

सेस महेस गनेस दिनेस सुरेसहु जाहि निरन्तर गावैं।

यहाँ ‘स’ वर्ण की आवृत्ति अनेक बार हुई है।

(ग) लाटानुप्रास-

जब एक शब्द या वाक्यखण्ड की आवृत्ति उसी अर्थ में हो, पर तात्पर्य या अन्वय में भेद हो, तो वहाँ ‘लाटानुप्रास’ होता है।

उदाहरण-

वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।

इसमें ‘मनुष्य’ शब्द की आवृत्ति दो बार हुई है। दोनों का अर्थ ‘आदमी’ है। पर तात्पर्य या अन्वय में भेद है। पहला मनुष्य कर्ता है और दूसरा सम्प्रदान।

(ii) यमक अलंकार(Repetition of same word) :-

जिस काव्य में समान शब्द के अलग-अलग अर्थों में आवृत्ति हो, उसे यमक अलंकार कहते हैं।

जैसे-

कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।

वा खाये बौराय नर, वा पाये बौराय।।

यहाँ कनक शब्द की दो बार आवृत्ति हुई है जिसमे एक कनक का अर्थ है- धतूरा और दूसरे का स्वर्ण है।

(iii)श्लेष अलंकार(Paranomasia) :-

‘श्लेष’ का अर्थ होता है- मिला हुआ, चिपका हुआ। जिस शब्द में एकाधिक अर्थ हों, उसे ही श्लेष अलंकार कहते हैं।

श्लेष के भेद

इस के दो भेद होते है- (1) अभंग श्लेष (2) सभंग श्लेष।

अभंग श्लेष में शब्दों को बिना तोड़े अनेक अर्थ निकलते हैं किंतु सभंग श्लेष में शब्दों को तोड़ना आवश्यक हो जाता है। यथा-

अभंग श्लेष-

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून।

पानी गये न ऊबरै, मोती, मानुस, चून।। -रहीम

यहाँ ‘पानी’ अनेकार्थक शब्द है। इसके तीन अर्थ होते हैं- कांति, सम्मान और जल। पानी के ये तीनों अर्थ उपर्युक्त दोहे में हैं और पानी शब्द को बिना तोड़े हैं; इसलिए ‘अभंग श्लेष’ अलंकार हैं।

सभंग श्लेष-

सखर सुकोमल मंजु, दोषरहित दूषण सहित। -तुलसीदास

यहाँ ‘सखर’ का अर्थ कठोर तथा दूसरा अर्थ खरदूषण के साथ (स+खर) है। यह दूसरा अर्थ ‘सखर’ को तोड़कर किया गया है, इसलिए यहाँ ‘सभंग श्लेष’ अलंकार है।

(iv) वक्रोक्ति (The Crooked Speech)-

जिस शब्द से कहने वाले व्यक्ति के कथन का अभिप्रेत अर्थ ग्रहण न कर श्रोता अन्य ही कल्पित या चमत्कारपूर्ण अर्थ लगाये और उसका उत्तर दे, उसे वक्रोक्ति कहते हैं।

‘वक्रोक्ति’ का अर्थ है ‘वक्र उक्ति’ अर्थात ‘टेढ़ी उक्ति’। कहनेवाले का अर्थ कुछ होता है, किन्तु सुननेवाला उससे कुछ दूसरा ही अभिप्राय निकाल लेता है।

रुद्रट ने इसे शब्दालंकार के रूप में स्वीकार कर इसके दो भेद किये है-

(1) श्लेष वक्रोक्ति

(2) काकु वक्रोक्ति

(1) श्लेष वक्रोक्ति-

एक कबूतर देख हाथ में पूछा, कहाँ अपर है ?

उसने कहा, अपर कैसा ? वह तो उड़ गया सपर है।।

नूरजहाँ से जहाँगीर ने पूछा कि ‘अपर’ अर्थात दूसरा कबूतर कहाँ है ? नूरजहाँ ने ‘अपर’ का अर्थ लगाया- ‘पर (पंख) से हीन’ और उत्तर दिया कि वह पर-हीन नहीं था, बल्कि परवाला था, इसलिए तो उड़ गया। यहाँ वक्ता के अभिप्राय से बिल्कुल भित्र अभिप्राय श्रोता के उत्तर में है।

(2)काकु वक्रोक्ति-

कण्ठध्वनि की विशेषता से अन्य अर्थ कल्पित हो जाना ही काकु वक्रोक्ति है।

यहाँ अर्थपरिवर्तन मात्र कण्ठध्वनि के कारण होता है, शब्द के कारण नहीं। अतः यह अर्थालंकार है। किन्तु मम्मट ने इसे कथन-शौली के कारण शब्दालंकार माना है।

काकु वक्रोक्ति का उदाहरण है-

कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावण तोहि समान कोउ नाहीं।

कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत परतिय चोरी।।

-तुलसीदास

(v) वीप्सा अलंकार (Vipsa Alankar):-

आदर, घबराहट, आश्चर्य, घृणा, रोचकता आदि प्रदर्शित करने के लिए किसी शब्द को दुहराना ही वीप्सा अलंकार है।

जैसे-

मधुर-मधुर मेरे दीपक जल।

(vi) प्रश्न अलंकार (Prshn Alankar):-

यदि पद में प्रश्न किया जाय तो उसमें प्रश्न अलंकार होता है।

जैसे-

जीवन क्या है ? निर्झर है।

मस्ती ही इसका पानी है।

अर्थालंकार की परिभाषा:-

जिस अलंकार में अर्थ के प्रयोग करने से कोई चमत्कार उत्पत्र होता है वे अर्थालंकार कहलाते है।

अर्थालंकार के भेद

  • केशव (१६०० ई०) ने ‘कविप्रिया’ में दण्डी (७०० ई०)के आदर्श पर ३५ अर्थलंकार गिनाये हैं।
  • जसवन्तसिंह (१६४३ ई०) ने ‘भाषाभूषण’ में १११अर्थलंकारों की चर्चा की है।
  • दूल्ह (१७४३ ई०) के ‘कविकुलकण्ठाभरण’ जयदेव (१३ वीं शताब्दी) के ‘चन्द्रालोक’ और अप्पय दीक्षित (९७वीं शताब्दी) के ‘कुवलयानन्द’ में ११५ अर्थलंकारों का विवेचन है।

इसके प्रमुख भेद है-

(1)उपमा(Simile)

‘उप’ का अर्थ है- ‘समीप से’ और ‘मा’ का तौलना या देखना।

‘उपमा’ का अर्थ है- एक वस्तु दूसरी वस्तु को रखकर समानता दिखाना। अतः जब दो भिन्न वस्तुओं में समान धर्म के कारण समानता दिखाई जाती है, तब वहाँ उपमा अलंकार होता है।

उपमा के चार अंग होते हैं-

(a) उपमेय– जिसकी उपमा दी जाय, अर्थात जिसकी समता दूसरे पदार्थ से दिखलाई जाय।

जैसे- कर कमल-सा कोमल है। इस उदाहरण में ‘कर’ उपमेय है।

(b) उपमान- जिससे उपमा दी जाय, अर्थात उपमेय को जिसके समान बताया जाय।

उक्त उदाहरण में ‘कमल’ उपमान है।

(c) साधारण धर्म- ‘धर्म’ का अर्थ है ‘प्रकृति’ या ‘गुण’। उपमेय और उपमान में विद्यमान समान गुण को ही साधारण धर्म कहा जाता है।

उक्त उदाहरण में ‘कमल’ और ‘कर’ दोनों के समान धर्म हैं- कोमलता।

(d) वाचक- उपमेय और उपमान के बीच की समानता बताने के लिए जिन वाचक शब्दों का प्रयोग होता है, उन्हें ही वाचक कहा जाता है।

उपर्युक्त उदाहरण में ‘सा’ वाचक है।

(2)रूपक(Metaphor)

जब उपमेय पर उपमान का निषेध-रहित आरोप करते हैं, तब रूपक अलंकार होता है। उपमेय में उपमान के आरोप का अर्थ है- दोनों में अभिन्नता या अभेद दिखाना। इस आरोप में निषेध नहीं होता है।

जैसे- यह जीवन क्या है ? निर्झर है।”

इस उदाहरण में जीवन को निर्झर के समान न बताकर जीवन को ही निर्झर कहा गया है। अतएव, यहाँ रूपक अलंकार हुआ।

(3)उत्प्रेक्षा(Poetic Fancy)

उपमेय में उपमान को प्रबल रूप में कल्पना की आँखों से देखने की प्रक्रिया को उत्प्रेक्षा कहते है।

जहाँ उपमेय में उपमान की संभावना का वर्णन हो, वहाँ उत्प्रेक्षा अलंकार होता है। उत्प्रेक्षा का अर्थ है, किसी वस्तु को सम्भावित रूप में देखना।

उदाहरणार्थ-

फूले कास सकल महि छाई।

जनु बरसा रितु प्रकट बुढ़ाई।।

यहाँ वर्षाऋतु के बाद शरद् के आगमन का वर्णन हुआ है। शरद् में कास के खिले हुए फूल ऐसे मालूम होते है जैसे वर्षाऋतु का बुढ़ापा प्रकट हो गया हो। यहाँ ‘कास के फूल’ (उपमेय) में ‘वर्षाऋतु के बुढ़ापे’ (उपमान ) की सम्भावित कल्पना की गयी है। इस कल्पना से अर्थ का चमत्कार प्रकट होता है। वस्तुतः अन्त में वर्षाऋतु की गति और शक्ति बुढ़ापे की तरह शिथिल पड़ जाती है।

(4)अतिशयोक्ति(Hyperbole)

जहाँ किसी का वर्णन इतना बढ़ा-चढ़ाकर किया जाय कि सीमा या मर्यादा का उल्लंघन हो जाय, वहाँ ‘अतिशयोक्ति अलंकार’ होता है।

उदाहरण-

बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से,

मणिवाले फणियों का मुख, क्यों भरा हुआ हीरों से।

यहाँ मोतियों से भरी हुई प्रिया की माँग का कवि ने वर्णन किया है। विधु या चन्द्र-से मुख का, काली जंजीरों से केश और मणिवाले फणियों से मोती भरी माँग का बोध होता है।

(5)दृष्टान्त(Examplification)

जब दो वाक्यों में दो भिन्न बातें बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से प्रकट की जाती हैं, उसे दृष्टान्त अलंकार कहते हैं।

उदाहरणार्थ-

‘एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं रह सकती हैं,

किसी और पर प्रेम नारियाँ पति का क्या सह सकती हैं ?

यहाँ एक म्यान में दो तलवार रखने और एक दिल में दो नारियों का प्यार बसाने में बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव है। पूर्वार्द्ध का उपमान वाक्य उत्तरार्द्ध के उपमेय वाक्य से सर्वथा स्वतन्त्र है, फिर भी बिम्ब-प्रतिबिम्ब भाव से दोनों वाक्य परस्पर सम्बद्ध हैं। एक के बिना दूसरे का अर्थ स्पष्ट नहीं होता।

(6)उपमेयोपमा

उपमेय और उपमान को परस्पर उपमान और उपमेय बनाने की प्रक्रिया को ‘उपमेयोपमा’ कहते है।

उदाहरणार्थ-

राम के समान शम्भु सम राम है।

यहाँ दो उपमाएँ एक साथ आयी है, पर दोनों उपमाओं के उपमेय और उपमान क्रमशः उपमान और उपमेय में परिवर्तित हो गये है।

(7)प्रतिवस्तूपमा(Typical Comparison)

जहाँ उपमेय और उपमान के पृथक-पृथक वाक्यों में एक ही समानधर्म दो भित्र-भित्र शब्दों द्वारा कहा जाय, वहाँ ‘प्रतिवस्तूपमा अलंकार’ होता है।

उदाहरणार्थ-

सिंहसुता क्या कभी स्यार से प्यार करेगी ?

क्या परनर का हाथ कुलस्त्री कभी धरेगी ?

यहाँ दोनों वाक्यों में पूर्वार्द्ध (उपमानवाक्य) का धर्म ‘प्यार करना’ उत्तरार्द्ध (उपमेय-वाक्य) में ‘हाथ धरना’ के रूप में कथित है। वस्तुतः दोनों का अर्थ एक ही है। एक ही समानधर्म सिर्फ शब्दभेद से दो बार कहा गया है।

(8)अर्थान्तरन्यास(Corroboration)

जब किसी सामान्य कथन से विशेष कथन का अथवा विशेष कथन से सामान्य कथन का समर्थन किया जाय, तो ‘अर्थान्तरन्यास अलंकार’ होता है।

उदाहरणार्थ-

बड़े न हूजे गुनन बिनु, बिरद बड़ाई पाय।

कहत धतूरे सों कनक, गहनो गढ़ो न जाय।

यहाँ सामान्य कथन का समर्थन विशेष बात से किया गया है। पूर्वार्द्ध में सामान्य बात कही गयी है और उसका समर्थन विशेष बात कहकर किया गया है।

(9)काव्यलिंग(Poetical reason)

किसी युक्ति से समर्थित की गयी बात को ‘काव्यलिंग अलंकार’ कहते है।

एक उदाहरण-

कनक कनक ते सौगुनी, मादकता अधिकाय।

उहि खाए बौरात नर, इहि पाए बौराय।

धतूरा खाने से नशा होता है, पर सुवर्ण पाने से ही नशा होता है। यह एक अजीब बात है।

यहाँ इसी बात का समर्थन किया गया है कि सुवर्ण में धतूरे से अधिक मादकता है। दोहे के उत्तरार्द्ध में इस कथन की युक्ति पुष्टि हुई है।

(10)उल्लेख

जहाँ एक वस्तु का वर्णन अनेक प्रकार से किया जाये, वहाँ ‘उल्लेख अलंकार’ होता है।

जैसे-

तू रूप है किरण में, सौन्दर्य है सुमन में,

तू प्राण है पवन में, विस्तार है गगन में।

(11)विरोधाभास(Contradiction)

जहाँ विरोध न होते हुए भी विरोध का आभास दिया जाय, वहाँ ‘विरोधाभास अलंकार’ होता है।

जैसे-

बैन सुन्या जबतें मधुर, तबतें सुनत न बैन।

यहाँ ‘बैन सुन्यों’ और ‘सुनत न बैन’ में विरोध दिखाई पड़ता है। सच तो यह है कि दोनों में वास्तविक विरोध नहीं है। यह विरोध तो प्रेम की तन्मयता का सूचक है।

(12) स्वभावोक्ति अलंकार(Natural Description)

किसी वस्तु के स्वाभाविक वर्णन को ‘स्वभावोक्ति अलंकार’ कहते है। यहाँ सादगी में चमत्कार रहता हैं।

उदाहरण-

चितवनि भोरे भाय की, गोरे मुख मुसकानि।

लगनि लटकि आली गरे, चित खटकति नित आनि।।

नायक नायिका की सखी से कहता है कि उस नायिका की वह भोलेपन की चितवन, वह गोरे मुख की हँसी और वह लटक-लटककर सखी के गले लिपटना- ये चेष्टाएँ नित्य मेरे चित्त में खटका करती हैं। यहाँ नायिका के जिन आंगिक व्यापारों का चित्रण हुआ है, वे सभी स्वाभाविक हैं। कहीं भी अतिशयोक्ति से काम नहीं लिया गया। इसमें वस्तु, दृश्य अथवा व्यक्ति की अवस्थाओं या स्थितियों का यथार्थ अंकन हुआ है।

(13) सन्देह(Doubt)

उपमेय में जब उपमान का संशय हो तब उसे संदेह अलंकार कहते हैं।

जहाँ किसी वस्तु या व्यक्ति को देख कर संशय बना रहें, निश्चय न हो वहाँ सन्देह अलंकार होता है।

इस अलंकार में तीन बातों का होना आवश्यक है-

(क) विषय का अनिश्चित ज्ञान।

(ख) यह अनिश्चित समानता पर निर्भर हो।

(ग) अनिश्चय का चमत्कारपूर्ण वर्णन हो।

उदाहरणार्थ-

यह काया है या शेष उसी की छाया,

क्षण भर उनकी कुछ नहीं समझ में आया। -साकेत

दुबली-पतली उर्मिला को देख कर लक्ष्मण यह निश्चय नहीं कर सके कि यह उर्मिला की काया है या उसका शरीर। यहाँ सन्देह बना है।

(14) मालोपमा (Chain of Similes)

यदि एक वस्तु की अनेक वस्तुओं से उपमा दी जाय तो उसे मालोपमा कहते हैं।

उदाहरण-

सिंहनी-सी काननों में, योगिनी-सी शैलों में,

शफरी-सी जल में, विहंगिनी-सी व्योम में,

जाती अभी और उन्हें खोजकर लाती मैं। -मैथलीशरण गुप्त

एक यशोधरा के लिए सिंहनी, योगिनी, शफरी तथा विहंगिनी- चार उपमान प्रस्तुत किये गये हैं। यहाँ उपमा की माला ही बन गयी है, अतः ‘मालोपमा’ अलंकार है।

(15) अनन्वय (Self Comparison)

एक ही वस्तु को उपमेय और उपमान- दोनों बना देना ‘अनन्वय’ अलंकार कहलाता है

यथा-

निरुपम न उपमा आन राम समानु राम, निगम कहे। -तुलसीदास

यहाँ ‘राम समानु राम’ में उपमेय-उपमान एक ही रहने के कारण अनन्वय अलंकार है।

(16) प्रतीप (Converse)

प्रसिद्ध उपमान को उपमेय बना देना ‘प्रतीप’ अलंकार कहलाता है।

‘प्रतीप’ का अर्थ है ‘उलटा’। मुख के लिए प्रसिद्ध उपमान चाँद है। यदि चाँद को ही उपमेय बनाकर मुख से समता दिखायी जाय तो ‘प्रतीप’ अलंकार हो जाएगा।

उदाहरण-

बिदा किये बहु विनय करि, फिरे पाइ मनकाम।

उतरि नहाये जमुन-जल, जो शरीर सम स्याम।। -तुलसीदास

श्यामल शरीर की उपमा यमुना के नीले जल से दी जाती रही है, किन्तु यहाँ श्रीराम के श्यामल शरीर की तरह यमुना का जल बताया गया है, इसलिए यहाँ ‘प्रतीप’ अलंकार है।

(17) भ्रांतिमान् (Error)

सादृश्य के कारण प्रस्तुत वस्तु मे अप्रस्तुत वस्तु के निश्र्चयात्मक ज्ञान को भ्रांतिमान् कहते हैं

वस्तुतः दो वस्तुओं में इतना सादृश्य रहता है कि स्वाभाविक रूप से भ्रम हो जाता है, एक वस्तु दूसरी वस्तु समझ ली जाती है।

उदाहरण-

पायँ महावर दैन को, नाइन बैठी आय।

फिरि-फिरि जानि महावरी, ऐंड़ी मींड़ति जाय।। -बिहारी

नाइन नायिका की एड़ी को अत्यंत लाली के कारण महावर की गोली समझकर बार-बार उसी को (एड़ी को) मलती जाती है। अतः यहाँ ‘भ्रान्तिमान’ अलंकार है।

(18) अपह्नुति (Concealment)

उपमेय पर उपमान का निषेध-रहित आरोप अपह्नुति अलंकार कहा जाता है।

‘अपह्नुति’ का अर्थ है ‘छिपाना’। यदि कहें कि ‘यह मुख नहीं, चंद्र है’ तो अपह्नुति हो जाएगी

उदाहरण-

नहिं पलास के पुहुप ये, हैं ये जरत अँगार।

यहाँ पलाश-पुष्प का निषेध कर जलते अंगार की स्थापना की गयी है, इसलिए ‘अपह्नुति’ अलंकार है।

(19) दीपक (Illuminater)

जहाँ प्रस्तुत और अप्रस्तुत में एकधर्मसंबंध वर्णित हो वहाँ दीपक अलंकार होता है

जिस प्रकार दीपक जलकर घर-बाहर सर्वत्र प्रकाश फैलाता है, उसी प्रकार दीपक अलंकार निकटस्थ पदार्थों एवं दूरस्थ पदार्थों का एकधर्म-संबंध वर्णित करता है।

उदाहरण-

सुर महिसुर हरिजन अस गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।। -तुलसीदास

यहाँ महिसुर एक प्रस्तुत तथा सुर, हरिजन तथा गाय अनेक प्रस्तुतों का ‘सुराई’ रूप एकधर्म-संबंध वर्णित हुआ है, इसलिए ‘दीपक’ अलंकार है।

(20) तुल्योगिता (Equal Pairing)

जहाँ अनेक प्रस्तुतों अथवा अप्रस्तुतों का एकधर्म-संबंध वर्णित हो वहाँ ‘तुल्योगिता’ अलंकार होता है।

उदाहरण-

रूप-सुधा-आसव छक्यो, आसव पियत बनै न।

प्याले ओठ, प्रिया-बदन, रह्मो लगाए नैन।। -अज्ञात

‘प्याले का ओठ’ तथा ‘नयन का प्रिया-बदन’-दोनों प्रस्तुतों का एकधर्म ‘लगाए रह्मो’ से संबंध वर्णित होना ‘तुल्योगिता’ अलंकार है।

(21) निदर्शना (Illustration)

जहाँ वस्तुओं का पारस्परिक संबंध संभव अथवा असंभव होकर सदृशता का आधान करे, वहाँ निदर्शना अलंकार होता है।

उदाहरण-

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई। जे सुख चाहहिं आन उपाई।

ते सठ महासिंधु बिन तरनी। पैरि पार चाहहिं जड़ करनी।।

महासिंधु का तैर कर पार जाना जिस प्रकार असंभव है उसी प्रकार हरि भक्ति के बिना सुख पाना भी असंभव है। यहाँ दो वाक्यों का सादृश्य दिलाया गया है, इसलिए ‘निदर्शना’ अलंकार है।

(22) समासोक्ति (Speech of Brevity)

जहाँ प्रस्तुत के वर्णन में अप्रस्तुत की प्रतीति हो वहाँ समासोक्ति अलंकार होता है।

उदाहरण-

जग के दुख दैन्य शयन पर यह रुग्णा जीवन-बाला।

रे कब से जाग रही वह आँसू की नीरव माला।

पीली पर निर्बल कोमल कृश देहलता कुम्हलाई।

विवसना लाज में लिपटी साँसों में शून्य समाई।। -सुमित्रानंदन पंत

यहाँ लिंगसाम्य के कारण निष्प्रभ चाँदनी के वर्णन से बीमार बालिका की प्रतीति हो रही है, अतः यहाँ ‘समासोक्ति’ अलंकार है।

(23) अप्रस्तुतप्रशंसा (Indirect Discetion)

जहाँ अप्रस्तुत के वर्णन में प्रस्तुत की प्रतीति हो, वहाँ ‘अप्रस्तुतप्रशंसा’ अलंकार होता है (अप्रस्तुतात् प्रस्तुत-प्रतीति: अप्रस्तुतप्रशंसो)। अप्रस्तुत प्रशंसा का अर्थ है- अप्रस्तुत कथन।

उदाहरण-

क्षमा शोभती उस भुजंग को

जिसके पास गरल हो।

उसको क्या जो दंतहीन,

विषरहित, विनीत, सरल हो।

यहाँ अपस्तुत सर्प के विशेष वर्णन से सामान्य अर्थ की प्रतीति होती है कि शक्तिशाली पुरुष को ही क्षमादान शोभता है। यहाँ ‘ अप्रस्तुतप्रशंसा’ है।

(24) विभावना (Peculiar Causation)

कारण के अभाव में जहाँ कार्योत्पत्ति का वर्णन किया जाय वहाँ ‘विभावना’ अलंकार है

उदाहरण-

बिनु पद चलै सुनै बिनु काना।

कर बिनु कर्म करै बिधि नाना।।

आनन रहित सकल रसभोगी।

बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।

यहाँ पैर (कारण) के अभाव में चलना (कार्य), हाथ (कारण) के अभाव में करना (कार्य), मुख (कारण) के अभाव में रसभोग (कार्य) आदि वर्णित किये गये हैं, इसलिए ‘विभावना’ अलंकार है।

(25) विशेषोक्ति (Peculiar Allegation)

कारण के रहते हुए कार्य का न होना ‘विशेषोक्ति’ अलंकार है.

‘विशेषोक्ति’ का अर्थ है ‘विशेष उक्ति’। कारण के रहने पर कार्य होता है, किंतु कारण के रहने पर भी कार्य न होने में ही विशेष उक्ति है।

उदाहरण-

सोवत जागत सपन बस, रस रिस चैन कुचैन।

सुरति श्याम घन की सुरति, बिसराये बिसरै न।।

यहाँ भुलाने के साधनों (कारणों) के होने पर भी न भुला पाने (कार्य न होने) में ‘विशेषोक्त’ अलंकार है।

(26) असंगति (Disconnection)

जहाँ कारण कहीं और कार्य कहीं होने का वर्णन किया जाय वहाँ ‘असंगति’ अलंकार होता है.

उदाहरण-

तुमने पैरों में लगाई मेंहदी

मेरी आँखों में समाई मेंहदी। -अज्ञात

मेंहदी लगाने का काम पाँव में हुआ, किंतु उसका परिणाम आँखों में दृष्टिगत हो रहा है। इसलिए यहाँ ‘असंगति’ अलंकार है।

(27) परिसंख्या (Special mention)

एक वस्तु की अनेकत्र संभावना होने पर भी, उसका अन्यत्र निषेध कर, एक स्थान में नियमन ‘परिसंख्या’ अलंकार कहलाता है

उदाहरण-

दंड जतिन कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।

ज़ीतौ मनसिज सुनिय अस रामचंद्र के राज।।

‘दंड’, ‘भेद’, ‘जीत’ का अन्य जगहों से निषेध कर ‘जतिनकर’, ‘नर्तक नृत्य समाज’ ‘मनसिज’ में नियमन करना परिसंख्या है।

उभयालंकार की परिभाषा:-

जो अलंकार शब्द और अर्थ दोनों पर आश्रित रहकर दोनों को चमत्कृत करते है, वे ‘उभयालंकार’ कहलाते है।

उदाहरण-

‘कजरारी अंखियन में कजरारी न लखाय।’

इस अलंकार में शब्द और अर्थ दोनों है।

उभयालंकार के प्रकार

(1) संसृष्टि (Combinationof Figures of Speech)-

तिल-तंडुल-न्याय से परस्पर-निरपेक्ष अनेक अलंकारों की स्थिति ‘संसृष्टि’ अलंकार है

जैसे- तिल और तंडुल (चावल) मिलकर भी पृथक् दिखाई पड़ते हैं, उसी प्रकार संसृष्टि अलंकार में कई अलंकार मिले रहते हैं, किंतु उनकी पहचान में किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती।

उदाहरण लें-

भूपति भवनु सुभायँ सुहावा। सुरपति सदनु न परतर पावा।

मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ सँवारे।।

(2) संकर (Fusion of Figures of Speech)-

नीर-क्षीर-न्याय से परस्पर मिश्रित अलंकार ‘संकर’ अलंकार कहलाता है।

जैसे- नीर-क्षीर अर्थात पानी और दूध मिलकर एक हो जाते हैं, वैसे ही संकर अलंकार में कई अलंकार इस प्रकार मिल जाते हैं जिनका पृथक्क़रण संभव नहीं होता।

उदाहरण-

सठ सुधरहिं सत संगति पाई। पारस-परस कुधातु सुहाई। -तुलसीदास

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