अतीत में दबे पाँव : ओम थानवी

अतीत में दबे पाँव पाठ का सार (Ateet Mein Dabe Paon Summary) 

“अतीत में दबे पाँव” के लेखक ओम थानवी जी हैं, जिन्होंने इस पाठ में सिंधु घाटी सभ्यता के एक महत्वपूर्ण स्थल “मोहनजोदड़ो” की अपनी यात्रा का वर्णन किया हैं।
सिंधु घाटी सभ्यता को लगभग 5,000 साल पुरानी सभ्यता माना जाता हैं। मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा केवल प्राचीन भारत के ही नहीं, बल्कि दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। कई जगहों पर खुदाई में और भी शहर भी मिले हैं। परन्तु मुअनजो-दड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। इसकी व्यापक खुदाई में बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित भांडे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि मिले है।
मुअनजो-दड़ो के बारे में यह धारणा है कि अपने समय में वह घाटी की सभ्यता का केंद्र रहा होगा। इसके बारे में कहा जाता है यह शहर दो सौ हैक्टर क्षेत्र में फैला था और इसकी आबादी कोई पचासी हज़ार थी। सबसे दिलचस्प बात जो सामने आई है कि सिंधु घाटी मैदान की संस्कृति थी, परन्तु पूरा मुअनजो-दड़ो छोटे-मोटे टीलों पर आबाद था। इन टीलों को कच्ची और पक्की दोनों तरह की ईंटों से धरती की सतह को ऊँचा उठाया गया था, ताकि यदि कभी सिंधु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके।
मुअनजो-दड़ो की खूबी यह है कि इस अत्यधिक पुराने शहर की सड़कों और गलियों में आज भी घुमा जा सकता हैं। यहाँ की सभ्यता और संस्कृति का प्राचीन सामान आज भले ही अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, परन्तु शहर जहाँ था अब भी वहीं है। भले ही यह एक खंडहर क्यों न हो, परन्तु इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर आप सहसा सहम सकते हैं, रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं। या शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान लगाकर उस बैलगाड़ी की रुन-झुन सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्त्व की तसवीरों में मिट्टी के रंग में देखा है। यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब आपको कहीं नहीं ले जातीं; वे आकाश की तरफ अधूरी रह जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वहाँ की सीढ़ियाँ तो सलामत है परन्तु उन सीढ़ियों के द्वारा जिस दूसरी मंजिल पर जाया जाए वो दूसरी मंजिल नहीं है। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं; वहाँ से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झाँक रहे हैं। अर्थात आप सबूतों के द्वारा इतिहास को जान सकते हो परन्तु यहाँ के प्रत्यक्ष साक्ष्यों को देख कर आप इतिहास के उस पन्ने को लिखते हो जिसके साबुत नहीं हैं।
इसके सबसे ऊँचे चबूतरे पर बड़ा बौद्ध स्तूप है। यह बौद्ध स्तूप पचीस फुट ऊँचे चबूतरे पर छब्बीस सदी पहले बनी ईंटों के दम पर बनाया गया है। चबूतरे पर भिक्षुओं के कमरे भी हैं। 1922 में जब राखालदास बनर्जी यहाँ आए, तब वे इसी स्तूप की खोजबीन करना चाहते थे। इसके इर्द-गिर्द जब उन्होंने खुदाई शुरू की  तो उन्होंने पाया कि यहाँ ईसा पूर्व के निशान हैं। जब भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देश पर खुदाई का व्यापक अभियान शुरू हुआ तो यह खोज विशेषज्ञों को सिंधु घाटी सभ्यता की देहरी पर ले आई। इस खोज से दुनिया की प्राचीन सभ्यता होने के भारत के दावे को पुरातत्त्व का वैज्ञानिक आधार मिल गया। इस स्तूप को नागर भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप कहा गया है।
लेखक को यह इलाका राजस्थान से बहुत मिलता-जुलता लगा। यहाँ केवल रेत के टीले की जगह खेतों का हरापन है। बाकी यहाँ वही खुला आकाश, सूना परिवेश; धूल, बबूल और ज़्यादा ठंड, ज़्यादा गरमी। परन्तु यहाँ की धूप का मिजाज़ राजस्थान की धुप से अलग है। राजस्थान की धूप पारदर्शी है। सिंध की धूप चौंधियाती है।
स्तूप वाला चबूतरा मुअनजो-दड़ो के सबसे खास हिस्से के एक सिरे पर स्थित है। इस हिस्से को पुरातत्त्व के विद्वान ‘गढ़’ कहते हैं। चारदीवारी के भीतर ऐतिहासिक शहरों के सत्ता-केंद्र अवस्थित होते थे, चाहे वह राजसत्ता हो या धर्मसत्ता। बाकी शहर गढ़ से कुछ दूर बसे होते थे। यह सब देखकर एक प्रश्न यह उठता है कि क्या यह रास्ता भी दुनिया को मुअनजो-दड़ो ने दिखाया?
सभी अहम और अब दुनिया-भर में प्रसिद्ध इमारतों के खंडहर चबूतरे के पीछे यानी पश्चिम में हैं। इनमें ‘प्रशासनिक’ इमारतें, सभा भवन, ज्ञानशाला और कोठार हैं। वह अनुष्ठानिक महाकुंड भी जो सिंधु घाटी सभ्यता के अद्वितीय वास्तुकौशल को स्थापित करने के लिए अकेला ही काफी माना जाता है। असल में यहाँ यही एक निर्माण है जो अपने मूल स्वरूप के बहुत नज़दीक बचा रह सका है। बाकी इमारतें इतनी उजड़ी हुई हैं कि कल्पना और बरामद चीजों के जोड़ से उनके उपयोग का अंदाज़ा भर लगाया जा सकता है। कहने का अर्थ यह है कि मुअनजो-दड़ो के सभी खंडहरों और खुदाई में मिली चीजों को जोड़-जोड़ कर उन खंडहरों और चीजों के इस्तेमाल का केवल हम अंदाजा मात्र लगा सकते हैं। हमें नहीं पता कि हम कहाँ तक मुअनजो-दड़ो के इतिहास को सही से जान पाए हैं।
नगर नियोजन को मुअनजो-दड़ो की अनूठी मिसाल के तौर पर समझा जाता है। क्योंकि यहाँ की इमारतें भले ही खंडहरों में बदल चुकी हों मगर ‘शहर’ की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफी हैं। यहाँ की कमोबेश सारी सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। आज वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आज की सेक्टर-मार्का कॉलोनियों में हमें आड़ा-सीधा ‘नियोजन’ बहुत मिलता है।
मुअनजो-दड़ो की साक्षर सभ्यता एक सुसंस्कृत समाज की स्थापना थी, लेकिन उसमें नगर नियोजन और वस्तुकला की आखिर कितनी भूमिका थी?
स्तूप वाले चबूतरे के पीछे ‘गढ़’ और ठीक सामने ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती है। उसके पीछे पाँच किलोमीटर दूर सिंधु नदी बहती है। पूरब की इस बस्ती से दक्षिण की तरफ नज़र दौड़ाते हुए पूरा पीछे घूम जाएँ तो मुअनजो-दड़ो के खंडहर हर जगह दिखाई देते हैं। दक्षिण में जो टूटे-फूटे घरों का जमघट है, वह कामगारों की बस्ती है। हर संपन्न समाज में वर्ग तो होते हु हैं और संभव है कि मुअनजो-दड़ो में भी होंगे। लेकिन क्या मुअनजो-दड़ो में निम्न वर्ग नहीं था? क्योंकि विशेषज्ञों की माने तो निम्न वर्ग के घर इतनी मज़बूत सामग्री के नहीं रहे होंगे कि पाँच हज़ार साल टिक सकें। और संभव है कि उनकी बस्तियाँ ‘गढ़’ और ‘उच्च’ वर्ग की बस्तियों से और दूर रही होंगी। इन सब का केवल अंदाजा इसलिए लगाया गया है क्योंकि सौ साल में अब तक इस इलाके के केवल एक-तिहाई हिस्से की खुदाई ही हो पाई है। अब वह भी कुछ कारणों के कारण बंद हो चुकी है। और जिन इलाकों की खुदाई हुई है उनमें ‘गढ़’ और ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती के अवशेष ही मिले हैं।
स्तूप के टीले से दाईं तरफ एक लंबी गली दीखती है। इसके आगे महाकुंड है। धरोहर के प्रबंधकों ने उस गली का नाम दैव मार्ग (डिविनिटि स्ट्रीट) रखा है। विशेषज्ञों की माने तो उस सभ्यता में सामूहिक स्नान किसी अनुष्ठान का अंग होता था। कुंड करीब चालीस फुट लंबा और पच्चीस फुट चौड़ा है। गहराई सात फुट। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। इसके तीन तरफ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में दो पाँत में आठ स्नानघर हैं। इनमें किसी भी स्नानघर का द्वार दूसरे स्नानघर के सामने नहीं खुलता। यह एक सिद्ध वास्तुकला का नमूना है। इस कुंड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है। कुंड का पानी रिस न सके और बाहर का ‘अशुद्ध’ पानी कुंड में न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है। पार्श्व की दीवारों के साथ दूसरी दीवार खड़ी की गई है जिसमें सफेद डामर का प्रयोग है। कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ कुआँ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। इसे भी कुंड के पवित्र या अनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। कुंड से पानी को बाहर बहाने के लिए नालियाँ हैं। इनकी खासियत यह है कि ये भी पक्की ईंटों से बनी हैं और ईंटों से ढकी भी हैं।
पक्की और आकार में एक समान धूसर ईंटें तो सिंधु घाटी सभ्यता की विशिष्ट पहचान मानी ही गई हैं, साथ ही पुरातात्त्विक विद्वान और इतिहासकार ढकी हुई नालियों का उल्लेख भी इस घाटी की पहचान के रूप में देते हैं। पानी-निकासी का ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले के इतिहास में कहीं नहीं मिलता।
कुंड के दूसरी तरफ विशाल कोठार है। इन कोठारों में शायद कर के रूप में हासिल अनाज जमा किया जाता था। यह अंदाजा इसके निर्माण रूप को खासकर चौकियों और हवादारी को देखकर लगाया गया है। यहाँ नौ-नौ चौकियों की तीन कतारें हैं। उत्तर में एक गली है जहाँ से बैलगाड़ियों में इस अनाज की लाया या लेजाया जाता होगा। बैलगाड़ियों के प्रयोग के साक्ष्य सिंधु घाटी सभ्यता में मिले हैं।
सिंधु घाटी के दौर में व्यापार ही नहीं, उन्नत खेती भी होती थी। परन्तु कई वर्षों तक यह माना जाता रहा कि सिंधु घाटी के लोग अन्न नहीं उगाते थे, बल्कि दूसरी जगह से उसका आयात करते थे। परन्तु नयी खोज ने इस खयाल को निर्मूल साबित किया है। बल्कि अब कुछ विद्वान मानते हैं कि सिंधु घाटी मूलतः खेतिहर और पशुपालक सभ्यता ही थी। वहाँ लोहा शुरू में नहीं था पर पत्थर और ताँबे की बहुतायत थी। पत्थर सिंध में ही था, ताँबे की खानें राजस्थान में थीं। इतिहासकार इरफान हबीब के मुताबिक यहाँ के लोग रबी की फसल लेते थे। कपास, गेहूँ, जौ, सरसों और चने की उपज के पुख्ता सबूत खुदाई में मिले हैं। वह सभ्यता का तर-युग था जो धीमे-धीमे सूखे में ढल गया। विद्वानों का मानना है कि यहाँ ज्वार, बाजरा और रागी की उपज भी होती थी। लोग खजूर, खरबूज़े और अंगूर उगाते थे। झाड़ियों से बेर जमा करते थे। कपास की खेती भी होती थी। कपास को छोड़कर बाकी सबके बीज मिले हैं और उन्हें परखा भी गया है। कपास की खेती का अंदाजा वहाँ पर सूती कपड़ा मिलने से किया गया है। ये दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है। दूसरा सूती कपड़ा तीन हज़ार ईसा पूर्व का है जो जॉर्डन में मिला।
महाकुंड के उत्तर-पूर्व में एक बहुत लंबी-सी इमारत के अवशेष हैं। इसके बीचों बीच खुला बड़ा दालान है। तीन तरफ बरामदे हैं। इनके साथ कभी छोटे-छोटे कमरे रहे होंगे। पुरातत्त्व के जानकार कहते हैं कि धार्मिक अनुषनों में ज्ञानशालाएँ सटी हुई होती थीं, उस नज़रिए से इसे ‘कॉलेज ऑफ प्रीस्ट्स’ माना जा सकता है। दक्षिण में एक और टूटी इमारत है। इसमें बीस खंभों वाला एक बड़ा हॉल है। अनुमान लगाया गया है कि यह राज्य सचिवालय, सभा-भवन या कोई सामुदायिक केंद्र रहा होगा।
पूरब की बस्ती ‘रईसों की बस्ती’ है। हालाँकि आज के युग में पूरब की बस्तियाँ गरीबों की बस्तियाँ मानी जाती हैं। मुअनजो-दड़ो इसका उलट था। यानी बड़े घर, चौड़ी सड़कें, ज्यादा कुएँ। मुअनजो-दड़ो के सभी खंडहरों को खुदाई कराने वाले पुरातत्त्ववेत्ताओं का संक्षिप्त नाम दे दिया गया है। जैसे ‘डीके’ हलका-दीक्षित काशीनाथ की खुदाई। उनके नाम पर यहाँ दो हलके हैं। ‘डीके’ क्षेत्र दोनों बस्तियों में सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। शहर की मुख्य सड़क (फर्स्ट स्ट्रीट) यहीं पर है। यह बहुत लंबी सड़क है, मानो कभी पूरे शहर को नापती हो। अब यह आधा मील बची है। इसकी चौड़ाई तैंतीस फुट है। मुअनजो-दड़ो से तीन तरह के वाहनों के साक्ष्य मिले हैं। इनमें सबसे चौड़ी बैलगाड़ी रही होगी। इस सड़क पर दो बैलगाड़ियाँ एक साथ आसानी से आ-जा सकती हैं। यह सड़क वहाँ पहुँचती है, जहाँ कभी ‘बाज़ार’ था।
मुअनजो-दड़ो में इमारतों से पहले जो चीज़ दूर से ध्यान खींचती है, वह है कुओं का प्रबंध। ये कुएँ भी पकी हुई एक ही आकार की ईंटों से बने हैं। इतिहासकार कहते हैं सिंधु घाटी सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है जो कुएँ खोद कर भू-जल तक पहुँची। उनके मुताबिक केवल मुअनजो-दड़ो में सात सौ के करीब कुएँ थे। नदी, कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ पानी-निकासी। इन सभी को देखते हुए विशेषज्ञ प्रश्न करते हैं कि क्या सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कह सकते हैं?
बड़ी बस्ती में पुरातत्त्वशास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर एक हलका ‘डीके-जी’ कहलाता है। इसके घरों की दीवारें ऊँची और मोटी हैं। मोटी दीवार का अर्थ यह लगाया जाता है कि उस पर दूसरी मंजिल भी रही होगी। सभी घर ईंट के हैं। सभी भट्टी में पकी हुईं एक ही आकार की ईंटें-1ः2ः4 के अनुपात की हैं। इन घरों में दिलचस्प बात यह है कि सामने की दीवार में केवल प्रवेश द्वार बना है, कोई खिड़की नहीं है। खिड़कियाँ शायद ऊपर की दीवार में रहती हों, यानी दूसरी मंजिल पर। हालाँकि सभी घर खंडहर हैं और दिखाई देने वाली चीजों से हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं।
डीके-बी, सी हलका आगे पूरब में है। दाढ़ी वाले ‘याजक-नरेश’ की मूर्ति इसी तरफ के एक घर से मिली थी। प्रसिद्ध ‘नर्तकी’ शिल्प भी यहीं एक छोटे घर की खुदाई में निकला था। इसके बारे में पुरातत्त्वविद मार्टिमर वीलर ने कहा था कि संसार में इसके जोड़ की दूसरी चीज़ शायद ही होगी। यह मूर्ति अब दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में है।
मुअनजो-दड़ो में कुँओं को छोड़कर लगता है जैसे सब कुछ चौकोर या आयताकार हो। नगर की योजना, बस्तियाँ, घर, कुंड, बड़ी इमारतें, ठप्पेदार मुहरें, चौपड़ का खेल, गोटियाँ, तौलने के बाट आदि सब कुछ। छोटे घरों में छोटे कमरे समझ में आते हैं। पर बड़े घरों में छोटे कमरे देखकर थोड़ी हैरानी होती है। इसका एक अर्थ तो यह लगाया गया है कि शहर की आबादी काफी रही होगी। और दूसरी तरफ यह विचार सामने आया है कि बड़े घरों में निचली(भूतल) मंजिल में नौकर-चाकर रहते होंगे। बड़े घरों के आँगन में चौड़ी सीढ़ियाँ हैं। कुछ घरों में ऊपर की मंजिल के निशान हैं, पर सीढ़ियाँ नहीं हैं। शायद यहाँ लकड़ी की सीढ़ियाँ रही हों, जो समय के साथ नष्ट हो गईं हो। कुछ घरों में बाहर की तरफ सीढ़ियों के संकेत हैं। यहाँ शायद ऊपर और नीचे अलग-अलग परिवार रहते होंगे। छोटे घरों की बस्ती में छोटी संकरी सीढ़ियाँ हैं। उनके पायदान भी ऊँचे हैं। ऐसा जगह की तंगी की वजह से होता होगा।
मुअनजो-दड़ो के किसी घर में खिड़कियों या दरवाजों पर छज्जों के चिह्न नहीं हैं। अक्सर गरम इलाकों के घरों में छाया के लिए यह आम प्रावधान होता है। इससे यह अंदाजा लगाया गया कि उस वक्त यहाँ इतनी कड़ी धूप नहीं पड़ती होगी। मुअनजो-दड़ो की जानी-मानी मुहरों के पशुयों के चिह्न है जैसे शेर, हाथी या गैंडा। इस मरु-भूमि में ऐसे जानवर नहीं रह सकते। इससे यह अंदाजा लगाया गया कि उस वक्त यहाँ जंगल भी रहे होंगे। इन सभी तथ्यों से स्थापित हो चुका है कि यहाँ अच्छी खेती होती थी। पुरातत्त्वी शीरीन रत्नागर का मानना है कि सिंधु-वासी कुँओं से सिंचाई कर लेते थे। परन्तु मुअनजो-दड़ो की किसी खुदाई में नहर होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। तो यह संभव है कि बारिश उस काल में काफी होती होगी। इन सभी से यह भी अंदाजा लगाया गया कि हो सकता है बारिश घटने और कुँओं के अत्यधिक इस्तेमाल से भू-तल जल पहुँच से दूर चला गया और पानी के अभाव में यह इलाका उजड़ा और उसके साथ सिंधु घाटी की समृद्ध सभ्यता का भी पतन हो गया।
मुअनजो-दड़ो की गलियों या घरों में लेखक को राजस्थान का खयाल आ गया। क्योंकि (पश्चिमी) राजस्थान और सिंध-गुजरात की दृश्यावली एक-सी है। और भी कई चीजें हैं जो मुअनजो-दड़ो को राजस्थान से जोड़ जाती हैं। जैसे हजारों साल पुराने यहाँ के खेत। बाजरे और ज्वार की खेती। मुअनजो-दड़ो के घरों में टहलते हुए लेखक को कुलधरा की याद आई। क्योंकि वहाँ भी गाँव में घर हैं, पर लोग नहीं हैं। कोई डेढ़ सौ साल पहले राजा से तकरार पर स्वाभिमानी गाँव का हर बाशिंदा रातोंरात अपना घर छोड़ चला गया। घर खंडहर हो गए पर ढहे नहीं। घरों की दीवारें, प्रवेश और खिड़कियाँ ऐसी हैं जैसे कल की बात हो। लोग निकल गए, वक्त वहीं रह गया। खंडहरों ने उसे थाम लिया। जैसे सुबह लोग घरों से निकले हों, शायद शाम ढले लौट आने वाले हों। राजस्थान ही नहीं, गुजरात, पंजाब और हरियाणा में भी कुएँ, कुंड, गली-कूचे, कच्ची-पक्की ईंटों के कई घर भी आज वैसे मिलते हैं जैसे हजारों साल पहले हुए।
मुअनजो-दड़ो की खुदाई में निकली पंजीकृत चीजों की संख्या पचास हजार से ज्यादा है। मगर जो मुट्ठी भर चीजें अजायबघर में प्रदर्शित हैं, पहुँची हुई सिंधु सभ्यता की झलक दिखाने को काफी हैं। काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, चाक पर बने विशाल मृद्-भांड, उन पर काले-भूरे चित्र, चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटन वाली चक्की, कंघी, मिट्टी के कंगन, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हार और पत्थर के औजार। अजायबघर में प्रदर्शित चीजों में औजार तो हैं, पर हथियार कोई नहीं है। मुअनजो-दड़ो क्या, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले हैं जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। इस बात को लेकर विद्वान सिंधु सभ्यता में शासन या सामाजिक प्रबंध के तौर-तरीके को समझने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि वहाँ कोई अनुशासन तो ज़रूर था, पर वो अनुशासन ताकत के बल पर नहीं था। वे मानते हैं कोई सैन्य सत्ता शायद यहाँ न रही हो। मगर कोई अनुशासन ज़रूर था जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ-सफाई जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं आदि में एकरूपता तक को कायम रखे हुए था।
दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर। न राजाओं, महंतों की समाधियाँ। यहाँ के मूर्तिशिल्प छोटे हैं और औजार भी। मुअनजो-दड़ो के ‘नरेश’ के सिर पर जो ‘मुकुट’ है, शायद उससे छोटे सिरपेंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती। और तो और, उन लोगों की नावें बनावट में मिस्र की नावों जैसी होते हुए भी आकार में छोटी रहीं। आज के मुहावरे में कह सकते हैं वह ‘लो-प्रोफाइल’ सभ्यता थी; लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति।
मुअनजो-दड़ो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा शहर ही नहीं बल्कि साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए सबसे समृद्ध भी माना गया है। फिर भी इसकी संपन्नता की बात बहुत कम हुई है वह इसलिए क्योंकि उसमें भव्यता का आडंबर नहीं है।
सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है। एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है, “जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।” शायद इसीलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है।
अजायबघर में रखी चीजों में कुछ सुइयाँ भी हैं। खुदाई में ताँबे और काँसे की तो बहुत सारी सुइयाँ मिली थीं। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयाँ मिलीं जिनमें एक दो-इंच लंबी थी। उन्हें देखकर यह समझा गया है कि यह बारीक कशीदेकारी में काम आती होगी। नर्तकी के अलावा मुअनजो-दड़ो के नाम से प्रसिद्ध जो दाढ़ी वाले ‘नरेश’ की मूर्ति है, उसके बदन पर आकर्षक गुलकारी वाला दुशाला भी है। आज छापे वाला कपड़ा ‘अजरक’ सिंध की खास पहचान बन गया है, पर कपड़ों पर छपाई का आविष्कार बहुत बाद का है। खुदाई में सुइयों के अलावा हाथीदाँत और ताँबे के सुए भी मिले हैं। जानकार मानते हैं कि इनसे शायद दरियाँ बुनी जाती थीं। परन्तु दरी का कोई नमूना या साक्ष्य खुदाई में हासिल नहीं हुआ है। और वह शायद कभी हासिल भी न हो, क्योंकि मुअनजो-दड़ो में अब खुदाई बंद कर दी गई है। क्योंकि सिंधु के पानी के रिसाव से क्षार और दलदल की समस्या पैदा हो गई है। जिससे मौजूदा खंडहरों को बचाकर रखना ही अब अपने आप में बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि खुदाई को बंद कर दिया गया है और सिंधु सभ्यता के कई राज अभी भी दफ़न है जो शायद हमेशा दफ़न ही रहेंगे और उनके बारे में केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं।

प्रश्न 1 – सिंधु सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था, कैसे?
उत्तर – इसमें कोई दोराहे नहीं है कि सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी। क्योंकि सिंधु सभ्यता के शहर मुअनजो-दड़ो की व्यवस्था, साधन और नियोजन एक अद्धभुत व् रोचक विषय रहा है। यह बात सभी को आश्चयचकित कर देती हैं कि वहाँ पर अन्न-भंडारण व्यवस्था, जल-निकासी की व्यवस्था अत्यंत विकसित और परिपक्व थी। वहाँ पर हर निर्माण बड़ी ही बुद्धमानी के साथ किया गया था, इसका उदाहरण हम जल-निकासी की व्यवस्था से ले सकते हैं कि यदि सिंधु नदी का जल बस्ती तक आ भी जाए तो उससे बस्ती को कम-से-कम नुकसान हो। सिंधु सभ्यता की सारी व्यवस्थाओं के बीच भी इस सभ्यता की संपन्नता की बात बहुत ही कम हुई है। क्योंकि इनमें अन्य सभ्यताओं की तरह भव्यता का आडंबर नहीं है। इस सभ्यता में व्यापारिक व्यवस्थाओं की जानकारी तो मिलती है, मगर अब तक की जानकारियों में सब कुछ आवश्यकताओं से ही जुड़ा हुआ पाया गया है, भव्यता के लिए कोई व्यापारिक सम्बन्ध कहीं नहीं मिलता। हो सकता है कि यदि सिंधु सभ्यता की लिपि पढ़ ली जाए तो उसके बाद इस विषय में कुछ और अधिक महत्वपूर्ण जानकारी मिले।

प्रश्न 2 – ‘सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।’ ऐसा क्यों कहा गया?
उत्तर – सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है। एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है, “जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।” शायद इसीलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है। खुदाई के दौरान जो भी वस्तुएँ मिलीं या फिर जो भी निर्माण शैली के तत्व मिले, उन सभी से यही बात निकलकर आती है कि सिंधु सभ्यता समाज प्रधान थी। यह व्यक्तिगत न होकर सामूहिक थी। इसमें किसी राजा का प्रभाव नहीं था और न ही किसी धर्म विशेष का। क्योंकि यहाँ की खुदाई में औजार तो मिले हैं परन्तु हथियार नहीं। किसी राजा के न होने पर भी इतनी नियमबद्धता से किसी सभ्यता का निर्माण यह साबित करता है कि सिंधु सभ्यता का सौंदर्य समाज पोषित था।

प्रश्न 3 – पुरातत्व के किन चिह्नों के आधार पर आप यह कह सकते हैं कि-“सिंधु सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी।”
उत्तर – सिंधु-सभ्यता की खुदाई से जो अवशेष प्राप्त हुए हैं उनमें औजार तो मिले हैं, परन्तु हथियार नहीं मिले हैं। अगर मुअनजो-दड़ो, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु-सभ्यता में कोई हथियार मिला भी है तो वह उस तरह के नहीं हैं जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति में न तो भव्य राजमहल मिले हैं, न कोई मंदिर मिला है, न ही राजाओं व महतों की कोई समाधि मिली हैं। मुअनजो-दड़ो से जो नरेश के सिर का मुकुट मिला है वह भी बहुत छोटा है। परन्तु यहाँ जो नगर-योजना, वास्तु-शिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ़-सफ़ाई जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं में एकरूपता दिखती है उससे कहा जा सकता है कि यहाँ पर कोई न कोई अनुशासन व्यवस्था तो अवश्य रही होगी। इन आधारों पर विद्वान यह मानते हैं कि सिंधु सभ्यता ताकत से शासित होने की अपेक्षा समझ से अनुशासित सभ्यता थी।

प्रश्न 4 – ‘यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब आप को कहीं नहीं ले जातीं; वे आकाश की तरफ़ अधूरी रह जाती हैं, लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं, वहाँ से आप इतिहास को नहीं उस के पार झाँक रहे हैं।’ इस कथन के पीछे लेखक का क्या आशय है?
उत्तर – इस कथन के पीछे लेखक का आशय यह है कि सिंधु सभ्यता भले ही खंडहर हो गई हो परन्तु इसके बाद भी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ व् पायदान बीते इतिहास का पूरा परिचय देते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इन आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियों व् पायदानों से यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि इन खंडहरों की दूसरी मंजिल भी रही होगी और इतनी ऊँची छत पर स्वयं चढ़कर इतिहास का अनुभव करना एक बढ़िया रोमांच है। लेखक का मानना है कि सिंधु घाटी की सभ्यता केवल इतिहास नहीं है बल्कि इतिहास के पार की वस्तु है और इतिहास के पार की वस्तु को इन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर ही देखा जा सकता है। ये अधूरे पायदान यही दर्शाते हैं कि विश्व की दो सबसे प्राचीन सभ्यताओं का इतिहास कैसा रहा। क्योंकि इतिहास को आप मिले हुए सबूतों के बल पर जानते हैं और ये पायदान आपको उससे भी परे सोचने पर मजबूर करते हैं?

प्रश्न 5 – टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों को भी दस्तावेज़ होते हैं-इस कथन का भाव स्पष्ट कीजिए।
उत्तर – यह सच है कि टूटे-फूटे खंडहर, सभ्यता और संस्कृति के इतिहास के साथ-साथ धड़कती जिंदगियों के अनछुए समयों का भी दस्तावेज होते हैं। मुअनजो-दड़ो में प्राप्त खंडहर यह अहसास कराते हैं कि आज से पाँच हजार साल पहले कभी यहाँ एक सुनियोजित बस्ती थी। ये खंडहर उस समय की सभ्यता व् संस्कृति का परिचय कराते हैं। लेखक बताता है कि इस प्राचीन शहर के जो अब केवल खंडहर ही बचा है, उसके किसी भी मकान की दीवार पर पीठ टिकाकर सुस्ता सकते हैं, किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर आप सहसा सहम सकते हैं, रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं या शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान देकर बैलगाड़ी की रुन-झुन सुन सकते हैं। इस तरह जीवन के प्रति सजग दृष्टि होने पर पुरातात्विक खंडहर भी जीवन की धड़कन सुना देते हैं। ये एक प्रकार के दस्तावेज होते हैं जो इतिहास के साथ-साथ उस अनछुए समय को भी हमारे सामने उपस्थित कर देते हैं। जो कभी उन शहरों का हिस्सा रहे हैं।

प्रश्न 6 – इस पाठ में एक ऐसे स्थान का वर्णन है, जिसे बहुत कम लोगों ने देखा होगा, परंतु इससे आपके मन में उस नगर की एक तसवीर बनती है। किसी ऐसे ऐतिहासिक स्थल, जिसको आपने नज़दीक से देखा हो, का वर्णन अपने शब्दों में कीजिए।
उत्तर – मैंने लाल किले को नजदीक से देखा है। यह एक ऐतिहासिक स्थल है। यह बहुत बड़ा किला है। इससे देखकर मुगल सत्ता के मजबूत आधारों का पता चलता है। इस विशाल किले का निर्माण मुग़ल बादशाह शाहजहाँ ने करवाया था। यह किला यमुना नदी के किनारे बनाया गया है और इसे बनाने के लिए लाल पत्थरों का इस्तेमाल किया गया है। किले के अंदर अनेक महल बनवाएं गए हैं। कहा जाता है कि शाहजहाँ के जमाने में इस पर सोने की नक्काशी की गई थी। इसके मुख्य द्वार की शोभा अप्रशंसनीय है। इसी द्वार के छत पर खड़े हो कर हर साल प्रधानमंत्री स्वतंत्रता दिवस पर झंडा फैहराते हैं। इस ऐतिहासिक स्थल को इतने नजदीक से देखना मेरे जीवन की आनंदमय घटनाओं में से एक है। मैं आगे भी अन्य ऐतिहासिक स्थलों पर जाने की इच्छुक हूँ।

प्रश्न 7 – नदी, कुएँ, स्नानागार और बेजोड़ निकासी व्यवस्था को देखते हुए लेखक पाठकों से प्रश्न पूछता है कि क्या हम सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कह सकते हैं? आपका जवाब लेखक के पक्ष में है या विपक्ष में? तर्क दें।
उत्तर – सिंधु घाटी सभ्यता में नदी, कुएँ, स्नानागार व बेजोड़ निकासी व्यवस्था के अनुसार लेखक इसे ‘जल-संस्कृति’ की संज्ञा देता है। मैं लेखक की बात से पूरी तरह सहमत हूँ। सिंधु-सभ्यता को जल-संस्कृति कहने के पक्ष में निम्नलिखित कारण हैं –
मुअनजो-दड़ो को सिंधु नदी के किनारे फली-फूली एक समृद्ध सभ्यता कहा जा सकता है।
यहाँ पीने के पानी के लिए लगभग सात सौ कुएँ मिले हैं। कुओं की इतनी बड़ी संख्या यहाँ पानी की बहुतायत सिद्ध करते हैं।
मुअनजो-दड़ो में स्नानागार हैं। एक पंक्ति में आठ स्नानागार हैं जिनमें किसी के भी द्वार एक-दूसरे के सामने नहीं खुलते।
कुंड में पानी के रिसाव को रोकने के लिए चूने और चिराड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है।
जल-निकासी के लिए पकी ईटों से बने नालियाँ व नाले हैं। ये ईटों से ढँके हुए हैं। आज भी शहरों में जल-निकासी के लिए ऐसी व्यवस्था की जाती है।
मकानों में अलग-अलग स्नानागार बने हुए हैं।
मुहरों पर उत्कीर्ण पशु शेर, हाथी या गैडा जल-प्रदेशों में ही पाए जाते हैं। इसका अर्थ यही निकलता है कि उस समय मुअनजो-दड़ो में पानी की बहुतायत रही होगी।

प्रश्न 8 – सिंधु घाटी सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला है। सिर्फ़ अवशेषों के आधार पर ही धारणा बनाई है। इस लेख में मुअनजो-दड़ो के बारे में जो धारणा व्यक्त की गई है। क्या आपके मन में इससे कोई भिन्न धारणा या भाव भी पैदा होता है? इन संभावनाओं पर कक्षा में समूह-चर्चा करें।
उत्तर – सिंधु घाटी सभ्यता का कोई लिखित साक्ष्य नहीं मिला है। सिर्फ़ अवशेषों के आधार पर ही धारणा बनाई है। यदि मोहनजो-दड़ो अर्थात् सिंधु घाटी की सभ्यता के बारे में धारणा बिना साक्ष्यों के बनाई गई है तो यह गलत नहीं कहा जा सकता। क्योंकि जो कुछ हमें वहाँ की खुदाई से मिला है वह किसी साक्ष्य से कम नहीं है। खुदाई के दौरान वहाँ मिले बर्तनों, सिक्कों, नगरों, सड़कों, गलियों को साक्ष्य ही कहेंगे क्योंकि यह आवश्यक नहीं है कि साक्ष्य लिखित ही हों। जो कुछ हमें सामने दिखाई दे रहा है वह भी तो प्रमाण ही होता है। फिर हम इस तथ्य को कैसे भुला दें कि ये दोनों नगर विश्व की प्राचीनतम संस्कृति और सभ्यता के प्रमाण हैं। इन्हीं के कारण अन्य सभी संस्कृतियाँ विकसित हुईं। मुअनजो-दड़ो के बारे में जो धारणा व्यक्त की गई है। वह हर दृष्टि से प्रामाणिक है। उसके बारे में अन्य कोई धारणा मेरे मन में नहीं बनती।

अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नोत्तर – (Important Question Answers)

प्रश्न 1 – सिंधु घाटी सभ्यता और मुअनजो-दड़ो के बारे में संक्षिप्त परिचय दीजिए।
उत्तर – सिंधु घाटी सभ्यता को लगभग 5,000 साल पुरानी सभ्यता माना जाता हैं। मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा केवल प्राचीन भारत के ही नहीं, बल्कि दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। कई जगहों पर खुदाई में और भी शहर भी मिले हैं। परन्तु मुअनजो-दड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। इसकी व्यापक खुदाई में बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित भांडे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि मिले है।
मुअनजो-दड़ो के बारे में यह धारणा है कि अपने समय में वह घाटी की सभ्यता का केंद्र रहा होगा। इसके बारे में कहा जाता है यह शहर दो सौ हैक्टर क्षेत्र में फैला था और इसकी आबादी कोई पचासी हज़ार थी। सबसे दिलचस्प बात जो सामने आई है कि सिंधु घाटी मैदान की संस्कृति थी, परन्तु पूरा मुअनजो-दड़ो छोटे-मोटे टीलों पर आबाद था। इन टीलों को कच्ची और पक्की दोनों तरह की ईंटों से धरती की सतह को ऊँचा उठाया गया था, ताकि यदि कभी सिंधु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके।

प्रश्न 2 – मुअनजो-दड़ो के खंडहरों की क्या खूबी है?
उत्तर – मुअनजो-दड़ो की खूबी यह है कि इस अत्यधिक पुराने शहर की सड़कों और गलियों में आज भी घुमा जा सकता हैं। यहाँ की सभ्यता और संस्कृति का प्राचीन सामान आज भले ही अजायबघरों की शोभा बढ़ा रहा हो, परन्तु शहर जहाँ था अब भी वहीं है। भले ही यह एक खंडहर क्यों न हो, परन्तु इसकी किसी भी दीवार पर पीठ टिका कर सुस्ता सकते हैं। किसी घर की देहरी पर पाँव रखकर आप सहसा सहम सकते हैं, रसोई की खिड़की पर खड़े होकर उसकी गंध महसूस कर सकते हैं। या शहर के किसी सुनसान मार्ग पर कान लगाकर उस बैलगाड़ी की रुन-झुन सुन सकते हैं जिसे आपने पुरातत्त्व की तसवीरों में मिट्टी के रंग में देखा है। यह सच है कि यहाँ किसी आँगन की टूटी-फूटी सीढ़ियाँ अब आपको कहीं नहीं ले जातीं; वे आकाश की तरफ अधूरी रह जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वहाँ की सीढ़ियाँ तो सलामत है परन्तु उन सीढ़ियों के द्वारा जिस दूसरी मंजिल पर जाया जाए वो दूसरी मंजिल नहीं है। लेकिन उन अधूरे पायदानों पर खड़े होकर अनुभव किया जा सकता है कि आप दुनिया की छत पर हैं; वहाँ से आप इतिहास को नहीं, उसके पार झाँक रहे हैं। अर्थात आप सबूतों के द्वारा इतिहास को जान सकते हो परन्तु यहाँ के प्रत्यक्ष साक्ष्यों को देख कर आप इतिहास के उस पन्ने को लिखते हो जिसके साबुत नहीं हैं।

प्रश्न 3 – बौद्ध स्तूप से किस तरह दुनिया की प्राचीन सभ्यता होने के भारत के दावे को पुरातत्त्व का वैज्ञानिक आधार मिला?
उत्तर – मुअनजो-दड़ो के सबसे ऊँचे चबूतरे पर बड़ा बौद्ध स्तूप है। यह बौद्ध स्तूप पचीस फुट ऊँचे चबूतरे पर छब्बीस सदी पहले बनी ईंटों के दम पर बनाया गया है। चबूतरे पर भिक्षुओं के कमरे भी हैं। 1922 में जब राखालदास बनर्जी यहाँ आए, तब वे इसी स्तूप की खोजबीन करना चाहते थे। इसके इर्द-गिर्द जब उन्होंने खुदाई शुरू की तो उन्होंने पाया कि यहाँ ईसा पूर्व के निशान हैं। जब भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के महानिदेशक जॉन मार्शल के निर्देश पर खुदाई का व्यापक अभियान शुरू हुआ तो यह खोज विशेषज्ञों को सिंधु घाटी सभ्यता की देहरी पर ले आई। इस खोज से दुनिया की प्राचीन सभ्यता होने के भारत के दावे को पुरातत्त्व का वैज्ञानिक आधार मिल गया। इस स्तूप को नागर भारत का सबसे पुराना लैंडस्केप कहा गया है।

प्रश्न 4 – लेखक को मुअनजो-दड़ो में राजस्थान की याद क्यों आई?
उत्तर – लेखक को मुअनजो-दड़ो का इलाका राजस्थान से बहुत मिलता-जुलता लगा। यहाँ केवल रेत के टीले की जगह खेतों का हरापन है। बाकी यहाँ वही खुला आकाश, सूना परिवेश; धूल, बबूल और ज़्यादा ठंड, ज़्यादा गरमी। परन्तु यहाँ की धूप का मिजाज़ राजस्थान की धुप से अलग है। राजस्थान की धूप पारदर्शी है। सिंध की धूप चौंधियाती है। मुअनजो-दड़ो की गलियों या घरों में लेखक को राजस्थान का खयाल आ गया। क्योंकि (पश्चिमी) राजस्थान और सिंध-गुजरात की दृश्यावली एक-सी है। और भी कई चीजें हैं जो मुअनजो-दड़ो को राजस्थान से जोड़ जाती हैं। जैसे हजारों साल पुराने यहाँ के खेत। बाजरे और ज्वार की खेती।

प्रश्न 5 – मुअनजो-दड़ो की नगर नियोजन को अनूठी मिसाल के तौर पर क्यों समझा जाता है?
उत्तर – नगर नियोजन को मुअनजो-दड़ो की अनूठी मिसाल के तौर पर समझा जाता है। क्योंकि यहाँ की इमारतें भले ही खंडहरों में बदल चुकी हों मगर ‘शहर’ की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफी हैं। यहाँ की कमोबेश सारी सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। आज वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आज की सेक्टर-मार्का कॉलोनियों में हमें आड़ा-सीधा ‘नियोजन’ बहुत मिलता है।

प्रश्न 6 – क्या मुअनजो-दड़ो में निम्न वर्ग नहीं था? ऐसा प्रश्न क्यों उठता है?
उत्तर – स्तूप वाले चबूतरे के पीछे ‘गढ़’ और ठीक सामने ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती है। उसके पीछे पाँच किलोमीटर दूर सिंधु नदी बहती है। पूरब की इस बस्ती से दक्षिण की तरफ नज़र दौड़ाते हुए पूरा पीछे घूम जाएँ तो मुअनजो-दड़ो के खंडहर हर जगह दिखाई देते हैं। दक्षिण में जो टूटे-फूटे घरों का जमघट है, वह कामगारों की बस्ती है। हर संपन्न समाज में वर्ग तो होते ही हैं और संभव है कि मुअनजो-दड़ो में भी होंगे। लेकिन क्या मुअनजो-दड़ो में निम्न वर्ग नहीं था? क्योंकि विशेषज्ञों की माने तो निम्न वर्ग के घर इतनी मज़बूत सामग्री के नहीं रहे होंगे कि पाँच हज़ार साल टिक सकें। और संभव है कि उनकी बस्तियाँ ‘गढ़’ और ‘उच्च’ वर्ग की बस्तियों से और दूर रही होंगी। इन सब का केवल अंदाजा इसलिए लगाया गया है क्योंकि सौ साल में अब तक इस इलाके के केवल एक-तिहाई हिस्से की खुदाई ही हो पाई है। अब वह भी कुछ कारणों के कारण बंद हो चुकी है। और जिन इलाकों की खुदाई हुई है उनमें ‘गढ़’ और ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती के अवशेष ही मिले हैं।

प्रश्न 7 – महाकुंड के बारे में क्या जानकारी सामने आई है?
उत्तर – स्तूप के टीले से दाईं तरफ एक लंबी गली दीखती है। इसके आगे महाकुंड है। धरोहर के प्रबंधकों ने उस गली का नाम दैव मार्ग (डिविनिटि स्ट्रीट) रखा है। विशेषज्ञों की माने तो उस सभ्यता में सामूहिक स्नान किसी अनुष्ठान का अंग होता था। कुंड करीब चालीस फुट लंबा और पच्चीस फुट चौड़ा है। गहराई सात फुट। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। इसके तीन तरफ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में दो पाँत में आठ स्नानघर हैं। इनमें किसी भी स्नानघर का द्वार दूसरे स्नानघर के सामने नहीं खुलता। यह एक सिद्ध वास्तुकला का नमूना है। इस कुंड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है। कुंड का पानी रिस न सके और बाहर का ‘अशुद्ध’ पानी कुंड में न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है। पार्श्व की दीवारों के साथ दूसरी दीवार खड़ी की गई है जिसमें सफेद डामर का प्रयोग है। कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ कुआँ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। इसे भी कुंड के पवित्र या अनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। कुंड से पानी को बाहर बहाने के लिए नालियाँ हैं। इनकी खासियत यह है कि ये भी पक्की ईंटों से बनी हैं और ईंटों से ढकी भी हैं।

प्रश्न 8 – सिंधु घाटी सभ्यता की विशिष्ट पहचान क्या मानी गई है?
उत्तर – पक्की और आकार में एक समान धूसर ईंटें तो सिंधु घाटी सभ्यता की विशिष्ट पहचान मानी ही गई हैं, साथ ही पुरातात्त्विक विद्वान और इतिहासकार ढकी हुई नालियों का उल्लेख भी इस घाटी की पहचान के रूप में देते हैं। पानी-निकासी का ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले के इतिहास में कहीं नहीं मिलता।

प्रश्न 9 – विशाल कोठार के इस्तेमाल के बारे में क्या अंदाजा लगाया गया है?
उत्तर – कुंड के दूसरी तरफ विशाल कोठार है। इन कोठारों में शायद कर के रूप में हासिल अनाज जमा किया जाता था। यह अंदाजा इसके निर्माण रूप को खासकर चौकियों और हवादारी को देखकर लगाया गया है। यहाँ नौ-नौ चौकियों की तीन कतारें हैं। उत्तर में एक गली है जहाँ से बैलगाड़ियों में इस अनाज की लाया या लेजाया जाता होगा। बैलगाड़ियों के प्रयोग के साक्ष्य सिंधु घाटी सभ्यता में मिले हैं।

प्रश्न 10 – सिंधु घाटी के दौर में व्यापार ही नहीं, उन्नत खेती भी होती थी। यह कैसे साबित होता है?
उत्तर – सिंधु घाटी के दौर में व्यापार ही नहीं, उन्नत खेती भी होती थी। परन्तु कई वर्षों तक यह माना जाता रहा कि सिंधु घाटी के लोग अन्न नहीं उगाते थे, बल्कि दूसरी जगह से उसका आयात करते थे। परन्तु नयी खोज ने इस खयाल को निर्मूल साबित किया है। बल्कि अब कुछ विद्वान मानते हैं कि सिंधु घाटी मूलतः खेतिहर और पशुपालक सभ्यता ही थी। वहाँ लोहा शुरू में नहीं था पर पत्थर और ताँबे की बहुतायत थी। पत्थर सिंध में ही था, ताँबे की खानें राजस्थान में थीं। इतिहासकार इरफान हबीब के मुताबिक यहाँ के लोग रबी की फसल लेते थे। कपास, गेहूँ, जौ, सरसों और चने की उपज के पुख्ता सबूत खुदाई में मिले हैं। वह सभ्यता का तर-युग था जो धीमे-धीमे सूखे में ढल गया। विद्वानों का मानना है कि यहाँ ज्वार, बाजरा और रागी की उपज भी होती थी। लोग खजूर, खरबूज़े और अंगूर उगाते थे। झाड़ियों से बेर जमा करते थे। कपास की खेती भी होती थी। कपास को छोड़कर बाकी सबके बीज मिले हैं और उन्हें परखा भी गया है। कपास की खेती का अंदाजा वहाँ पर सूती कपड़ा मिलने से किया गया है। ये दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है। दूसरा सूती कपड़ा तीन हज़ार ईसा पूर्व का है जो जॉर्डन में मिला।

प्रश्न 11 – सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति क्यों कहा जा सकता हैं?
उत्तर – मुअनजो-दड़ो में इमारतों से पहले जो चीज़ दूर से ध्यान खींचती है, वह है कुओं का प्रबंध। ये कुएँ भी पकी हुई एक ही आकार की ईंटों से बने हैं। इतिहासकार कहते हैं सिंधु घाटी सभ्यता संसार में पहली ज्ञात संस्कृति है जो कुएँ खोद कर भू-जल तक पहुँची। उनके मुताबिक केवल मुअनजो-दड़ो में सात सौ के करीब कुएँ थे। नदी, कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ पानी-निकासी। इन सभी को देखते हुए विशेषज्ञ की माने तो सिंधु घाटी सभ्यता को जल-संस्कृति कह सकते हैं।

प्रश्न 12 – मुअनजो-दड़ो में खंडहरों की दूसरी मंजिल भी रही होगी इसका अंदाजा कैसे लगाया गया?
उत्तर – बड़ी बस्ती में पुरातत्त्वशास्त्री काशीनाथ दीक्षित के नाम पर एक हलका ‘डीके-जी’ कहलाता है। इसके घरों की दीवारें ऊँची और मोटी हैं। मोटी दीवार का अर्थ यह लगाया जाता है कि उस पर दूसरी मंजिल भी रही होगी। सभी घर ईंट के हैं। सभी भट्टी में पकी हुईं एक ही आकार की ईंटें-1ः2ः4 के अनुपात की हैं। इन घरों में दिलचस्प बात यह है कि सामने की दीवार में केवल प्रवेश द्वार बना है, कोई खिड़की नहीं है। खिड़कियाँ शायद ऊपर की दीवार में रहती हों, यानी दूसरी मंजिल पर। हालाँकि सभी घर खंडहर हैं और दिखाई देने वाली चीजों से हम सिर्फ अंदाजा लगा सकते हैं। कुछ घरों में ऊपर की मंजिल के निशान हैं, पर सीढ़ियाँ नहीं हैं। शायद यहाँ लकड़ी की सीढ़ियाँ रही हों, जो समय के साथ नष्ट हो गईं हो। कुछ घरों में बाहर की तरफ सीढ़ियों के संकेत हैं। यहाँ शायद ऊपर और नीचे अलग-अलग परिवार रहते होंगे। छोटे घरों की बस्ती में छोटी संकरी सीढ़ियाँ हैं। उनके पायदान भी ऊँचे हैं। ऐसा जगह की तंगी की वजह से होता होगा।

प्रश्न 13 – कैसे अंदाजा लगाया गया कि मुअनजो-दड़ो का वातावरण आज के वातावरण से अलग था?
उत्तर – मुअनजो-दड़ो के किसी घर में खिड़कियों या दरवाजों पर छज्जों के चिह्न नहीं हैं। अक्सर गरम इलाकों के घरों में छाया के लिए यह आम प्रावधान होता है। इससे यह अंदाजा लगाया गया कि उस वक्त यहाँ इतनी कड़ी धूप नहीं पड़ती होगी। मुअनजो-दड़ो की जानी-मानी मुहरों के पशुयों के चिह्न है जैसे शेर, हाथी या गैंडा। इस मरु-भूमि में ऐसे जानवर नहीं रह सकते। इससे यह अंदाजा लगाया गया कि उस वक्त यहाँ जंगल भी रहे होंगे। इन सभी तथ्यों से स्थापित हो चुका है कि यहाँ अच्छी खेती होती थी। इससे अंदाजा लगाया गया कि मुअनजो-दड़ो का वातावरण आज के वातावरण से अलग था।

प्रश्न 14 – विशेषज्ञों द्वारा सिंधु घाटी की समृद्ध सभ्यता के पतन का क्या कारण रहा होगा?
उत्तर – पुरातत्त्वी शीरीन रत्नागर का मानना है कि सिंधु-वासी कुँओं से सिंचाई कर लेते थे। परन्तु मुअनजो-दड़ो की किसी खुदाई में नहर होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। तो यह संभव है कि बारिश उस काल में काफी होती होगी। इन सभी से यह भी अंदाजा लगाया गया कि हो सकता है बारिश घटने और कुँओं के अत्यधिक इस्तेमाल से भू-तल जल पहुँच से दूर चला गया और पानी के अभाव में यह इलाका उजड़ा और उसके साथ सिंधु घाटी की समृद्ध सभ्यता का भी पतन हो गया।

प्रश्न 15 – मुअनजो-दड़ो के घरों में टहलते हुए लेखक को कुलधरा की याद आई। क्यों?
उत्तर – मुअनजो-दड़ो के घरों में टहलते हुए लेखक को कुलधरा की याद आई। क्योंकि वहाँ भी गाँव में घर हैं, पर लोग नहीं हैं। कोई डेढ़ सौ साल पहले राजा से तकरार पर स्वाभिमानी गाँव का हर बाशिंदा रातोंरात अपना घर छोड़ चला गया। घर खंडहर हो गए पर ढहे नहीं। घरों की दीवारें, प्रवेश और खिड़कियाँ ऐसी हैं जैसे कल की बात हो। लोग निकल गए, वक्त वहीं रह गया। खंडहरों ने उसे थाम लिया। जैसे सुबह लोग घरों से निकले हों, शायद शाम ढले लौट आने वाले हों। राजस्थान ही नहीं, गुजरात, पंजाब और हरियाणा में भी कुएँ, कुंड, गली-कूचे, कच्ची-पक्की ईंटों के कई घर भी आज वैसे मिलते हैं जैसे हजारों साल पहले हुए।

प्रश्न 16 – मुअनजो-दड़ो की खुदाई में कौन सी चीजों निकली हैं और वे कहाँ हैं?
उत्तर – मुअनजो-दड़ो की खुदाई में निकली पंजीकृत चीजों की संख्या पचास हजार से ज्यादा है। मगर जो मुट्ठी भर चीजें अजायबघर में प्रदर्शित हैं, पहुँची हुई सिंधु सभ्यता की झलक दिखाने को काफी हैं। काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, चाक पर बने विशाल मृद्-भांड, उन पर काले-भूरे चित्र, चौपड़ की गोटियाँ, दीये, माप-तौल पत्थर, ताँबे का आईना, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने, दो पाटन वाली चक्की, कंघी, मिट्टी के कंगन, रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हार और पत्थर के औजार।

प्रश्न 17 – क्यों माना जाता है कि मुअनजो-दड़ो में अनुशासन तो ज़रूर था, पर वो अनुशासन ताकत के बल पर नहीं था?
उत्तर – अजायबघर में प्रदर्शित चीजों में औजार तो हैं, पर हथियार कोई नहीं है। मुअनजो-दड़ो क्या, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले हैं जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। इस बात को लेकर विद्वान सिंधु सभ्यता में शासन या सामाजिक प्रबंध के तौर-तरीके को समझने की कोशिश कर रहे हैं। क्योंकि वहाँ कोई अनुशासन तो ज़रूर था, पर वो अनुशासन ताकत के बल पर नहीं था। वे मानते हैं कोई सैन्य सत्ता शायद यहाँ न रही हो। मगर कोई अनुशासन ज़रूर था जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ-सफाई जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं आदि में एकरूपता तक को कायम रखे हुए था।

प्रश्न 18 – हड़प्पा संस्कृति को लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति क्यों कहा गया है?
उत्तर – दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर। न राजाओं, महंतों की समाधियाँ। यहाँ के मूर्तिशिल्प छोटे हैं और औजार भी। मुअनजो-दड़ो के ‘नरेश’ के सिर पर जो ‘मुकुट’ है, शायद उससे छोटे सिरपेंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती। और तो और, उन लोगों की नावें बनावट में मिस्र की नावों जैसी होते हुए भी आकार में छोटी रहीं। आज के मुहावरे में कह सकते हैं वह ‘लो-प्रोफाइल’ सभ्यता थी; लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति। मुअनजो-दड़ो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा शहर ही नहीं बल्कि साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए सबसे समृद्ध भी माना गया है। फिर भी इसकी संपन्नता की बात बहुत कम हुई है वह इसलिए क्योंकि उसमें भव्यता का आडंबर नहीं है।

प्रश्न 19 – सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है। क्यों?
उत्तर – सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है। एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है, “जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।” शायद इसीलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है।

प्रश्न 20 – सिंधु सभ्यता के कई राज अभी भी दफ़न है जो शायद हमेशा दफ़न ही रहेंगे और उनके बारे में केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं। ऐसा क्यों?
उत्तर – अजायबघर में रखी चीजों में कुछ सुइयाँ भी हैं। खुदाई में ताँबे और काँसे की तो बहुत सारी सुइयाँ मिली थीं। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयाँ मिलीं जिनमें एक दो-इंच लंबी थी। उन्हें देखकर यह समझा गया है कि यह बारीक कशीदेकारी में काम आती होगी। नर्तकी के अलावा मुअनजो-दड़ो के नाम से प्रसिद्ध जो दाढ़ी वाले ‘नरेश’ की मूर्ति है, उसके बदन पर आकर्षक गुलकारी वाला दुशाला भी है। आज छापे वाला कपड़ा ‘अजरक’ सिंध की खास पहचान बन गया है, पर कपड़ों पर छपाई का आविष्कार बहुत बाद का है। खुदाई में सुइयों के अलावा हाथीदाँत और ताँबे के सुए भी मिले हैं। जानकार मानते हैं कि इनसे शायद दरियाँ बुनी जाती थीं। परन्तु दरी का कोई नमूना या साक्ष्य खुदाई में हासिल नहीं हुआ है। और वह शायद कभी हासिल भी न हो, क्योंकि मुअनजो-दड़ो में अब खुदाई बंद कर दी गई है। क्योंकि सिंधु के पानी के रिसाव से क्षार और दलदल की समस्या पैदा हो गई है। जिससे मौजूदा खंडहरों को बचाकर रखना ही अब अपने आप में बड़ी चुनौती है। यही कारण है कि खुदाई को बंद कर दिया गया है और सिंधु सभ्यता के कई राज अभी भी दफ़न है जो शायद हमेशा दफ़न ही रहेंगे और उनके बारे में केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं।

सारआधारित प्रश्न Extract Based Questions

सारआधारित प्रश्न बहुविकल्पीय किस्म के होते हैंऔर छात्रों को पैसेज को ध्यान से पढ़कर प्रत्येक प्रश्न के लिए सही विकल्प का चयन करना चाहिए। (Extract-based questions are of the multiple-choice variety, and students must select the correct option for each question by carefully reading the passage.)

1 –
अभी भी मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा प्राचीन भारत के ही नहीं, दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर माने जाते हैं। ये सिंधु घाटी सभ्यता के परवर्ती यानी परिपक्व दौर के शहर हैं। खुदाई में और शहर भी मिले हैं। लेकिन मुअनजो-दड़ो ताम्र काल के शहरों में सबसे बड़ा है। वह सबसे उत्कृष्ट भी है। व्यापक खुदाई यहीं पर संभव हुई। बड़ी तादाद में इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ, चाक पर बने चित्रित भांडे, मुहरें, साजो-सामान और खिलौने आदि मिले। सभ्यता का अध्ययन संभव हुआ। उधर सैकड़ों मील दूर हड़प्पा के ज़्यादातर साक्ष्य रेललाइन बिछने के दौरान ‘विकास की भेंट चढ़ गए।’
मुअनजो-दड़ो के बारे में धारणा है कि अपने दौर में वह घाटी की सभ्यता का केंद्र रहा होगा। यानी एक तरह की राजधानी। माना जाता है यह शहर दो सौ हैक्टर क्षेत्र में फैला था। आबादी कोई पचासी हज़ार थी। जाहिर है, पाँच हज़ार साल पहले यह आज के ‘महानगर’ की परिभाषा को भी लाँघता होगा।
दिलचस्प बात यह है कि सिंधु घाटी मैदान की संस्कृति थी, पर पूरा मुअनजो-दड़ो छोटे-मोटे टीलों पर आबाद था। ये टीले प्राकृतिक नहीं थे। कच्ची और पक्की दोनों तरह की ईंटों से धरती की सतह को ऊँचा उठाया गया था, ताकि सिंधु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके।

प्रश्न 1 – दुनिया के दो सबसे पुराने नियोजित शहर कौन से माने जाते हैं?
(क) सिंधु घाटी की सभ्यता और हड़प्पा
(ख) मुअनजो-दड़ो और मिस्र की सभ्यता
(ग) मुअनजो-दड़ो और सिंधु घाटी की सभ्यता
(घ) मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा
उत्तर – (घ) मुअनजो-दड़ो और हड़प्पा

प्रश्न 2 – मुअनजो-दड़ो किस काल के शहरों में सबसे बड़ा है?
(क) ताम्र काल
(ख) पाषाण काल
(ग) लोह काल
(घ) आदि काल
उत्तर – (क) ताम्र काल

प्रश्न 3 – मुअनजो-दड़ो की खुदाई में क्या मिला?
(क) इमारतें, सड़कें, धातु-पत्थर की मूर्तियाँ आदि
(ख) चाक पर बने चित्रित भांडे, मुहरें आदि
(ग) साजो-सामान और खिलौने आदि
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4 – मुअनजो-दड़ो शहर का क्षेत्र और आबादी कितनी थी?
(क) दो सौ हैक्टर क्षेत्र और आबादी लगभग पचासी हज़ार
(ख) एक सौ हैक्टर क्षेत्र और आबादी लगभग पच्चास हज़ार
(ग) तीन सौ हैक्टर क्षेत्र और आबादी लगभग पचासी हज़ार
(घ) दो सौ हैक्टर क्षेत्र और आबादी लगभग पच्चीस हज़ार
उत्तर – (क) दो सौ हैक्टर क्षेत्र और आबादी लगभग पचासी हज़ार

प्रश्न 5 – सिंधु घाटी मैदान की संस्कृति थी, परन्तु पूरा मुअनजो-दड़ो छोटे-मोटे टीलों पर क्यों आबाद था?
(क) ताकि शहर सबसे ऊँचा दिखाई दे
(ख) ताकि सभी पर अच्छे से नज़र रखी जा सके
(ग) ताकि सिंधु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके
(घ) ताकि खतरों को दूर से ही देखा जा सके
उत्तर – (ग) ताकि सिंधु का पानी बाहर पसर आए तो उससे बचा जा सके

2 –
नगर नियोजन की मुअनजो-दड़ो अनूठी मिसाल है। इस कथन का मतलब आप बड़े चबूतरे से नीचे की तरफ देखते हुए सहज ही भाँप सकते हैं। इमारतें भले खंडहरों में बदल चुकी हों मगर ‘शहर’ की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफी हैं। यहाँ की कमोबेश सारी सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। आज वास्तुकार इसे ‘ग्रिड प्लान’ कहते हैं। आज की सेक्टर-मार्का कॉलोनियों में हमें आड़ा-सीधा ‘नियोजन’ बहुत मिलता है। लेकिन वह रहन-सहन को नीरस बनाता है। शहरों में नियोजन के नाम पर भी हमें अराजकता ज़्यादा हाथ लगती है। ब्रासीलिया या चंडीगढ़ और इस्लामाबाद ‘ग्रिड’ शैली के शहर हैं जो आधुनिक नगर नियोजन के प्रतिमान ठहराए जाते हैं, लेकिन उनकी बसावट शहर के खुद विकसने का कितना अवकाश छोड़ती है इस पर बहुत शंका प्रकट की जाती है। मुअनजो-दड़ो की साक्षर सभ्यता एक सुसंस्कृत समाज की स्थापना थी, लेकिन उसमें नगर नियोजन और वस्तुकला की आखिर कितनी भूमिका थी? स्तूप वाले चबूतरे के पीछे ‘गढ़’ और ठीक सामने ‘उच्च’ वर्ग की बस्ती है। उसके पीछे पाँच किलोमीटर दूर सिंधु बहती है। पूरब की इस बस्ती से दक्षिण की तरफ नज़र दौड़ाते हुए पूरा पीछे घूम जाएँ तो आपको मुअनजो-दड़ो के खंडहर हर जगह दिखाई देंगे। दक्षिण में जो टूटे-फूटे घरों का जमघट है, वह कामगारों की बस्ती है। कहा जा सकता है इतर वर्ग की। संपन्न समाज में वर्ग भी होंगे। लेकिन क्या निम्न वर्ग यहाँ नहीं था? कहते हैं, निम्न वर्ग के घर इतनी मज़बूत सामग्री के नहीं रहे होंगे कि पाँच हज़ार साल टिक सकें। उनकी बस्तियाँ और दूर रही होंगी। यह भी है कि सौ साल में अब तक इस इलाके के एक-तिहाई हिस्से की खुदाई ही हो पाई है। अब वह भी बंद हो चुकी है।

प्रश्न 1 – मुअनजो-दड़ो की अनूठी मिसाल क्या है?
(क) मूर्ति कला
(ख) नगर नियोजन
(ग) ताम्र कला
(घ) संस्कृति
उत्तर – (ख) नगर नियोजन

प्रश्न 2 – इमारतें भले खंडहरों में बदल चुकी हों मगर ‘शहर’ की सड़कों और गलियों के विस्तार को स्पष्ट करने के लिए ये खंडहर काफी हैं। यहाँ की कमोबेश सारी सड़कें सीधी हैं या फिर आड़ी। आज वास्तुकार इसे क्या कहते हैं?
(क) ग्रेट प्लान
(ख) ग्रैंड प्लान
(ग) ग्रिड प्लान
(घ) ग्रीक प्लान
उत्तर – (ग) ग्रिड प्लान

प्रश्न 3 – स्तूप वाले चबूतरे के पीछे कितने किलोमीटर दूर सिंधु बहती है?
(क) पाँच किलोमीटर
(ख) आठ किलोमीटर
(ग) तीन किलोमीटर
(घ) चार किलोमीटर
उत्तर – (क) पाँच किलोमीटर

प्रश्न 4 – दक्षिण में जो टूटे-फूटे घरों का जमघट है, वह किनकी बस्ती है?
(क) राहगीरों की
(ख) मूर्तिकारों की
(ग) कामगारों की
(घ) वास्तुशास्त्रियों की
उत्तर – (ग) कामगारों की

प्रश्न 5 – संपन्न समाज में वर्ग भी होंगे। लेकिन मुअनजो-दड़ो में निम्न वर्ग के होने पर क्यों संदेह किया जाता है?
(क) क्योंकि निम्न वर्ग के घर इतनी मज़बूत सामग्री के नहीं रहे होंगे कि पाँच हज़ार साल टिक सकें और मुअनजो-दड़ो में उपस्थित खंडहर एक समान प्रतीत होते हैं
(ख) हो सकता है कि निम्न वर्ग की बस्तियाँ और दूर रही होंगी अर्थात उच्च वर्ग से दूर
(ग) सौ साल में अब तक इस इलाके के एक-तिहाई हिस्से की खुदाई ही हो पाई है और संभव है निम्न वर्ग की बस्तियों की खुदाई अभी न हुई हो
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

3 –
हम पहले स्तूप के टीले से महाकुंड के विहार की दिशा में उतरे। दाईं तरफ एक लंबी गली दीखती है। इसके आगे महाकुंड है। पता नहीं सायास है या संयोग कि धरोहर के प्रबंधकों ने उस गली का नाम दैव मार्ग (डिविनिटि स्ट्रीट) रखा है। माना जाता है कि उस सभ्यता में सामूहिक स्नान किसी अनुष्ठान का अंग होता था। कुंड करीब चालीस फुट लंबा और पच्चीस फुट चौड़ा है। गहराई सात फुट। कुंड में उत्तर और दक्षिण से सीढ़ियाँ उतरती हैं। इसके तीन तरफ साधुओं के कक्ष बने हुए हैं। उत्तर में दो पाँत में आठ स्नानघर हैं। इनमें किसी का द्वार दूसरे के सामने नहीं खुलता। सिद्ध वास्तुकला का यह भी एक नमूना है। इस कुंड में खास बात पक्की ईंटों का जमाव है। कुंड का पानी रिस न सके और बाहर का ‘अशुद्ध’ पानी कुंड में न आए, इसके लिए कुंड के तल में और दीवारों पर ईंटों के बीच चूने और चिरोड़ी के गारे का इस्तेमाल हुआ है। पार्श्व की दीवारों के साथ दूसरी दीवार खड़ी की गई है जिसमें सफेद डामर का प्रयोग है। कुंड के पानी के बंदोबस्त के लिए एक तरफ कुआँ है। दोहरे घेरे वाला यह अकेला कुआँ है। इसे भी कुंड के पवित्र या अनुष्ठानिक होने का प्रमाण माना गया है। कुंड से पानी को बाहर बहाने के लिए नालियाँ हैं। इनकी खासियत यह है कि ये भी पक्की ईंटों से बनी हैं और ईंटों से ढकी भी हैं। पक्की और आकार में समरूप धूसर ईंटें तो सिंधु घाटी सभ्यता की विशिष्ट पहचान मानी ही गई हैं, ढकी हुई नालियों का उल्लेख भी पुरातात्त्विक विद्वान और इतिहासकार जोर देकर करते हैं। पानी-निकासी का ऐसा सुव्यवस्थित बंदोबस्त इससे पहले के इतिहास में नहीं मिलता।

प्रश्न 1 – धरोहर के प्रबंधकों ने महाकुंड वाली गली का नाम क्या रखा है?
(क) अदैव मार्ग
(ख) दैत्य मार्ग
(ग) दैव मार्ग
(घ) कुंड मार्ग
उत्तर – (ग) दैव मार्ग

प्रश्न 2 – कुंड की लम्बाई, चौड़ाई और गहराई कितनी थी?
(क) करीब चालीस फुट लंबा, पच्चीस फुट चौड़ा और गहराई सात फुट
(ख) करीब चवालीस फुट लंबा, पच्चीस फुट चौड़ा और गहराई सात फुट
(ग) करीब चालीस फुट लंबा, पच्चास फुट चौड़ा और गहराई सात फुट
(घ) करीब चालीस फुट लंबा, पच्चीस फुट चौड़ा और गहराई आठ फुट
उत्तर – (क) करीब चालीस फुट लंबा, पच्चीस फुट चौड़ा और गहराई सात फुट

प्रश्न 3 – कुंड में खास बात क्या है?
(क) पक्की-कच्ची ईंटों का जमाव
(ख) कच्ची ईंटों का जमाव
(ग) पक्की ईंटों का जमाव
(घ) केवल (क)
उत्तर – (ग) पक्की ईंटों का जमाव

प्रश्न 4 – सिंधु घाटी सभ्यता की विशिष्ट पहचान क्या मानी ही गई हैं?
(क) पक्की और आकार में समरूप धूसर ईंटें
(ख) पक्की धूसर ईंटें
(ग) आकार में समरूप धूसर ईंटें
(घ) धूसर ईंटें
उत्तर – (क) पक्की और आकार में समरूप धूसर ईंटें

प्रश्न 5 – मुअनजो-दड़ो से पहले के इतिहास में क्या नहीं मिलता?
(क) घरों का सुव्यवस्थित बंदोबस्त
(ख) भोजन का सुव्यवस्थित बंदोबस्त
(ग) पानी-निकासी का सुव्यवस्थित बंदोबस्त
(घ) पानी का सुव्यवस्थित बंदोबस्त
उत्तर – (ग) पानी-निकासी का सुव्यवस्थित बंदोबस्त

4 –
अब यह जगजाहिर है कि सिंधु घाटी के दौर में व्यापार ही नहीं, उन्नत खेती भी होती थी। बरसों यह माना जाता रहा कि सिंधु घाटी के लोग अन्न उपजाते नहीं थे, उसका आयात करते थे। नयी खोज ने इस खयाल को निर्मूल साबित किया है। बल्कि अब कुछ विद्वान मानते हैं कि वह मूलतः खेतिहर और पशुपालक सभ्यता ही थी। लोहा शुरू में नहीं था पर पत्थर और ताँबे की बहुतायत थी। पत्थर सिंध में ही था, ताँबे की खानें राजस्थान में थीं। इनके उपकरण खेती-बाड़ी में प्रयोग किए जाते थे। जबकि मिस्र और सुमेर में चकमक और लकड़ी के उपकरण इस्तेमाल होते थे। इतिहासकार इरफान हबीब के मुताबिक यहाँ के लोग रबी की फसल लेते थे। कपास, गेहूँ, जौ, सरसों और चने की उपज के पुख्ता सबूत खुदाई में मिले हैं। वह सभ्यता का तर-युग था जो धीमे-धीमे सूखे में ढल गया। विद्वानों का मानना है कि यहाँ ज्वार, बाजरा और रागी की उपज भी होती थी। लोग खजूर, खरबूज़े और अंगूर उगाते थे। झाड़ियों से बेर जमा करते थे। कपास की खेती भी होती थी। कपास को छोड़कर बाकी सबके बीज मिले हैं और उन्हें परखा गया है। कपास के बीज तो नहीं, पर सूती कपड़ा मिला है। ये दुनिया में सूत के दो सबसे पुराने नमूनों में एक है। दूसरा सूती कपड़ा तीन हज़ार ईसा पूर्व का है जो जॉर्डन में मिला। मुअनजो-दड़ो में सूत की कताई-बुनाई के साथ रंगाई भी होती थी। रंगाई का एक छोटा कारखाना खुदाई में माधोस्वरूप वत्स को मिला था। छालटी (लिनन) और उफन कहते हैं यहाँ सुमेर से आयात होते थे। शायद सूत उनको निर्यात होता हो। जैसा कि बाद में सिंध से मध्य एशिया और यूरोप को सदियों हुआ। प्रसंगवश, मेसोपोटामिया के शिलालेखों में मुअनजो-दड़ो के लिए ‘मेलुहा’ शब्द का संभावित प्रयोग मिलता है।

प्रश्न 1 – नयी खोज ने किस खयाल को निर्मूल साबित किया है?
(क) सिंधु घाटी के दौर में व्यापार ही नहीं, उन्नत खेती भी होती थी
(ख) सिंधु घाटी के लोग अन्न उपजाते नहीं थे, उसका आयात करते थे
(ग) सिंधु घाटी के लोग केवल अन्न उपजाते थे
(घ) सिंधु घाटी के लोग अन्न केवल अपने लिए उगाते थे
उत्तर – (ख) सिंधु घाटी के लोग अन्न उपजाते नहीं थे, उसका आयात करते थे

प्रश्न 2 – सिंधु घाटी की सभ्यता में किसकी बहुतायत थी?
(क) पत्थर और ताँबे की
(ख) लिहे और ताँबे की
(ग) पत्थर और लोहे की
(घ) सोने और ताँबे की
उत्तर – (क) पत्थर और ताँबे की

प्रश्न 3 – सिंधु सभ्यता के लोग किसकी फसल उगाते थे?
(क) कपास की
(ख) गेहूँ और जौ की
(ग) सरसों और चने की
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4 – मुअनजो-दड़ो में खुदाई में माधोस्वरूप वत्स को क्या मिला था?
(क) रंगाई का एक छोटा कारखाना
(ख) बुनाई का एक छोटा कारखाना
(ग) कढ़ाई का एक छोटा कारखाना
(घ) चूड़ियों का एक छोटा कारखाना
उत्तर – (क) रंगाई का एक छोटा कारखाना

प्रश्न 5 – प्रसंगवश, मेसोपोटामिया के शिलालेखों में मुअनजो-दड़ो के लिए किस शब्द का संभावित प्रयोग मिलता है?
(क) मुलुहा
(ख) मेलेहा
(ग) मेलुहा
(घ) मेलुहो
उत्तर – (ग) मेलुहा

5 –
मुअनजो-दड़ो में कुँओं को छोड़कर लगता है जैसे सब कुछ चौकोर या आयताकार हो। नगर की योजना, बस्तियाँ, घर, कुंड, बड़ी इमारतें, ठप्पेदार मुहरें, चौपड़ का खेल, गोटियाँ, तौलने के बाट आदि सब। छोटे घरों में छोटे कमरे समझ में आते हैं। पर बड़े घरों में छोटे कमरे देखकर अचरज होता है। इसका एक अर्थ तो यह लगाया गया है कि शहर की आबादी काफी रही होगी। दूसरी तरफ यह विचार सामने आया है कि बड़े घरों में निचली(भूतल) मंजिल में नौकर-चाकर रहते होंगे। ऐसा अमेरिकी नृतत्त्वशास्त्री ग्रेगरी पोसेल का मानना है। बड़े घरों के आँगन में चौड़ी सीढ़ियाँ हैं। कुछ घरों में ऊपर की मंजिल के निशान हैं, पर सीढ़ियाँ नहीं हैं। शायद यहाँ लकड़ी की सीढ़ियाँ रही हों, जो कालांतर में नष्ट हो गईं। संभव है ऊपर की मंजिल में ज्यादा खिड़कियाँ, झरोखे और साज-सज्जा रही हो। लकड़ी का इस्तेमाल भी बहुत संभव है पूरे घर में होता हो। कुछ घरों में बाहर की तरफ सीढ़ियों के संकेत हैं। यहाँ शायद ऊपर और नीचे अलग-अलग परिवार रहते होंगे। छोटे घरों की बस्ती में छोटी संकरी सीढ़ियाँ हैं। उनके पायदान भी ऊँचे हैं। ऐसा जगह की तंगी की वजह से होता होगा। गौर किया कि मुअनजो-दड़ो के किसी घर में खिड़कियों या दरवाजों पर छज्जों के चिह्न नहीं हैं। गरम इलाकों के घरों में छाया के लिए यह आम प्रावधान होता है। क्या उस वक्त यहाँ इतनी कड़ी धूप नहीं पड़ती होगी? मुझे मुअनजो-दड़ो की जानी-मानी मुहरों के पशु याद हो आए। शेर, हाथी या गैंडा इस मरु-भूमि में हो नहीं सकते। क्या उस वक्त यहाँ जंगल भी थे? यह तथ्य स्थापित हो चुका है कि यहाँ अच्छी खेती होती थी। पुरातत्त्वी शीरीन रत्नागर का मानना है कि सिंधु-वासी कुँओं से सिंचाई कर लेते थे। दूसरे, मुअनजो-दड़ो की किसी खुदाई में नहर होने के प्रमाण नहीं मिले हैं। यानी बारिश उस काल में काफी होती होगी। क्या बारिश घटने और कुँओं के अत्यधिक इस्तेमाल से भू-तल जल भी पहुँच से दूर चला गया? क्या पानी के अभाव में यह इलाका उजड़ा और उसके साथ सिंधु घाटी की समृद्ध सभ्यता भी?

प्रश्न 1 – मुअनजो-दड़ो में कुँओं को छोड़कर कौन सी चीजें चौकोर या आयताकार मिली हैं?
(क) नगर की योजना, बस्तियाँ, घर आदि सब।
(ख) कुंड, बड़ी इमारतें, ठप्पेदार मुहरें आदि सब।
(ग) चौपड़ का खेल, गोटियाँ, तौलने के बाट आदि सब।
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 2 – मुअनजो-दड़ो में छोटे घरों में छोटे कमरे समझ में आते हैं। पर बड़े घरों में छोटे कमरे देखकर अचरज होता है।
(क) शहर की आबादी काफी रही होगी
(ख) बड़े घरों में निचली(भूतल) मंजिल में नौकर-चाकर रहते होंगे
(ग) केवल (ख)
(घ) (क) और (ख) दोनों
उत्तर – (घ) (क) और (ख) दोनों

प्रश्न 3 – मुअनजो-दड़ो में बड़े घरों के आँगन में चौड़ी सीढ़ियाँ हैं। कुछ घरों में ऊपर की मंजिल के निशान हैं, पर सीढ़ियाँ नहीं हैं। इसका क्या कारण हो सकता है?
(क) शायद यहाँ लकड़ी की सीढ़ियाँ रही हों, जो कालांतर में नष्ट हो गईं
(ख) शायद घरों में ऊपर की मंजिल ही न हो
(ग) शायद सभी घर केवल एक ही मंजिला रहे हों
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (क) शायद यहाँ लकड़ी की सीढ़ियाँ रही हों, जो कालांतर में नष्ट हो गईं

प्रश्न 4 – किन कारणों से माना जाता है कि मुअनजो-दड़ो में भी कभी जंगल थे?
(क) मुअनजो-दड़ो के किसी घर में खिड़कियों या दरवाजों पर छज्जों के चिह्न नहीं हैं। गरम इलाकों के घरों में छाया के लिए यह आम प्रावधान होता है
(ख) मुअनजो-दड़ो की जानी-मानी मुहरों के पशु चिह्न हैं जैसे शेर, हाथी या गैंडा, वे मरु-भूमि में हो नहीं सकते
(ग) केवल (ख)
(घ) (क) और (ख) दोनों
उत्तर – (घ) (क) और (ख) दोनों

प्रश्न 5 – सिंधु घाटी की समृद्ध सभ्यता के उजड़ने के पीछे एक कारण क्या माना जाता है?
(क) सिंधु-वासी कुँओं से सिंचाई कर लेते थे
(ख) बारिश उस काल में काफी होती होगी
(ग) कुँओं के अत्यधिक इस्तेमाल से
(घ) पानी के अभाव के कारण
उत्तर – (घ) पानी के अभाव के कारण

6 –
अनचाहे मुझे मुअनजो-दड़ो की गलियों या घरों में राजस्थान का खयाल न आए, ऐसा नहीं हो सका। महज़ इसलिए नहीं कि (पश्चिमी) राजस्थान और सिंध-गुजरात की दृश्यावली एक-सी है। कई चीजें हैं जो मुझे यहाँ से वहाँ जोड़ जाती हैं। जैसे हजारों साल पुराने यहाँ के खेत। बाजरे और ज्वार की खेती। मुअनजो-दड़ो के घरों में टहलते हुए मुझे कुलधरा की याद आई। यह जैसलमेर के मुहाने पर पीले पत्थर के घरों वाला एक खूबसूरत गाँव है। उस खूबसूरती में हरदम एक गमी व्याप्त है। गाँव में घर हैं, पर लोग नहीं हैं। कोई डेढ़ सौ साल पहले राजा से तकरार पर स्वाभिमानी गाँव का हर बाशिंदा रातोंरात अपना घर छोड़ चला गया। दरवाज़े-असबाब पीछे लोग उठा ले गए। घर खंडहर हो गए पर ढहे नहीं। घरों की दीवारें, प्रवेश और खिड़कियाँ ऐसी हैं जैसे कल की बात हो। लोग निकल गए, वक्त वहीं रह गया। खंडहरों ने उसे थाम लिया। जैसे सुबह लोग घरों से निकले हों, शायद शाम ढले लौट आने वाले हों। राजस्थान ही नहीं, गुजरात, पंजाब और हरियाणा में भी कुएँ, कुंड, गली-कूचे, कच्ची-पक्की ईंटों के कई घर भी आज वैसे मिलते हैं जैसे हजारों साल पहले हुए। जॉन मार्शल ने मुअनजो-दड़ो पर तीन खंडों का एक विशद प्रबंध छपवाया था। उसमें खुदाई में मिली ठोस पहियों वाली मिट्टी की गाड़ी के चित्र के साथ सिंध में पिछली सदी में बरती जा रही ठीक उसी तरह की बैलगाड़ी का भी एक चित्र प्रकाशित है। तसवीर से उन्होंने एक सतत् परंपरा का इज़हार किया, हालाँकि कमानी या आरे वाले पहिए का आविष्कार बहुत पहले हो चुका था जब मैं छोटा था, हमारे गाँव में भी लकड़ी वाले ठोस पहिए बैलगाड़ी में जुड़ते थे। दुल्हन पहली दफा इसी बैलगाड़ी में ससुराल जाती थी।

प्रश्न 1 – मुअनजो-दड़ो की गलियों या घरों में लेखक को राजस्थान का खयाल क्यों आया?
(क) क्योंकि (पश्चिमी) राजस्थान और सिंध-गुजरात की दृश्यावली एक-सी है
(ख) कई चीजें हैं जो लेखक को यहाँ से वहाँ जोड़ जाती हैं। जैसे हजारों साल पुराने यहाँ के खेत
(ग) कई चीजें हैं जो लेखक को यहाँ से वहाँ जोड़ जाती हैं। जैसे बाजरे और ज्वार की खेती
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 2 – मुअनजो-दड़ो के घरों में टहलते हुए लेखक को कुलधरा की याद क्यों आई?
(क) क्योंकि वहाँ पर भी घर खंडहर हो गए पर ढहे नहीं
(ख) क्योंकि यह जैसलमेर के मुहाने पर पीले पत्थर के घरों वाला एक खूबसूरत गाँव है
(ग) क्योंकि कोई डेढ़ सौ साल पहले राजा से तकरार पर स्वाभिमानी गाँव का हर बाशिंदा रातोंरात अपना घर छोड़ चला गया
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (क) क्योंकि वहाँ पर भी घर खंडहर हो गए पर ढहे नहीं

प्रश्न 3 – कुलधरा के घरों को देखकर लेखक को कैसा प्रतीत होता है?
(क) घरों की दीवारें, प्रवेश और खिड़कियाँ ऐसी हैं जैसे कल की बात हो
(ख) लोग निकल गए, वक्त वहीं रह गया। खंडहरों ने उसे थाम लिया
(ग) जैसे सुबह लोग घरों से निकले हों, शायद शाम ढले लौट आने वाले हों
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 4 – राजस्थान के अलावा कहाँ पर कुएँ, कुंड, गली-कूचे, कच्ची-पक्की ईंटों के कई घर भी आज वैसे मिलते हैं जैसे हजारों साल पहले हुए?
(क) गुजरात
(ख) हरियाणा
(ग) पंजाब
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 5 – जॉन मार्शल ने मुअनजो-दड़ो पर कितने खंडों का एक विशद प्रबंध छपवाया था?
(क) तीन
(ख) दो
(ग) चार
(घ) एक
उत्तर – (क) तीन

7 –
एक खास बात यहाँ कोई भी महसूस करेगा। अजायबघर में प्रदर्शित चीजों में औजार तो हैं, पर हथियार कोई नहीं है। मुअनजो-दड़ो क्या, हड़प्पा से लेकर हरियाणा तक समूची सिंधु सभ्यता में हथियार उस तरह कहीं नहीं मिले हैं जैसे किसी राजतंत्र में होते हैं। इस बात को लेकर विद्वान सिंधु सभ्यता में शासन या सामाजिक प्रबंध के तौर-तरीके को समझने की कोशिश कर रहे हैं। वहाँ अनुशासन ज़रूर था, पर ताकत के बल पर नहीं। वे मानते हैं कोई सैन्य सत्ता शायद यहाँ न रही हो। मगर कोई अनुशासन ज़रूर था जो नगर योजना, वास्तुशिल्प, मुहर-ठप्पों, पानी या साफ-सफाई जैसी सामाजिक व्यवस्थाओं आदि में एकरूपता तक को कायम रखे हुए था। दूसरी बात, जो सांस्कृतिक धरातल पर सिंधु घाटी सभ्यता को दूसरी सभ्यताओं से अलग ला खड़ा करती है, वह है प्रभुत्व या दिखावे के तेवर का नदारद होना। दूसरी जगहों पर राजतंत्र या धर्मतंत्र की ताकत का प्रदर्शन करने वाले महल, उपासना-स्थल, मूर्तियाँ और पिरामिड आदि मिलते हैं। हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर। न राजाओं, महंतों की समाधियाँ। यहाँ के मूर्तिशिल्प छोटे हैं और औजार भी। मुअनजो-दड़ो के ‘नरेश’ के सिर पर जो ‘मुकुट’ है, शायद उससे छोटे सिरपेंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती। और तो और, उन लोगों की नावें बनावट में मिस्र की नावों जैसी होते हुए भी आकार में छोटी रहीं। आज के मुहावरे में कह सकते हैं वह ‘लो-प्रोफाइल’ सभ्यता थी; लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति। मुअनजो-दड़ो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा शहर ही नहीं था, उसे साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए सबसे समृद्ध भी माना गया है। फिर भी इसकी संपन्नता की बात कम हुई है तो शायद इसलिए कि उसमें भव्यता का आडंबर नहीं है।

प्रश्न 1 – विशेषज्ञ क्यों मानते हैं कि सिंधु घाटी सभ्यता में कोई सैन्य सत्ता शायद न रही हो?
(क) क्योंकि वहाँ की खुदाई में किसी राजा के चिह्न नहीं हैं
(ख) क्योंकि वहाँ की खुदाई में कोई हथियार नहीं हैं
(ग) क्योंकि वहाँ की खुदाई में लोहा नहीं मिला है
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (ख) क्योंकि वहाँ की खुदाई में कोई हथियार नहीं हैं

प्रश्न 2 – सिंधु घाटी सभ्यता में यदि सैन्य सत्ता न रही हो तो ऐसा क्यों माना जाता है कि वहाँ कोई अनुशासन ज़रूर था?
(क) क्योंकि वहाँ की सामाजिक व्यवस्थाओं में एकरूपता कायम थी
(ख) क्योंकि वहाँ की नगर योजना, वास्तुशिल्प में एकरूपता कायम थी
(ग) क्योंकि वहाँ पानी या साफ-सफाई आदि में एकरूपता कायम थी
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 3 – सांस्कृतिक धरातल पर सिंधु घाटी सभ्यता को दूसरी सभ्यताओं से अलग ला खड़ा करती है, कैसे?
(क) क्योंकि हड़प्पा संस्कृति में न भव्य राजप्रसाद मिले हैं, न मंदिर
(ख) क्योंकि हड़प्पा संस्कृति में न राजाओं की और न महंतों की समाधियाँ मिली हैं
(ग) केवल (क)
(घ) (क) और (ख) दोनों
उत्तर – (घ) (क) और (ख) दोनों

प्रश्न 4 – मुअनजो-दड़ो ‘लो-प्रोफाइल’ सभ्यता थी अर्थात लघुता में भी महत्ता अनुभव करने वाली संस्कृति। ऐसा क्यों कहा गया है?
(क) क्योंकि यहाँ के मूर्तिशिल्प छोटे हैं और औजार भी
(ख) मुअनजो-दड़ो के ‘नरेश’ के सिर पर जो ‘मुकुट’ है, शायद उससे छोटे सिरपेंच की कल्पना भी नहीं की जा सकती
(ग) उन लोगों की नावें बनावट में मिस्र की नावों जैसी होते हुए भी आकार में छोटी रहीं
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 5 – मुअनजो-दड़ो सिंधु सभ्यता का सबसे बड़ा शहर ही नहीं था, सबसे समृद्ध भी माना गया है। क्यों?
(क) पानी की नकासी की देखते हुए
(ख) नगर योजना को देखते हुए
(ग) कलाओं को देखते हुए
(घ) साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए
उत्तर – (घ) साधनों और व्यवस्थाओं को देखते हुए

8 –
सिंधु घाटी के लोगों में कला या सुरुचि का महत्त्व ज्यादा था। वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ, सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण और सबसे ऊपर सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करता है। एक पुरातत्त्ववेत्ता के मुताबिक सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है, “जो राज-पोषित या धर्म-पोषित न होकर समाज-पोषित था।” शायद इसीलिए आकार की भव्यता की जगह उसमें कला की भव्यता दिखाई देती है। अजायबघर में रखी चीजों में कुछ सुइयाँ भी हैं। खुदाई में ताँबे और काँसे की तो बहुत सारी सुइयाँ मिली थीं। काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयाँ मिलीं जिनमें एक दो-इंच लंबी थी। समझा गया है कि यह बारीक कशीदेकारी में काम आती होगी। याद करें, नर्तकी के अलावा मुअनजो-दड़ो के नाम से प्रसिद्ध जो दाढ़ी वाले ‘नरेश’ की मूर्ति है, उसके बदन पर आकर्षक गुलकारी वाला दुशाला भी है। आज छापे वाला कपड़ा ‘अजरक’ सिंध की खास पहचान बन गया है, पर कपड़ों पर छपाई का आविष्कार बहुत बाद का है। खुदाई में सुइयों के अलावा हाथीदाँत और ताँबे के सुए भी मिले हैं। जानकार मानते हैं कि इनसे शायद दरियाँ बुनी जाती थीं। हालाँकि दरी का कोई नमूना या साक्ष्य हासिल नहीं हुआ है। वह शायद कभी हासिल न हो, क्योंकि मुअनजो-दड़ो में अब खुदाई बंद कर दी गई है। सिंधु के पानी के रिसाव से क्षार और दलदल की समस्या पैदा हो गई है। मौजूदा खंडहरों को बचाकर रखना ही अब अपने आप में बड़ी चुनौती है।

प्रश्न 1 – कौन सी चीजें सिंधु सभ्यता को तकनीक-सिद्ध से ज्यादा कला-सिद्ध जाहिर करती है?
(क) वास्तुकला या नगर-नियोजन ही नहीं, धातु और पत्थर की मूर्तियाँ, मृद्-भांड, उन पर चित्रित मनुष्य, वनस्पति और पशु-पक्षियों की छवियाँ
(ख) सुनिर्मित मुहरें, उन पर बारीकी से उत्कीर्ण आकृतियाँ, खिलौने, केश-विन्यास, आभूषण
(ग) सुघड़ अक्षरों का लिपिरूप
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (घ) उपरोक्त सभी

प्रश्न 2 – काशीनाथ दीक्षित को सोने की तीन सुइयाँ मिलीं जिनमें एक दो-इंच लंबी थी। इनके उपयोग के बारे में क्या समझा गया है?
(क) कि यह बारीक दरियों को सिलने के काम आती होगी
(ख) कि यह सूती कपड़ो को सिलने के काम आती होगी
(ग) कि यह बारीक कशीदेकारी में काम आती होगी
(घ) कि यह बेजोड़ कलाकारी में काम आती होगी
उत्तर – (ग) कि यह बारीक कशीदेकारी में काम आती होगी

प्रश्न 3 – मुअनजो-दड़ो की खुदाई में सुइयों के अलावा जो हाथीदाँत और ताँबे के सुए मिले हैं, जानकारों के अनुसार उनका क्या उपयोग होता होगा?
(क) इनसे शायद मोटे कपड़े बुने जातें थे
(ख) इनसे शायद दरियाँ बुनी जाती थीं
(ग) इनसे शायद कलाकारी की जाती थीं
(घ) इनसे शायद ऊनि गद्दे बुने जातें थे
उत्तर – (ख) इनसे शायद दरियाँ बुनी जाती थीं

प्रश्न 4 – मुअनजो-दड़ो में दरी का कोई नमूना या साक्ष्य हासिल क्यों नहीं किया जा सकेगा?
(क) क्योंकि वहाँ कभी दरी का काम ही नहीं होता था
(ख) क्योंकि वहाँ की मौजूदा दरी अब नष्ट हो चुकी है
(ग) क्योंकि मुअनजो-दड़ो में अब खुदाई बंद कर दी गई है
(घ) क्योंकि यह केवल एक अनुमान ही है
उत्तर – (ग) क्योंकि मुअनजो-दड़ो में अब खुदाई बंद कर दी गई है

प्रश्न 5 – मुअनजो-दड़ो में अब खुदाई बंद क्यों कर दी गई है?
(क) क्योंकि सिंधु के पानी के रिसाव से क्षार और दलदल की समस्या पैदा हो गई है
(ख) क्योंकि सरकार को अब इसमें कोई दिलचस्पी नहीं रही
(ग) क्योंकि सभी चोजों की खुदाई हो चुकी है
(घ) क्योंकि विद्वानों के अनुसार अब खुदाई से कोई जानकारी नहीं मिलेगी
उत्तर – (क) क्योंकि सिंधु के पानी के रिसाव से क्षार और दलदल की समस्या पैदा हो गई है

बहुविकल्पीय प्रश्न और उत्तर (Multiple Choice Questions)

बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) एक प्रकार का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन है जिसमें एक व्यक्ति को उपलब्ध विकल्पों की सूची में से एक या अधिक सही उत्तर चुनने के लिए कहा जाता है। एक एमसीक्यू कई संभावित उत्तरों के साथ एक प्रश्न प्रस्तुत करता है।

प्रश्न 1 – मोहनजोदड़ो किस नदी के तट पर स्थित हैं?
(क) कावेरी नदी
(ख) सिंधु नदी
(ग) गंगा नदी
(घ) सरस्वती नदी
उत्तर – (ख) सिंधु नदी

प्रश्न 2 – मुअनजो -दड़ो किस काल के शहरों में सबसे बड़ा शहर है?
(क) पाषाणकालीन
(ख) स्वर्णकालीन
(ग) हरितकालीन
(घ) ताम्रकालीन
उत्तर – (घ) ताम्रकालीन

प्रश्न 3 – सिंधु घाटी सभ्यता कितने साल पुरानी हैं?
(क) 3,000 वर्ष पूर्व
(ख) 5,000 वर्ष पूर्व
(ग) 4,000 वर्ष पूर्व
(घ) 2,000 वर्ष पूर्व
उत्तर – (ख) 5,000 वर्ष पूर्व

प्रश्न 4 – सिंधु घाटी की जल संबंधी अद्धभुत विशेषता क्या है?
(क) जल को शुद्ध करने का प्रबंध
(ख) जल को इकठ्ठा करने का प्रबंध
(ग) जल को प्रयोग में लाने का प्रबंध
(घ) जल निकासी का प्रबंध
उत्तर – (घ) जल निकासी का प्रबंध

प्रश्न 5 – मोहनजोदड़ो नगर कितने हेक्टेयर में फैला हुआ था?
(क) 300 हेक्टेयर में
(ख) 100 हेक्टेयर में
(ग) 200 हेक्टेयर में
(घ) 20 हेक्टेयर में
उत्तर – (ग) 200 हेक्टेयर में

प्रश्न 6 – 100 वर्षों में अब तक मोहनजोदड़ो के केवल कितने भाग की खुदाई की गई है?
(क) एक तिहाई
(ख) एक चौथाई
(ग) दो तिहाई
(घ) दो चौथाई
उत्तर – (क) एक तिहाई

प्रश्न 7 – महाकुंड कितने फुट लंबा, चौड़ा और गहरा है?
(क) 44 फुट लम्बा, 25 फुट चौड़ा और 7 फुट गहरा
(ख) 40 फुट लम्बा, 25 फुट चौड़ा और 8 फुट गहरा
(ग) 40 फुट लम्बा, 55 फुट चौड़ा और 7 फुट गहरा
(घ) 40 फुट लम्बा, 25 फुट चौड़ा और 7 फुट गहरा
उत्तर – (घ) 40 फुट लम्बा, 25 फुट चौड़ा और 7 फुट गहरा

प्रश्न 8 – नर्तकी के अलावा और किसकी मूर्ति मिली थी?
(क) दाढ़ी वाले नरेश
(ख) बौद्ध भिक्षु
(ग) किसान
(घ) टोपी वाले नरेश
उत्तर – (क) दाढ़ी वाले नरेश

प्रश्न 9 – मोहन जोदड़ो से सिंधु नदी कितनी दूरी पर बहती है?
(क) 3 किलोमीटर की दूरी पर
(ख) 5 किलोमीटर की दूरी पर
(ग) 6 किलोमीटर की दूरी पर
(घ) 2 किलोमीटर की दूरी पर
उत्तर – (ख) 5 किलोमीटर की दूरी पर

प्रश्न 10 – मोहनजोदड़ो की गलियों तथा घरों को देखकर लेखक को किस प्रदेश का ख्याल आया?
(क) पंजाब का
(ख) हरियाणा का
(ग) राजस्थान का
(घ) चंडीगड़ का
उत्तर – (ग) राजस्थान का

प्रश्न 11 – मोहनजोदड़ो के घरों में टहलते हुए लेखक को किस गांव की याद आई?
(क) राजस्थान
(ख) कुलधरा
(ग) हरियाणा
(घ) पंजाब
उत्तर – (ख) कुलधरा

प्रश्न 12 – मोहनजोदड़ो की लंबी सड़क अब केवल कितनी बची है?
(क) डेढ़ मील
(ख) एक मील
(ग) आधा मिल
(घ) दो मील
उत्तर – (ग) आधा मिल

प्रश्न 13 – मोहनजोदड़ो की सभ्यता और संस्कृति अब किस जगह की शोभा बढ़ा रही हैं?
(क) अजायबघरों की
(ख) कारखानों की
(ग) सिंधु सभ्यता की
(घ) हड़प्पा सभ्यता की
उत्तर – (क) अजायबघरों की

प्रश्न 14 – मोहनजोदड़ो की आडी और सीधी सड़कों को आज के वास्तुकारों ने क्या नाम दिया हैं?
(क) ग्रैंड प्लान
(ख) ग्रीक प्लान
(ग) ग्रिड प्लान
(घ) ग्रेट प्लान
उत्तर – (ग) ग्रिड प्लान

प्रश्न 15 – मोहनजोदड़ो के सबसे ऊंचे चबूतरे में क्या विद्यमान हैं?
(क) बौद्ध स्तूप
(ख) महाकुंड
(ग) भिक्षु बस्ती
(घ) नरेश स्तूप
उत्तर – (क) बौद्ध स्तूप

प्रश्न 16 – दक्षिण में टूटे-फूटे घरों के जमघट को किसकी बस्ती माना गया है?
(क) मूर्तिकारों की
(ख) बौद्ध भिक्षुयों की
(ग) कामगारों की
(घ) उच्च वर्ग की
उत्तर – (ग) कामगारों की

प्रश्न 17 – मोहनजोदड़ो में विद्वानों के अनुसार अनाज की ढुलाई के लिए किस वाहन का प्रयोग किया जाता होगा?
(क) बैलगाड़ी
(ख) घोड़ागाड़ी
(ग) ऊँठगाड़ी
(घ) उपरोक्त सभी
उत्तर – (क) बैलगाड़ी

प्रश्न 18 – मोहनजोदड़ो में कुओं को छोड़कर अन्य चीजों के आकार कैसे थे?
(क) त्रिकोण या आयताकार
(ख) समतल या आयताकार
(ग) षट्भुज या आयताकार
(घ) चौकोर या आयताकार
उत्तर – (घ) चौकोर या आयताकार

प्रश्न 19 – सिंधु सभ्यता की नालियों की क्या विशेषता थी?
(क) नालियाँ ईंटों से बंद की हुई थी
(ख) नालियाँ पक्की ईंटों से बनी और ढकी हुई थी
(ग) नालियाँ कच्ची ईंटों से बनी और ढकी हुई थी
(घ) नालियों को कच्ची ईंटों से जोड़ा गया था
उत्तर – (ख) नालियाँ पक्की ईंटों से बनी और ढकी हुई थी

प्रश्न 20 – समूची सिंधु सभ्यता की हुई खुदाई में मिले सामान में क्या नहीं मिले?
(क) हथियार
(ख) बर्तन
(ग) औज़ार
(घ) मूर्तियाँ
उत्तर – (क) हथियार

taraftarium24justin tvcanlı maç izlealobetkulisbettipobettürk ifşatelegram ifşatürk ifşa izlekulisbetcasibomcasibomcasibomcasibomvdcasinovdcasinobetturkeysahabetsahabetgobahiskralbetcanlı maç izlejustin tvtaraftarium24canlı maç izletaraftarium24taraftarium24selçuksportsselcuksportshiltonbetbetsmovekavbetbetciobetciobahiscasinodinamobet güncel girişjojobet güncel girişjustin tvcanlı maç izlemaç izlebetkaregobahisgobahistaraftarium24canlı maç izlejustin tvtaraftarium24taraftarium24canlı maç izletaraftarium24bekabetbekabettekbetkulisbetdizipaldizipalmatbetmatbet girişmatbetmatbet girişmatbetmatbet girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişvaycasinovaycasino girişvaycasino güncelsahabet girişperabetperabet girişperabet yeni adressahabet 2026jokerbetjokerbet girişjokerbet güncel girişholiganbetholiganbet girişholiganbet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel giriştaraftarium24justin tvcanlı maç izletaraftarium24justin tvcanlı maç izlesahabetjojobetjojobet girişjojobet güncel girişesbetesbet girişesbet güncelvaycasinovaycasino girişbullbahis girişbullbahisbullbahis girişbetsmovebetsmove güncel girişbetsmove girişbullbahisbullbahis girişsahabet girişsahabet güncel girişsahabetesbetesbet girişjojobetjojobet girişjojobet güncel girişgobahis , gobahis giriş , gobahis güncel girişgobahis , gobahis giriş , gobahis güncel girişgobahis , gobahis giriş , gobahis güncel girişgobahis , gobahis giriş , gobahis güncel girişgobahis , gobahis giriş , gobahis güncel girişgobahis , gobahis giriş , gobahis güncel girişkralbetkralbet girişkralbetkralbet girişbetturkeykralbetkralbetkralbet girişcasibombetturkeybetturkeymcgift giftcardmallvaycasinovaycasino girişvaycasinovaycasino girişvaycasinovaycasino girişvaycasinovaycasino girişvaycasinovaycasino girişbetpasbetpasbetpasdizipalbetnanobetnanojojobetjojobet girişjojobet güncel girişholiganbetholiganbet girişholiganbet güncel girişistanbul escortescort istanbulmecidiyeköy escortngsbahisngsbahis girişngsbahis güncel adresingsbahisngsbahis girişngsbahis güncel girişperabetperabet resmi adresiperabet girişperabetperabet girişperabet güncel girişsekabetsekabet girişsekabetsekabet girişselcuksportscanlı maç izlemaç izletaraftarium24patronsporpatron sporCasibomCasibom GirişCasibom Giriş Güncelkralbetkralbet girişkralbetkralbet girişLigobetBetsalvadorCratosroyalbetPashagamingMaxwinRoyalbetGrandpashabetGrandpashabet Güncel Girişbetpasbetpas girişlimanbetlimabet girişbetmoonbetmoon girişlunabetlunabet girişlunabet güncel girişdinamobet vipbetmoonbetmoon girişkralbetjasminbetjasminbet girişholiganbet güncel girişholiganbet girişholiganbetkralbettaraftarium24selçuksportsmaç izlejokerbetjokerbet girişbetturkeybetturkey girişbetturkey güncel giriştaraftarium24taraftariumtaraftarium24 güncel adresisahabetsahabet girişsahabet güncel girişsahabetsahabet girişsahabet güncel girişbetmoonbetmoon girişsekabetsekabet güncel giriskulisbetkralbetkulisbetvdcasinobahiscasinobetgarsetrabetsetrabet girişultrabetultrabet girişkralbetkralbetkralbetbetnanosekabetjojobet girişbetnanograndpashabetgrandpashabet girişperabetperabet girişperabet güncel adresiSweet bonanza oynatempobet girişorisbetorisbet girişcashwincashwin girişultrabetultrabet girişsekabet girişsahabetsahabet girişsahabet güncel girilşistanbul escortmecidiyeköy escortbakırköy escortbetturkeybetturkey girişbetturkey güncel girişsahabetsahabet girişsahabet güncel girişpinbahis girişİkimisliİkimisli Girişİkimisli Güncelbetasusimajbetimajbet girişimajbet güncelmavibetmavibet girişngsbahisngsbahis girişnerobetnerobet girişngsbahisngsbahispinbahis girişngsbahisngsbahis girişrokubet girişsafirbetsafirbet girişsafirbet güncel girişsafirbetsafirbet girişsafirbet güncel girişroketbetroketbet girişbetpas, betpas giriş, betpas güncel, betpas yenibetpas, betpas giriş, betpas güncel, betpas yenibetpas, betpas giriş, betpas güncel, betpas yeniromabetromabet girişstarzbet girişstarzbet girişmelbet girişsportsbetsportsbetstake tr girişimajbetimajbet girişmatbetmatbet girişmatbet güncelngsbahisngsbahisngsbahis girişngsbahisngsbahis girişExtrabetExtrabet GirişExtrabet Güncel GirişExtrabetExtrabet GirişExtrabet Güncelgobahisgobahis girişjokerbetjokerbet girişİkimisliİkimisli Girişİkimisli Güncel GirişEnjoybetEnjoybet GirişEnjoybet Güncel Girişmarinomarino girişUltrabetxbahisxbahis girişRestbetPerabetMilanobetbetasusinter-bahisinter-bahis girişinter-bahis güncel girişbetvolebetvole girişdeneme bonusubetturkeyBet-cioBet-cio GirişBet-cio Güncel Girişjokerbetjokerbet girişgobahisgobahis girişceltabetbetgarbetgarkulisbetbahiscasinobahiscasinobekabetbekabetkulisbetgrandbettinggrandbetting girişultrabetultrabet giriştimebettimebet girişsuperbetinsuperbetin giriştipobettipobet giriştipobettipobet giriştipobettipobet girişmeritbetmeritbet girişkavbetkavbet girişkavbet güncel girişlordcasinolordcasino girişlord casinotipobetmilanobettipobetperabetgiftcardmall/mygiftbetofficebetoffice girişmilanobetmarinomarino girişmarino güncelsorayayogagrand-bettinggrand-betting girişrulobetrulobet girişson-bahisson-bahis girişofficebetofficebet girişsüratbetsüratbet girişhilbethilbet girişPadişahbetPadişahbet girişPadişahbet güncel girişbetasusbetasus girişbetasus güncel girişbetasuscasibomcasibom girişgrandpashabet girişimajbetimajbetimajbetmarsbahis girişvdcasino girişsuperbetin girişcasibom girişbetpas girişbetturkey girişrestbetrestbet girişrestbetrestbet girişrestbetrestbet girişbetebetbetebet girişbetebetbetebet girişbetebetbetebet girişbetpasbetpas girişbetpasbetpas girişbetpasbetpas girişbetorderbetorder girişbetorderbetorder girişimajbetimajbet girişimajbetimajbet giriş1xbet1xbet giriş1xbet güncelroyalbetroyalbet girişrestbetrestbet girişbetebetbetebet girişbetebet güncel girişmersobahismersobahis girişbetpasbetpas girişbetpas güncelbetwoonbetwoon telegrambetwoon girişenbetpiabellacasinobetzulabetplay girişbetbeynesinecasino girişTrendbettrendbetsüperbetinsuperbetinsüperbetin girişsuperbetin girisbetturkey girişbetturkeysetrabetsetrabet girişklasbahisklasbahis girişgrandpashabetgrandpashabet girişsüperbetinsuperbetinholiganbetholiganbet güncel girişholiganbet girişsuperbetinsüperbetinsuperbetin girişpalacebetorisbetcasibomkralbetkralbet girişkralbetkralbet girişkralbetkralbet girişroyalbetroyalbet girişkralbetdumanbet girişdumanbetcasibomcasibom girişcasibom güncel girişcasibomcasibom girişcasibom güncel girişcasibomcasibom girişcasibom güncel girişcasibomcasibom girişcasibom güncel girişPerabetPerabet girişvirüsbetgrandpashabetgrandpashabet girişPerabetPerabet girişKulisbetKulisbet GirişKulisbet Güncel Girişbiabetbiabet girişbetebetbetebet girişbetebet güncel giriş1king girişbetpuancashwinbetebetbetebet girişbetebet güncel girişmarsbahismarsbahis girişmarsbahismarsbahis girişrestbetrestbet girişrestbet güncel girişGrandpashabetGrandpashabet GirişGrandpashabet Resmirestbetrestbet girişrestbet güncel girişgrandpashabetgrandpashabet girişgrandpashabetgrandpashabet ggrandpashabetgrandpashabet grjojobetsuperbetinsuperbetin girişsuperbetin güncelholiganbetholiganbet girişbahiscasinobahiscasino girişenjoybetenjoybet girişrinabetrinabet girişbetnisbetnis girişjokerbetjokerbet girişzirvebetzirvebet girişzirvebet güncel girişbetnanobetnano girişstarzbetromabetwinxbetwinxbet girişelexbetelexbet girişelexbet güncel girişikimislikingroyalkingroyal girişkingroyalkingroyal girişhiltonbetromabetgrandpashabetbetpuanbetpuan girişbetciobetcio girişalobetalobet girişcasibomcasibom girişcasibomcasibom girişGalabetqueenbetbetingobetingo girişbetingo güncel girişavrupabetavrupabet girişbetparibubetparibu girişikimislibetcupbetcup girişperabetperabet girişelexbetelexbet girişbetpasbetpas girişrestbetrestbet girişimajbetimajbet girişbetorderbetorder girişpadişahbetpadişahbet girişhiltonbethiltonbet girişgalabetgalabet girişnesinecasinonesinecasino girişfavorisenfavorisen girişsonbahissonbahis girişromabetromabet girişlordcasinolordcasino girişbetgarbetgar girişgrandbettinggrandbetting girişpokerklas girişvdcasino girişmillibahismillibahis girişenbetenbet girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişultrabet , ultrabet giriş , ultrabet güncel girişcasinoroyalcasinoroyal giriştipobetbahiscasino girişKulisbettipobetsetrabetsetrabet güncel girişsetrabet girişsweet bonanzakralbethdfilmcehennemifilm izledizi izleAlobetAlobet GirişAlobet Güncel GirişBetmaniBetmani GirişBetmani Güncel Girişsuperbetin girişsuperbetinfenomenbetfenomenbet girişBahiscasinoBahiscasino GirişBahiscasino Güncel Girişcratosroyalbetcratosroyalbet girişsweet bonanzaCratosroyalbetCratosroyalbet girişgrandpashabetbetasusbetasusikimisli girişjupiterbahisteosbetparmabetparmabetparmabet girişparmabetparmabetparmabet girişparmabet girişparmabet girişparmabet güncelparmabet güncelparmabet güncelparmabetparmabet güncelparmabet güncelparmabetparmabet güncelparmabet güncelparmabetrestbettaksimbetholiganbetkavbetkavbet girişmarsbahismarsbahis girişmarsbahistaksimbettaksimbet giriştaksimbet güncel girişgrandpashabetromabetromabetvdcasinovdcasinotaraftarium24justin tvbetwoonbetwoon 1053betwoon güncel girişmilanobet girişsetrabet girişholiganbetvdcasinomatadorbetmatadorbet girişmatadorbet günceltaraftarium24canlı maç izletaraftariumgrandpashabetgrandpashabet girişgrandpashabet güncel girişgrandpashabettaraftarium24justin tvcanlı maç izleenbetPerabetPerabet girişPerabet güncel girişholiganbetholiganbet girişbetvolebetvole girişgrandpashabetgrandpashabet girişgrandpashabetgrandpashabet girişbetvolebetvole girişkulisbetkulisbet girişsüpertotobetjojobetjojobet girişsupertotobetultrabetSweet Bonanza PraSweet Bonanza Oynasweet bonanza demo oyna pragmaticBetcioBetcioBetcioBetcioMedusabahisMedusabahisbetofficebetoffice girişAlobetAlobetAvrupabetAvrupabetBetasusgates of olympus demo oynagates of olympusgates of olympus pragmaticBetasusultrabet girişholiganbettipobet1xbet1xbet giriş1xbet güncelGrandpashabetCratosroyalbetBetwoonbelugabahisbelugabahis girişbelugabahis güncel girişsuperbetinsuperbetin giriş1xbet1xbet giriş1xbet güncel1xbet1xbet giriş1xbet güncelgrandpashabet güncel girişradissonbet girişholiganbetholiganbet girişbetgit güncel girişenbetenbet girişsafirbetsafirbet girişsafirbet güncel girişbahiscasino girişkingroyalkingroyal girişbetsalvador girişcasinoroyal güncel girişcasinoroyal güncel girişroyalbetperabetrestbetbarbibetbarbibet girişgorabetjokerbetjokerbet girişbetparibubetparibu girişibizabetibizabet girişikimisliikimisli girişkingroyalkingroyal girişcasinomilyon girişcasinomilyon girişngsbahisngsbahis girişngsbahis güncel girişdinamobetdinamobet girişdinamobet güncel girişngsbahisngsbahis girişngsbahis güncel girişperabetperabet girişperabet güncel girişperabetperabet girişperabet güncel giriştipobettipobet girişsahabetsahabet girişPerabetPerabet girişgrandpashabetgrandpashabet girişgrandpashabet güncel girişganobet girişgrandpashabetMatadorbetMatadorbet girişMatadorbet güncelmatbetmatbet girişyakabet girişmariobetmariobet girişbetsilinbetsilin girişibizabetibizabet girişenbetenbet girişpalacebetpalacebet girişbetofficebetoffice girişgalabetgalabet girişkavbetkavbet girişultrabetultrabet girişmatbetmatbet girişkulisbetkulisbet girişkulisbet güncel girişikimisliikimisli girişikimisli güncel girişceltabetceltabet girişceltabet güncel girişrestbetrestbet girişrestbet güncel girişrestbetrestbet girişrestbet güncel girişrestbetrestbet girişrestbet güncel girişrestbetrestbet girişrestbet güncel girişrestbetrestbet girişrestbet güncel girişmatbetbullbahisbullbahis girişkalebetkalebet girişkalebet güncel girişbetorderbetorder girişbetpasbetpas girişimajbetimajbet girişrestbetrestbet girişelexbetelexbet girişperabetperabet girişbetcupbetcup girişgalabetgalabet girişfixbetimajbetimajbet güncelimajbet girişcashwincashwin girişcashwin güncel girişibizabetibizabet girişbetnisbetnis girişrinabetrinabet girişcasibomcasibom girişcasibomcasibom girişjojobetjojobet girişcasibomcasibom girişjojobetjojobet girişholiganbetholiganbet girişBullbahisBullbahis girişBullbahis güncelholiganbet girişholiganbetmarsbahismarsbahis giriştimebettimebet giriştaraftarium24justin tvcanlı maç izleLigobet GirişPalazzobetPalazzobet Güncel Girişsuperbetin girişsuperbetinPalazzobet Güncel GirişPalazzobet Twitterkralbetkralbet girişbetciobetciosuperbetin girişkralbetbetpas girişkralbetmilanobet girişholiganbetholiganbet girişholiganbet güncel girişbetasusenbetvdcasinovdcasinobetzulabetciobetcioultrabetPerabetPerabet girişkulisbetvdcasinokralbetkralbetbahiscasinobetgarjojobet girişjojobetvdcasinovdcasino güncel girişmatbetmatbet güncel girişsekabetsekabet güncel girişjojobetjojobet güncel girişjojobet girişgrandpashabetgrandpashabet girişgrandpashabet güncel giriştophillbettophillbettophillbetkralbetkralbettophillbet giriştophillbet giriştophillbet giriştophillbet güncel giriştophillbet güncel giriştophillbet güncel girişonwinonwin girişonwindinamobetdinamobet girişdinamobet güncel girişbahiscasino girişbetpas girişgrandpashabetgrandpashabet girişperabetperabet girişsuperbetin girişsuperbetin