‘दिव्या’ उपन्यास: यशपाल की ऐतिहासिक कल्पना और नारी संघर्ष का महाकाव्य

‘दिव्या’ उपन्यास हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार यशपाल के श्रेष्ठ उपन्यासों में से एक है। यह मात्र एक कहानी नहीं, बल्कि बौद्धकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर रची गई एक गहन काल्पनिक ऐतिहासिक कृति है। उपन्यास का केंद्रीय विषय युगों-युगों से चली आ रही दलित-पीड़ित नारी की करुण गाथा और उसके संघर्षों के बाद अपने स्वस्थ मार्ग को पहचानने की यात्रा है।

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‘दिव्या’ की मुख्य विशेषताएँ और प्रयोजन

  • ऐतिहासिक कल्पना का आधार: ‘दिव्या’ सीधे इतिहास नहीं है, बल्कि ऐतिहासिक कल्पना मात्र है। यशपाल ने बौद्धकाल के वातावरण को आधार बनाकर, कलात्मक अनुराग से, व्यक्ति और समाज की प्रवृत्तियों और गति का यथार्थ चित्रण करने का प्रयास किया है। लेखक का मुख्य उद्देश्य उस चित्रमय ऐतिहासिक काल के प्रति अपने मोह को अभिव्यक्त करना रहा है।
  • नारी संघर्ष और आत्म-पहचान: उपन्यास का मूल स्वर सदियों से शोषित नारी के दुःख और संघर्षों को चित्रित करना है। दिव्या का चरित्र एक ऐसी नायिका का प्रतिनिधित्व करता है जो अनेक बाधाओं से जूझते हुए अंततः अपनी अस्मिता और अधिकार को पहचानती है।
  • इतिहास का मन्थन और भविष्य का संकेत: यशपाल मानते हैं कि अतीत का मनन हम भविष्य के लिए संकेत पाने के उद्देश्य से करते हैं। इतिहास केवल घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं करता, बल्कि परिवर्तन के सत्य को दर्शाता है।
  • व्यक्ति और समाज की रचनात्मक क्षमता: लेखक के अनुसार, इतिहास परिस्थितियों में व्यक्ति और समाज की रचनात्मक क्षमता का विश्लेषण करता है। मनुष्य न केवल परिस्थितियों को सुलझाता है, बल्कि वह परिस्थितियों का निर्माण भी करता है। यह विचार उपन्यास को एक सामाजिक-दार्शनिक गहराई प्रदान करता है।
  • इतिहास: विश्वास नहीं, विश्लेषण की वस्तु: यशपाल का मानना है कि इतिहास अंधविश्वास का विषय नहीं, बल्कि विश्लेषण का साधन है। यह किसी भी जाति का अपनी परंपरा में किया गया आत्म-विश्लेषण है, जो वर्तमान और भविष्य की रचना के लिए निर्देश प्रदान करता है।

‘दिव्या’ उपन्यास इस बात को सफलतापूर्वक दर्शाता है कि कैसे अतीत की कथाएँ वर्तमान की सामाजिक चुनौतियों और मनुष्य की रचनात्मक सामर्थ्य को समझने में हमारी मदद कर सकती हैं।

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