संत नामदेव का जीवन परिचय
संत नामदेव का जीवन परिचय: जन्म, भक्ति मार्ग, साहित्यिक योगदान और भक्ति आंदोलन में उनका स्थान। पढ़िए संत नामदेव की […]
संत नामदेव का जीवन परिचय: जन्म, भक्ति मार्ग, साहित्यिक योगदान और भक्ति आंदोलन में उनका स्थान। पढ़िए संत नामदेव की […]
गुरु नानक देव का जीवन परिचय: जन्म, शिक्षा, देशाटन, शिक्षाएं और सिख धर्म में योगदान। जानिए गुरु नानक देव जी
गुरु नानक देव का जीवन परिचय | जन्म, शिक्षाएं और योगदान Read Post »
जूझ पाठ का सार (Joojh Summary) लेखक का मन पाठशाला जाने के लिए तड़पता था। परन्तु लेखक को अपने दादा अर्थात पिता से यह कहने में डर लगता था लेकिन वह चाहता था कि कोई उसके पिता को यह समझा दे। लेखक इसलिए भी पढ़ना चाहता था क्योंकि उसे लगता था कि खेती से उनका गुजारा नहीं हो पाएगा। इसका कारण यह भी था कि उसके दादा के समय में जितनी खेती सफल थी अब उसके पिता के समय में नहीं रह गई थी। लेखक चाहता था कि वह पढ़–लिख कर कोई नौकरी कर ले जिससे चार पैसे उसके हाथ में रहेंगे। यह विचार उसके मन में चलता रहता था। लेखक की खेती की बात की जाए तो उन्हें दीवाली बीत जाने पर महीना–भर ईख पेरने का कोल्हू चलाना होता था। लेखक के पिता का कहना था कि यदि कोल्हू ज़रा जल्दी शुरू किया तो ईख की अच्छी–खासी कीमत मिल जाती है। क्योंकि जब चारों ओर कोल्हू चलने लगते हैं तो बाज़ार में गुड़ की मात्रा अधिक हो जाती और उसके भाव नीचे गिर जाते हैं। इसलिए पुरे गाँव में लेखक के परिवार का कोल्हू सबसे पहले शुरू होता था। इसी कारण से इस साल भी कोल्हू जल्दी शुरू हुआ और लेखक का परिवार इस काम को जल्दी निपटा कर आगे के कामों में लग गए। लेखक की माँ धूप में कंडे थाप रही थी और लेखक भी उनकी मदद कर रहा था। बातों–ही–बातों में लेखक ने अपने पढ़ने की बात छेड़ दी। परन्तु लेखक की माँ भी जानती थी कि वह इस विषय में लेखक की कोई मदद नहीं कर सकती हैं। क्योंकि लेखक के पिता लेखक की पढाई की बात नहीं जमती। लेखक अपनी माँ मना लेता कि अब उनके खेत का सारा काम समाप्त हो गया है उसके लिए अब कोई काम नहीं है इसलिए वे दोनों दत्ता जी राव सरकार के पास जा कर उनको सारी बात समझा सकते हैं जिससे वे लेखक की पढ़ाई के बारे में लेखक के पिता को अच्छे से समझा दे। माँ भी मान जाती है और रात में दोनों दत्ता जी राव देसाई के यहाँ गए। लेखक की माँ ने दत्ता जी राव को सारी बात कह दी। और वे भी उनकी बात से सहमत हो गए। माँ ने दत्ता जी राव को यह भी बताया कि लेखक के पिता खेती के काम में हाथ नहीं लगाते। उनको सारे गाँव भर आजादी के साथ घूमने को मिलता रहे, इसलिए उन्होंने लेखक का पढ़ना बंद कर उसे खेती में जोत दिया है। यह सुनते ही देसाई दादा को गुस्सा आ गया। जब लेखक ने कहा कि जनवरी का महीना है और परीक्षा नज़दीक आ गई है। और यदि वह अभी भी कक्षा में बैठेगा तो दो महीने में पाँचवीं की सारी तैयारी हो जाएगी और वह परीक्षा पास कर लेगा क्योंकि पहले ही उसका एक वर्ष बेकार में चला गया है। और देसाई दादा उसके पिता को यह न बताए कि उसने यहाँ आकर यह सब कहा है नहीं तो उसका पिता उसे बहुत मारेगा। देसाई दादा ने उसकी साड़ी बातें सुनी और कहा कि वह चिंता न करे उन्हें पता है कि क्या करना है। वह बस उसके पिता को उनके पास भेज दें और खुद भी थोड़ी देर बाद आ जाए और साथ–ही–साथ वे जो भी पूछें वह बिना डरे उसका उत्तर अपने पिता के ही सामने अच्छे से दें। जब लेखक के पिता घर पहुंचे तो लेखक की माँ ने उन्हें देसाई दादा के यहाँ भेज दिया और कुछ समय बाद पिता को बुलाने के बहाने वह भी देसाई दादा के घर पहुँच गया। सवाल जवाब में जब देसाई दादा ने बड़ी चतुराई से पूछा की लेखक कौन सी कक्षा में पढता है तो लेखक ने भी तुरंत कह दिया कि वह पाँचवी कक्षा में पढ़ता था परन्तु अब विद्यालय नहीं जाता क्योंकि उनके खेतों में पानी देने वाला कोई नहीं है। इस पर देसाई दादा ने लेखक के पिता को खूब बातें सुनाई। देसाई दादा ने लेखक के पिता द्वारा दिए गए सभी तर्कों को काट दिया और लेखक को रोज स्कूल जाने को कहा और यदि उसका पिता उसे न जाने दें तो उसे अपने पास सुबह–शाम जो भी काम हो सके वह करने को कहा और उसके बदले वे उसे पढ़ाएंगे। यह बात सुन कर लेखक के पिता ने कहा कि वे उसे स्कूल जाने से नहीं रोकते अगर उसे ज़रा गलत–सलत आदत न पड़ गई होती। इसलिए पाठशाला से निकालकर ज़रा नज़रों के सामने रख लिया है। देसाई दादा के पूछने पर पिता ने बताया कि वह यहाँ–वहाँ कुछ भी करता है। कभी वंकंडे बेचता, कभी चारा बेचता, सिनेमा देखता, कभी खेलने जाता। खेती और घर के काम में इसका बिलकुल ध्यान नहीं है। इस पर लेखक ने सफाई देते हुए कहा कि कभी एक बार मेले में पटा पर पैसे लगा दिए थे। दादा तो कभी भी सिनेमा के लिए पैसे नहीं देते हैं। इसलिए खेत पर गोबर बीन–बीनकर माँ से कंडे थपवा लिए थे और उन्हें बेचकर ही कपड़े भी बनवाए थे। उसी समय एक बार सिनेमा भी गया था। देसाई दादा ने सारी बातें सुनी और बीती बातें भूल कर अगले दिन से स्कूल जाने को कहा।
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