अव्यय (अविकारी शब्द)
- व्युत्पत्ति: ‘अ’ + ‘व्यय’ (जिसका कुछ भी खर्च या परिवर्तन न हो)।
- परिभाषा: जिन शब्दों के रूप में लिंग, वचन, पुरुष, कारक आदि के कारण कोई विकार (परिवर्तन) उत्पन्न नहीं होता, उन्हें ‘अव्यय’ या ‘अविकारी’ शब्द कहते हैं।
- विशेषता: ये हर स्थिति में अपने मूल रूप में बने रहते हैं।
- उदाहरण: जब, तब, अभी, उधर, वाह, ठीक, किन्तु, परन्तु, इसलिए, चूँकि आदि।
3. अव्यय के मुख्य चार भेद
(I) क्रियाविशेषण (Adverb)
परिभाषा: जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं। यह दूसरे क्रियाविशेषण की भी विशेषता बता सकते हैं (जैसे: वह बहुत धीरे चलता है)।
वर्गीकरण के तीन आधार:
- प्रयोग के अनुसार:
- साधारण: स्वतंत्र प्रयोग (जैसे: हाय! अब क्या करूँ?)।
- संयोजक: उपवाक्य से सम्बन्ध (जैसे: जहाँ अभी समुद्र है, वहाँ कभी जंगल था)।
- अनुबद्ध: निश्चय के लिए किसी शब्दभेद के साथ (जैसे: मैंने उसे देखा तक नहीं)।
- रूप के अनुसार:
- मूल: बिना किसी मेल के (जैसे: ठीक, दूर, अचानक)।
- यौगिक: प्रत्यय या पद जोड़कर (जैसे: घर-घर, मन से, यथाक्रम, देखते हुए)।
- स्थानीय: बिना रूपान्तर के विशेष स्थान पर (जैसे: वह अपना सिर पढ़ेगा)।
- अर्थ के अनुसार (9 मुख्य भेद):
- कालवाचक, स्थानवाचक, दिशावाचक, परिमाणवाचक, रीतिवाचक, निश्चयवाचक, अनिश्चयवाचक, निषेधवाचक, कारणवाचक।
(II) सम्बन्धबोधक अव्यय (Preposition)
परिभाषा: जो संज्ञा/सर्वनाम के बाद आकर उसका सम्बन्ध वाक्य के अन्य शब्दों से बताते हैं।
- विशेष: यदि संज्ञा न हो, तो यही शब्द ‘क्रियाविशेषण’ कहलाते हैं।
- उदाहरण: “वृक्ष के ऊपर पक्षी हैं” (सम्बन्धबोधक) बनाम “वह ऊपर बैठा है” (क्रियाविशेषण)।
- भेद (अर्थानुसार): कालवाचक, स्थानवाचक, दिशावाचक, साधनवाचक, हेतुवाचक, विषयवाचक, व्यतिरेकवाचक, विनिमयवाचक, सादृश्यवाचक, विरोधवाचक, सहचरवाचक, संग्रहवाचक, तुलनावाचक।
(III) समुच्चयबोधक अव्यय (Conjunction)
परिभाषा: दो शब्दों या वाक्यों को जोड़ने वाले शब्द।
- भेद 1: समानाधिकरण: समान स्थिति वाले उपवाक्यों को जोड़ना।
- (संयोजक, विभाजक, विकल्पसूचक, विरोधदर्शक, परिणामदर्शक)।
- भेद 2: व्यधिकरण: मुख्य वाक्य से आश्रित वाक्यों को जोड़ना।
- (कारणवाचक, उद्देश्यवाचक, संकेतवाचक, स्वरूपवाचक)।
(IV) विस्मयादिबोधक अव्यय (Interjection)
परिभाषा: हर्ष, शोक, घृणा आदि तीव्र मनोभावों को प्रकट करने वाले शब्द। वाक्य रचना में इनका महत्व गौण होता है।
- भेद: हर्षबोधक, शोकबोधक, आश्चर्यबोधक, क्रोधबोधक, स्वीकारबोधक, सम्बोधनबोधक, भयबोधक।
4. निपात (Particles)
- विशेषता: निपात शुद्ध अव्यय नहीं हैं, लेकिन सहायक शब्द के रूप में वाक्य को अतिरिक्त भावार्थ/बल प्रदान करते हैं।
- यास्क के अनुसार: निपात के तीन भेद हैं— उपमार्थक, कर्मोपसंग्रहार्थक और पदपूरणार्थक।
- प्रमुख निपात प्रकार (9 वर्ग): स्वीकार्य (हाँ), नकारार्थक (नहीं), निषेधात्मक (मत), प्रश्नबोधक (क्या), विस्मयादिबोधक (काश), बलदायक (ही, भी, तक), तुलनबोधक (सा), अवधारणबोधक (ठीक, लगभग), आदरबोधक (जी)।
5. समानार्थक क्रियाविशेषणों में सूक्ष्म अंतर
- अब बनाम अभी: ‘अब’ वर्तमान समय का अनिश्चय है; ‘अभी’ का अर्थ तुरंत है।
- केवल बनाम मात्र: ‘केवल’ शब्द के पहले आता है; ‘मात्र’ शब्द के बाद।
- न बनाम नहीं बनाम मत: ‘न’ साधारण निषेध है; ‘नहीं’ निषेध का निश्चय (जोरदार) है; ‘मत’ निषेधात्मक आज्ञा है।
- ही बनाम भी: ‘ही’ एकमात्रता सूचित करता है; ‘भी’ अतिरिक्तता।
6. अव्यय का पद
पद-परिचय में अव्यय का भेद और उसका क्रिया या पद से सम्बन्ध बताना अनिवार्य है।
उदाहरण 1: “शांतिपूर्वक” (अच्छा लड़का कक्षा में शांतिपूर्वक बैठता है)
- पद-परिचय: रीतिवाचक क्रियाविशेषण, ‘बैठता है’ क्रिया की विशेषता बताता है।
उदाहरण 2: “अपने” (मोहन अपने भाई सोहन को मारता है)
पद-परिचय: निजवाचक सर्वनाम, पुंलिंग, एकवचन, सम्बन्धकारक, ‘भाई’ से सम्बन्धित, सार्वनामिक विशेषण के रूप में प्रयुक्त।
